न्याय के नाम पर अन्याय के भी खतरे

न्याय के नाम पर अन्याय के भी खतरे

मीडियावाला.इन।

न्यायालय और चिकित्सालय जीवन रक्षा के असली केंद्र मुझे  हमेशा लगते रहे हैं| मैं विधिवेत्ताओं, न्यायाधीशों और चिकित्सा विशेषज्ञों और चिकित्सकों का सर्वाधिक सम्मान करते हुए उनसे सम्बन्ध रखने का प्रयास करता हूँ| कोरोना के भयावह काल में तो उनकी सलाह , सहायता और सेवा से करोड़ों लोगों की जीवन रक्षा हो रही है| कुछ न्यायाधीशों ने इस संकट काल में सरकारों को न केवल फटकार लगाईं, अपने आदेशों के तत्काल पालन की चेतावनी भी दी| इस संवेदनशील मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री आर सी लाहोटीजी सहित प्रमुख विधिवेत्ताओं ने  न्याय पालिका की लक्ष्मण रेखा पर गंभीरता से विचार व्यक्त किये हैं| श्री लाहोटी ने पिछले वर्ष भी अपनी बिरादरी के लिए बहुत शानदार ढंग से समझाने का प्रयास किया था| लेकिन अब हमारे विभिन्न क्षेत्रों में परम्परा, संस्कृति, लक्ष्मण रेखा का उल्लेख तक दकियानुसी और निरर्थक कहने वाले लोग सक्रिय हो गए हैं| समाज और राष्ट्र तरक्की जो कर रहा है|

 इस सन्दर्भ में कुछ सवाल उठते हैं| आने वाले दिनों में यदि  अदालत यानी जज साहब स्वयं वैक्सीन, दवाई, अस्पताल में रखने की अवधि तय कर दें, किसानों के लिए उनकी फसल के खरीदी और बिक्री के मूल्य तय कर दें, सेना को किस सीमा पर अधिक तैनाती का आदेश देने लगे, किसी मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को सुप्रीम कोर्ट हर सप्ताह अदालत में आकर जवाब देने का निर्णय सुना दे-- तब कैसे और कौन उन आदेशों का पालन कर सकेगा?

न्यायमूर्ति लाहोटीजी ने इसीलिए मुलभुत सिद्धांत की याद दिलाई है कि हमारे लोकतान्त्रिक संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका के अधिकार और लक्ष्मण रेखा तय हैं | हम यह कैसे भूल सकते हैं कि जज नियुक्त होते हैं, उन्हें जनता चुनकर नहीं भेजती है| अदालतों के पास अपनी जांच एजेंसी नहीं होती है, जिससे जज किसी आरोप या मामले की पुष्टि कर सके| आजादी के वर्षों बाद अस्सी के दशक में सर्वोच्च अदालत ने जन  हित याचिकाओं की सुनवाई की व्यवस्था दी| यही नहीं स्वयं न्यायाधीशों को किसी महत्वपूर्ण मामले को स्वयं संज्ञान लेकर कानूनों के आधार पर दिशा निर्देश का प्रावधान भी रखा गया|  जन हित याचिका के नाम पर अनावश्यक धंधे और ब्लैक मेल की स्थितियां तक दिखने पर अब अदालतों ने उस पर अधिक सावधानी तथा कड़ाई सुरु की है| फिर भी संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं हुआ कि संवैधानिक नियमों प्रावधानों के बजाय अदालतें अपने विचार या रास्ते सरकाओं अथवा समाज पर थोपने लगे| जज की अपनी शिक्षा दीक्षा पालन पोषण से निजी धारणाएं हो सकती हैं| लेकिन न्याय के लिए उन्हें  केवल संविधान प्रदत्त अधिकारों, नियमों- कानूनों की व्याख्या कर निर्णय देना चाहिये|

एक महत्वपूर्ण पहलु यह है कि विधान सभा अथवा संसद अथवा सरकार के किसी निर्णय को सुधारा-संशोधित किया जा सकता है| सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ऐसे फैसले दिए हैं| लेकिन अदालत के फैसलों को आसानी से कार्य पालिका नहीं बदल सकती है| संविधान निर्माताओं ने लोकतान्त्रिक सर्वोच्च संस्थाओं का कार्य विभाजन और संतुलन भी किया है| यदि न्यायाधीश भी सक्रिय अभियानकर्ता (एक्टिविस्ट) की तरह मांग और फरमान भी जारी करने लगे, तब सरकार के मंत्री ही नहीं अधिकारी भी अदालती पेशियों के लिए हमेशा उत्तर तैयार करने, सरकारी वकील और बाद में स्वयं उपस्थिति दर्ज कर अदालत में अपना पक्ष रखते रहेंगे| फिर गांव, जिले, प्रदेश, देश के लिए कार्यक्रमों योजनाओं के अमल के लिए कितना समय देंगें और उनकी अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे करेंगे? आज केंद्र में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार है और विभिन्न प्रदेशों में अलग अलग दलों और उनके मुख्या मंत्रियों की सरकारें हैं| उनके कार्यकाल समाप्ति अथवा बहुमत के आकस्मिक संकट होने पर पांच वर्ष से पहले चुनाव हो सकते हैं| उनकी वैधानिक गलतियों, गड़बड़ियों, भ्रष्टाचार या सत्ताधारी के किसी अपराध पर अदालत सुनवाई और प्रमाणों के आधार पर अदालतें सजा दे सकती हैं| लेकिन प्रशासनिक आदेश देने से तो अराजकता का खतरा हो जाएगा|

समुचित आदर के साथ न्यायाधीशों के साथ इन दिनों क्रांति वीर बने हुए राजनेताओं, अभियानकर्ता-एक्टिविस्ट के साथ एक और तथ्य की और ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ| कृपया पिछले दशकों में हुए उन अदालती निर्णयों का अध्ययन करें, जिनका आज तक व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन नहीं हो सका| कुछ वर्ष पहले मैंने एक प्रमुख पत्रिका में एक विशेषज्ञ से ऐसे कुछ निर्णयों पर विस्तार से लिखवाया था| फिर छे वह प्रमुख राज मार्गों पर ढाबों- दुकानों से सड़क से दुरी का फैसला हो या जल अथवा वायु के प्रदूषण को लेकर किए गए हों | हाँ उन फैसलों से दबाव बनता है, लेकिन लागू तो सरकारें , प्रशासन ही करेगा| आदर्श स्थिति तो वह होगी कि जनता को समय पर श्रेष्ठ न्याय देने के लिए कार्य पालिका और न्याय पालिका में तालमेल बेहतर हो, ताकि तहसील जिला स्टार से लेकर सर्वोच्च स्टार तक न्यायालय परिसर अधिक साधन सम्पन हों, अदालतों और न्याधीशों की संख्या आबादी के अनुपात में पर्याप्त हो, न्यायाधीशों की नियुक्तयों के प्रस्ताव आवश्यक पड़ताल प्रक्रिया की निश्चित समयावधि तय हो | पुलिस की तरह वकील अदालत के नाम पर साधारण गरीब अथवा अमीर भी घबराए नहीं और पूर्ण विश्वास रखे | भारत के लोकतंत्र और विधि वेत्ताओं को दुनिया भर में सम्मान से देखा जाता है| विश्व  में केवल महान भारत में हम अदालतों को न्याय का मंदिर कहते हैं| डॉक्टर और जज साहब को भगवान् का रुप तक मानते हैं| इसलिए देवताओं को अपनी सीमाओं और गरिमा की रक्षा करनी होगी| इससे मंदिर का कलश और अधिक चमचमाएगा|

(लेखक विभिन्न अख़बारों और पत्रिकाओं के पूर्व संपादक हैं)

RB

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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