अपने शास्‍त्रों के मूल स्‍वरूप को पहचानें

अपने शास्‍त्रों के मूल स्‍वरूप को पहचानें

मीडियावाला.इन।

2 अक्‍टूबर 20 के दैनिक भास्‍कर में संपादकीय पृष्‍ठ पर एक लेख छपा है । शीर्षक है – ‘’कोरोना ने हमें सिखाया कि अब 5 साल की योजनाऍं न बनाऍं’’ । इसके लेखक हैं सुनील अलघ जिनका परिचय दिया है बिजनेस और ब्रांड कंसल्‍टेंट । इस लेख के अंत में अपनी विद्वता की धाक जमाने के लिए लेखक ने गीता का कथित उद्धरण चिपका दिया है जो इस प्रकार है – ‘’हमें जो चाहिए है उसके लिए अगर एक होकर नहीं लड़ेंगे, तो हमने जो खोया है, उसके लिए नहीं रो सकते।‘’ आप पूरी गीता पढ़ लीजिए। इस प्रकार का कोई उल्‍लेख नहीं है। सोशल मीडिया तो अविश्‍वसनीय है ही अब अखबार भी अविश्‍वसनीय होते जा रहे हैं। लेखक ने स्‍वयं तो कभी गीता पढ़ी नहीं, सोशल मीडिया से कट पेस्‍ट करके चिपका दिया और संपादकों ने भी उसकी सत्‍यता जानने की जहमत नहीं उठाई।  नई पीढ़ी परंपरागत शास्‍त्रों के अध्‍ययन से विमुख होती जा रही है। तिस पर इस प्रकार के गलत उद्धरण शास्‍त्र के प्रति अश्रद्धा उत्‍पन्‍न कर देते हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि शास्‍त्रों के नाम पर कुछ भी ऊटपटॉंग लिख दें कोई उस पर आपत्ति नहीं करता । ऐसा लगता है किसी को पता ही नहीं कि वास्‍तव में गीता में क्‍या लिखा है ? इसलिए कोई जो कुछ भी लिख देता है हम मान लेते हैं कि हॉं यही सही है।

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर तुलसीशतक नाम से एक रचना प्रचारित की गई। इसकी तुकबंदियों में बावरी मस्जिद का उल्‍लेख किया गया । दावा किया गया कि यह तुलसीदास की रचना है। कुछ ही समय में वह वायरल हो गयी। वास्‍तव में तुलसीदासजी ने ऐसी कोई रचना ही नहीं की। निहित स्‍वार्थ पूर्ण करने के लिए तुकबंदियॉं कर लीं और तुलसीदासजी का नाम जोड़ दिया।

इसी प्रकार वाट्सएप यूनिवर्सिटी ने रामचरितमानस के उत्‍तरकांड में मानसरोग से संवंधित कुछ चौपाइयॉं लेकर घोषणा कर दी कि तुलसीदास जी ने कोरोना की भविष्‍यवाणी कर दी थी। फिर क्‍या था पढ़े लिखे मूर्खों ने उसे वायरल करना शुरू कर दिया। उन्होंने मानस खोलकर भी नहीं देखी अन्‍यथा उन्‍हें पता चल जाता कि यह मानस रोगों की दार्शनिक व्‍याख्‍या है, कोरोना की भविष्‍यवाणी नहीं।

गीता के साथ तो हम पहले से ही मजाक कर रहे हैं। आज हर दुकान पर ‘’गीता सार’’ चिपका मिल जाएगा जिसकी शुरूआत ही इस बाक्‍य से होती है – जो हुआ वह अच्‍छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्‍छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्‍छा होगा ........ । कितनी निराशा और अकर्मण्‍यता की बात है। जिस गीता में भगवान कृष्‍ण शुरुआत ही इस वाक्‍य से करते हैं कि अर्जुन यह उदासी तुम में कहॉं से आ गई ? तू नपुंसकता की ओर मत जाओ । हृदय की दुर्बलता को त्‍याग कर उठ खड़ा हो । अर्थात् पूरे पुरुषार्थ के साथ सामने आई परिस्थिति का सामना करो। गीता के 11 वें अध्‍याय में कृष्‍ण कहते हैं कि हे अर्जुन तुम निमित्‍त मात्र बन कर कार्य करो । यह दूसरी अवस्‍था है जब व्‍यक्ति का पुरुषार्थ चुक जाता है तब वह परम सत्‍ता से जुड़कर उसका निमित्‍त बनकर कार्य करता है। अब व्‍यक्ति की ताकत मात्र स्‍वयं की नहीं रहती । उसमें परमात्‍मा की ताकत मिल जाती है। वह अकेला नहीं होता है। अंतिम अवस्‍था वह है जब 18 वें अध्‍याय में भगवान कृष्‍ण कहते हैं कि तुम सभी कुछ त्‍यागकर ईश्‍वर की शरण में आ जाओ। तब व्‍यक्ति को निमित्‍त भी नहीं बनना । उसके सभी कार्य ईश्‍वर करने लगते हैं। यह पुरुषार्थ से शरणागति तक की यात्रा है। व्‍यष्टि से समष्टि की यात्रा है। विना पुरुषार्थ करे सीधे शरणागत हो जाना तो पलायन है, अकर्मण्‍यता है, नपुंसकता है। भगवान् भी गीता में इसका अनुमोदन नहीं करते परंतु दुकानों पर चिपके गीता सार तो यही सिखा रहे हैं। मेरा विचार है कि इन्‍हें या तो किसी अज्ञानी ने बनाया हैं और या ऐसे कुटिल ने बनाया है जो हमें अपने मूल शास्‍त्रों के प्रति अश्रद्धा से भर देना चाहता हो ।

कारण कुछ भी हमारे ग्रंथों के प्रति हम आम लोगों की अरुचि का परिणाम है कि शास्‍त्रों के नाम पर कोई कुछ भी लिख देता है और हम उसे स्‍वीकार कर लेते हैं। आप कहेंगे यदि यह प्रचलित गीता सार गलत है तो सही क्‍या है। मेरे पूज्‍य शिक्षक डॉ सुरेश चंद्र शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्‍तक ‘’व्‍यक्तित्‍तव विकास और भगवद्गीता’’ में लिखा है –

  1. जीवन कोई आकस्मिक संयोग या कारावास नहीं जिसमें मनुष्‍य हमेशा के लिए जकड़ लिया गया हो, अपितु खेल का मैदान है जिसमें खेल, खिलाड़ी और खेल सामग्री सब कुछ भगवान् हैं।
  2. मानव जन्‍म रोने या पलायन करने के लिए नहीं अपितु हँसते-हँसते और परिस्थितियों से जूझते हुए आत्‍म-विकास करने के लिए मिला है।
  3. मानव शरीर प्राप्‍त कर यदि हम बाधाओं के सामने सिंह-गर्जन न करें और गरुड़ के समान उड़ान न भरें तो हमारा जीवन व्‍यर्थ है।
  4. भगवान् हमसे उद्दंडता और लाचारी रहित तेजस्‍वी जीवन की मॉंग करते हैं तथा मानव को आश्‍वासन देते हैं, ‘’रो मत, कार्य कर, मैं साथ हूँ।‘’
  5. हम सदैव कहते रहें कि प्रभु की शक्ति से युक्‍त होकर मैं सब कुछ कर सकता हूँ, बन सकता हूँ। यह भोग जीवन से भाव जीवन और भाव जीवन से भागवत जीवन की ओर अग्रसर होने का मार्ग है।

एक बार रामचरितमानस, भगवद्गीता को खोलकर पढ़ तो लें शायद आपकी ऑंखें खुल जाऍं और आप को जीवन जीने की कुंजी मिल जाए । अन्‍यथा उद्दंड सोशल मीडिया और गैर जिम्‍मेदार प्रकाशन आपको आपकी जड़ों से काटने का कार्य बखूबी करते जा रहे हैं।

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ओपी श्रीवास्तव

ओपी श्रीवास्तव मध्यप्रदेशशासन में  भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के2007 बैच के अधिकारी है .वर्तमान में वे मुख्यमंत्री के अपर सचिव एवं संचालक जनसम्पर्क है .साहित्यकार  है .