क्या इस नई पारी में मुख्‍यमंत्री शिवराज खुद को ‘रिइन्वेंट’ करेंगे?

क्या इस नई पारी में मुख्‍यमंत्री शिवराज खुद को ‘रिइन्वेंट’ करेंगे?

मीडियावाला.इन।

शिवराजसिंह चौहान ने कोरोना के दहशत भरे माहौल में जब मध्‍यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चौथी बार शपथ ली तो उनके चेहरे पर कुछ ज्यादा ही विनम्रता और काम पर लौट आने का सुकून था। मानो बीते 14 महीने एक राजनीतिक दुस्वप्न की तरह थे, अब नया सवेरा है। यह सही है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद भी शिवराज का खुद पर भरोसा कायम था। एक सभा में उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से कहा भी था ‘टाइगर अभी जिंदा है..। एक हार के बाद भी युद्ध अंतिम रूप से जीतने का यह आत्म विश्वास महाराष्ट्र के पूर्व मुख्‍यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के चर्चित वाक्य ‘मैं फिर आऊंगा..’ से अलग था। ‘टाइगर’ अपना शिकार मौका देखकर करता है। लेकिन नशाने पर नजर पहले से रखता है। बड़ी हसरतों के बाद राज्य में सत्ता में आई कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अपने पैरों पर ठीक से चल भी नहीं पाई थी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने धोबी पछाड़ दांव चलकर सरकार को गिरा दिया। इसके बाद भाजपा में भी कुछ वक्त के लिए आंतरिक सत्ता संघर्ष चला, लेकिन नए मुख्‍यमंत्री के समक्ष आसन्न बहुआयामी चुनौतियों से निपटने की क्षमता और लोकप्रिय चेहरे के रूप में बाजी शिवराज के हाथ रही। इतना तय है कि मुख्‍यमंत्री के रूप में अपनी चौथी पारी में शिवराज की राह आसान उतनी आसान और निर्दवंद्व नहीं रहने वाली है। क्योंकि अब लोग जुमलों से ज्यादा फैसलों और फैसलों से ज्यादा ठोस अमल की फेज में आ गए हैं। इस परीक्षा में अगर वो खरे नहीं उतरे तो उनका भावी राजनीतिक कॅरियर भी दांव पर लग सकता है।

एक तो किसी राज्य का मुख्‍यमंत्री बनना कोई आसान बात नहीं होती। इस सर्वशक्तिमान पद तक पहुंचना हर राजनेता की दिली तमन्ना होती है। यदि जनता अपना जनादेश किसी पार्टी को सौंप दे तो भी सत्ता सिंहासन पर ताजपोशी के लिए चेहरे का चयन तो पार्टी आला कमान ही करता है। इस चयन के पीछे कई तकाजे, अपेक्षाएं, क्षमताएं और दबाव अपना रोल अदा करते हैं। और मिली हुई कुर्सी को ‘अटल सिंहासन’ में तब्दील करने का हुनर सम्बन्धित मुख्यमंत्री की कार्यशैली, समन्वय क्षमता, राजनीतिक चतुराई, विजन और जनता से कनेक्टीविटी पर निर्भर करता है। सिर्फ कार्यकाल को ही किसी राजनेता की अडिग लोकप्रियता का आधार मानें तो शिवराज चौथी बार सीएम बनते ही देश के उन चुनिंदा मुख्‍यमंत्रियों के ‘13 प्लस क्लब’ में शामिल हो गए हैं, जो लगातार तीन या उससे अधिक का कार्यकाल तथा सतत 13 वर्ष या उससे ज्यादा तक सीएम की कुर्सी पर काबिज रहे हैं। इस रिकाॅर्ड लिस्ट में पहला नंबर सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन चामलिंग का है, जो (येन केन प्रकारेण) लगातार 25 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे। चामलिंग के बाद दूसरे क्रमांक पर पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्‍यमंत्री और वरिेष्ठ माकपा नेता ज्योति बसु हैं। ज्योति दा सीएम के पद पर निरंतर 23 साल तक रहे। ज्योति बसु के बाद तीसरे नंबर पर माकपा नेता और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री मानिक सरकार रहे, जो मुख्‍यमंत्री के पद पर लगातार 20 साल तक रहे। चौथे नंबर अोडीशा के वर्तमान मुख्‍यमंत्री नवीन पटनायक हैं, जो 20 साल से राज्य के सत्ता धाम पर विराजे हुए हैं और वो चामलिंग का रिकाॅर्ड तोड़ सकते हैं। पांचवे नंबर पर दिल्ली की पूर्व मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित हैं, जो इस पद पर सतत 15 साल तक रहीं। उनके बाद अब शिवराज हैं, जो पहले निरंतर 13 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री रहे और अब एक अल्पकालिक ‘पाॅलिटिकल ब्रेक’ के बाद फिर मप्र के सीएम बन गए हैं। अब देखने की बात यह है कि शिवराज उपरोक्त मुख्यमंत्रियों में से किसका रिकाॅर्ड पहले तोड़ते हैं, उनकी पार्टी उन्हें किस ‘फिनिश लाइन’ को छूने देती है?

शिवराज पिछले विधानसभा चुनाव में जरूर चकमा खा गए हों, लेकिन उनकी पहचान एक जमीनी नेता के रूप में रही है। उन्होंने प्रदेश की राजनीति में व्यक्तिगत नाते-रिश्ते कायम कर जन विश्वास की हुंडी राजनीतिक रूप से भुनाने की एक नई सियासी शैली कायम की। यानी भले काम हो न हो, पूरा हो, अधूरा हो, लेकिन छाया के रूप में हमेशा आसपास दिखने का आभास देते रहे। प्रशासन की घोड़ी किसी चाल चले, ‘दूल्हे शिवराज’ से व्यक्तिगत नाराजी किसी को नहीं होती थी। मुख्‍यमंत्री के रूप में अपने पहले दो कार्यकाल में अपनी सहज उपलब्धता और सरल कनेक्टिविटी ने शिवराज को मप्र के ‘अजेय मुख्‍यमंत्री’ के रूप में स्थापित कर दिया। उनके धुर विरोधियों के पास भी शिवराज के इस ब्रह्मास्त्र की कोई काट नहीं थी। लेकिन तीसरा कार्यकाल आते-आते शिवराज का यही आत्मविश्वास कहीं अति आत्मविश्वास में तब्दील होने लगा। मुख्‍यमंत्री निवास पर लगी न्याय के काॅल बेल धीरे-धीरे कागज के फूल में बदलने लगी। सरलता और सहजता के झीने पर्दे लौह कपाट में तब्दील होने लगे थे। ‘मैं ही मैं’ पर सारे ‘लाइक्स’ फोकस होने लगे। नतीजा ये हुआ कि घोषणाओं की ज्यादातर फाइलें करप्ट हो गईं। जन हितैषी योजनाएं की बारिश होने लगी, किसानों के भले की बातें भी खूब हुईं, काल्पनिक आनंद को संस्थागत रूप देने की भी कोशिशें हुईं, बावजूद इन सबके जनभावना यह बनी कि जो हो रहा है या दिखाया जा रहा है, वह ठोस कम हवाई ज्यादा है। घोषणाओं के अंबार में रिजल्ट की आत्मा सिसकने लगी। चंद अफसरों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा नेताओं को जनता से दूर कर देता है। चाहे- अनचाहे नेता उसी चश्मे से अवाम को देखने लगते हैं, जो उनकी आंखों का नैसर्गिक नंबर नहीं होता। गलत नंबर का चश्मा लगाने से होने वाली लड़खड़ाहट को ही चुनावी शब्दावली में ‘राजनीतिक झटका’ कहते हैं।

यह भी सही है कि जमीनी नेता एक ठोकर खाकर संभल जाते हैं। शिवराज ने भी 14 माह पहले सत्ता खोई थी, हिम्मत नहीं। उन्होंने अपने भीतर के जुझारू ‘टाइगर’ को पस्त नहीं होने दिया। बल्कि कई बार तो ऐसा लगा कि मुख्‍यमंत्री नहीं रहते हुए भी वे सीएम से कहीं ज्यादा सक्रिय हैं, ऊर्जा से भरे हुए हैं, गंवाया हुआ मैच फिर जीतने के लिए बेकरार हैं। हालांकि आलोचकों ने शिवराज की इस राजनीतिक उद्यमिता को सत्ता के अखंड मोह के रूप में भी देखा, लेकिन ऊर्जावान नेता दांव हारता है, बाजी नहीं। शिवराज ने बाजी फिर जीत ली है, भले ही यह ‘बैक डोर पाॅलिटिक्स’ के माध्यम से क्यों न हो। सियासी शतरंज के शाॅर्ट कट से क्यों न हो।

इसमें दो राय नहीं कि नई परिस्थितियां 2005 में पहली बार सीधे मुख्यमंत्री बने उस युवा शिवराज की तुलना में ज्यादा कठिन और कांटों भरी हैं, जब शिवराज को केवल पार्टी के भीतर के असंतोष और उमा भारती की बगावत से निपटना था। साथ ही यह संदेश भी देना था कि मप्र में भाजपा की सरकारें पांच साल पूरे ही नहीं करती, बल्कि उस पर अंगद की तरह बैठ जाती हैं। इस बार साठ पार के शिवराज को जहां अलग राजनीतिक संस्कृति से आए सत्ताकांक्षी समूह को साधने और अपनी पार्टी में बगावत के सुरों को प्रार्थना गीत में बदलने की है। ज्योितरादित्य सिंधिया के रूप में राज्य में उभरे और पहली बार भाजपाई डेरे में अपना चिमटा गाड़ने वाले नए पावर सेंटर को साधे रखने की है। उनके समर्थक 22 पूर्व कांग्रेस विधायकों को भाजपा के कल्चर में दीक्षित करने की है। वरना शिवराज की यह चौथी पारी पहले की तरह एकाग्र बैटिंग वाली यकीनन नहीं होगी। पहला बड़ा चैलेंज तो कोरोना से निपटना ही है। इनके अलावा कुछ चुनौतियां शिवराज के अपने जमाने की ही हैं, जिनमे एक बड़ा संकट राज्य के खाली हो चुके खजाने को फिर से भरने का है। घोटालों और माफियाओं की छाया से खुद को अलग करने की है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने चुनावी दृष्टि पत्र में किसानों, युवाओं और महिलाओं के लिए कई योजनाओं का ऐलान किया था। इसके पहले सरकार का मानना था कि जनता को सीधे लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं वोटों की जमानत हैं। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। शपथ ग्रहण के बाद शिवराज ने कमलनाथ के सवा साल के कार्यकाल को ‘प्रदेश की बर्बादी का काल’ बताया तो पूर्व मुख्‍यमंत्री कमलनाथ ने इसी शब्द का इस्तेमाल भाजपा के 15 साल के कार्यकाल के लिए किया था। अगर ये दोनो सही हैं तो मप्र की वास्तविक हालत को हम क्या नाम दें? इसे आलोचना की ‘राजनीतिक शब्दावली’ मानकर छोड़ दें तो भी इस बात को अब माइक्रोस्कोप से जांचा जाएगा कि क्या सत्ता के इस नए सीक्वल में ‘हीरो’ के रूप में शिवराज अपने किरदार को रिइन्वेंट करेंगे, या उन्हीं गड्ढों को अनदेखा कर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे, जिन्होंने उनके सत्ता के रथ पर ब्रेक मार दिया था।

RB

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।