खास मुद्दों में उलझा आम आदमी !

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खास मुद्दों में उलझा आम आदमी 

*-अन्ना दुराई*

मन कचोटता है। कसमसाता है। लाचारी के दृश्य नजर आते हैं। भिक्षुओं की तरह वह यहाँ वहाँ गिड़गिड़ाता नजर आता है। सरकारी लालीपाप को लपकने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है। कागजों को बनवाने और उनमें सुधार के नाम पर दिन महीनों बिगाड़ता है। विभागीय अधिकारियों कर्मचारियों की डांट डपट खाता है। नियम वाले काम कराकर भी उनके अहसान तले दबता है। जैसे तैसे अपना दिन निकाल लेता है। यही है आम आदमी की नियति। सोचता हूँ नियम बनाने वालों का जाता क्या है। बिना सोचे समझे, जाने बिने इतने नियम थोप दिए जाते हैं, जिनका पालन आसान नहीं होता। नियमों को निभाते निभाते व्यक्ति का जीवन निभ नप जाता है। फिर भी सरकार के पास उसमें खामी निकालने की गली रहती है। कुछ सरकारी दस्तावेजों पर आज भी भूल चुक लेनी देनी लिखा होता है, लेकिन इस तरह की गलती करने पर आम आदमी भारी पीड़ा का शिकार होता है।

 

सरकारें भी समझदार होती है। वह आम आदमी को खास मुद्दों में उलझाकर रखती है। उसके सामने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुद्दे परोसे जाते हैं। भारत अमेरिका संबंध, रूस युक्रेन संघर्ष, यूरोपीय देशों के साथ व्यापार, विश्व सम्मेलन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इजरायल, डालर, पौंड, हिंदू मुस्लिम पता नहीं क्या क्या। ट्रंप के बारे में भारत की चौपालों पर आजकल ऐसी और इतनी चर्चा होती है मानों अपने किसी निकटतम रिश्तेदार या पड़ोसी की बात हो रही हो। सरकारी तंत्र इतना मजबूत है कि आम आदमी अपनी आम जरूरत की चीजों से अनभिज्ञ ही रह जाता है। अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा की दरें कम हो जाए तो भी वह खुश हो जाता है, मानों उसका रोज का आना जाना हो। वह बडे बड़े उद्योगपतियों द्वारा अर्जित की जाने वाली संपन्नता में अपनी कमाई होने की भूल कर बैठता है।

कुल मिलाकर आजकल एक नया ट्रेंड बाजार में है। असली मुद्दों से भटकाने का। व्यर्थ की बहस और चर्चा में डालकर जनता का टाइम पास कराने का। रोजमर्रा के आम जनजीवन में सड़क, पानी, ड्रेनेज, बिजली और यातायात जैसी विकराल समस्याओं से निजात सबसे बड़ी जरूरत है। इस दिशा में प्राथमिकता से काम करना होगा। माहिर सरकारें तो इन मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए टाइम पास करती रहेगी और नहीं चेती तो जनता का टाइम भी ऐसे ही पास हो जाएगा।