परिचर्चा: आजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी आयोजनों में पारम्परिक-आत्मीय अहसास क्यों नहीं दिखता!

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परिचर्चा: आजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी आयोजनों में पारम्परिक-आत्मीय अहसास क्यों नहीं दिखता !

इंदौर लेखिका संघ, इंदौर एवं पंडित दीनानाथ व्यास स्मृति प्रतिष्ठा समिति का संयुक्त आयोजन 

वर-वधू के साथ दो कुटुम्बों  के जुड़ने की मंगल परम्परा  है विवाह.  इसकी रीतियां मुदित मन के साथ नवजीवन में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करती हैं। ये रस्में खुले मन और दिल के साथ निबाह की प्रेरणा देती हैं।  अपने अपने पारिवारिक और सामाजिक परम्पराओं के आनंद के साथ इसे मंगल बेला में शुभ मुहूर्त और वैदिक मन्त्रों के साथ संम्पन्न किया जाता रहा है ,एक पारिवारिक सामाजिक संस्कार  जो अग्नी और परिजनों की साक्ष्य में उनकी उपस्थिति में और उनकी सहभागिता से सम्मन किया जाता था ,आजकल इस पर बाजार वाद हावी होगया पाणिग्रहण की ऋग्वेद से ली गई, प्रतिज्ञा कहती है- “गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथास:।’ इसका आशय है कि मैंने तुम्हारा हाथ थामा है और कामना करता हूं कि हमारा बंधन अटूट और सुखद हो। ये केवल कुछ शब्द नहीं, महज़ एक मंत्र नहीं, बल्कि विवाह संस्कार को परिभाषित करता एक ऐसा भाव है जिसमें दो मन, दो हृदय, दो प्राण, दो आत्माओं का मिलन समाहित है। जो दो परिवारों को जोड़ता है, वर-वधू को अपने जीवनसाथी, उसके परिवार, समाज और समूची प्रकृति के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए तैयार करता है।शादी नामक ‘इवेंट’ में आपका स्वागत होता है पर वह परिवार का दिली स्वागत नहीं इवेंट कम्पनी के द्वारा मशीनी या व्यासायिक भाव से  किया जाता है और कई बार एक ही शहर की कई शादियों में थीम ,गीत संगीत ,सजावट सब एक ही होती है शादी चाहे पंजाबी हो ,चाहे गुजराती .यह सब देख कर लगता है किआजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी  वैवाहिक आयोजनों में पारम्परिक खुश्बू क्यों नहीं आती ,ना रीती-रिवाजों में अब पारम्परिक रस्में दिखाई देती हैं .ना ही पारम्परिक व्यंजन .क्या सोचते है प्रबुध्ह लोग आइये पढ़ते है उनके विचार -संयोजक 

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डॉ .रूचि बागडदेव 
1.विवाह एक संस्कार था, अब उत्सव हो गया-मनीष मिश्रा,रायपुरफ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
विवाह एक संस्कार था, अब उत्सव हो गया, पहले एक स्त्री और पुरुष की शादी नहीं होती थी, परिवारों की शादी हुआ करती थी। थोड़ा बहुत अभी अग्रवालों, जैनों में यह व्यवस्था बची हुई है। पहले घर के बड़े बुजुर्ग शादी में ठुमके लगाते नहीं दिखते थे, उनको बारात के डांस में लाना याने एक टास्क होता था, वह सम्मान था, उनका। परिवारों में बुजुर्गों ने एक डिग्निटी बना कर रखी हुई थी। आधुनिकता और शिक्षा के ग़लत मायने निकाल कर, वह दूरियाँ हटा दी गईं। अब बुजुर्ग पुराने ख्याल के आउटडेटेड हो गए। शादी पहले 5 दिन और बाद में 3 दिनों में सिमटी। अब डेढ़ दिन का समय आ गया।
रिश्तों की जान अपेक्षा और उपेक्षा में बदल गई, जैसा आप करोगे, वैसा व्यवहार हम करेंगे, ने रिश्तों में गर्माहट कम कर दी। यहाँ तक की बिना काम के रिश्ते भी बंद से हो गए हैं। परिवारों में रिश्तों से ऊपर आर्थिक पक्ष महत्वपूर्ण हो गया। पहले संस्कार से रिश्ते थे, अब कौन कितना पैसे वाला, उसको वैसी अहमियत ने विवाह की रौनक समेट दी। खाने की पंगत में बैठने वालों से प्लेट लेकर रिसेप्शन में खड़े होकर खाने के सफ़र में मँहगाई 30 रुपये के खाने से 3000 रू पर प्लेट ने ख़ास रिश्तेदारों और स्वजन की सूची सीमित कर दी। काम आपस में रिश्तेदारों को बाँटना नहीं चाहते। फिर उम्मीद की सब खड़े रहें, बेमानी होगी। विवाह में सबको काम बाँटेंगे तभी ख़ुशबू लौटेगी ।
2.आजकल विवाह एक संस्कार नहीं प्रतियोगिता बन गया है,होड़ लगी है दिखावे की  — डॉ अनिता नाईक

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आजकल विवाह एक संस्कार नहीं प्रतियोगिता बन गया है पहले विवाह घर में ही संपन्न हो जाते थे, मिट्टी का आँगन… आम के पेड़ के नीचे बिछी दरी… और औरतों के गले से निकलते वे पारम्परिक गीत, जिनमें हँसी भी थी और आशीर्वाद भी। उस समय हल्दी की रस्म की महक घर की दीवारों तक बस जाती थी। औरतें हँसते-गाते हल्दी लगातीं, ढोलक बजती, सखियाँ चुटकियाँ लेतीं। अब हल्दी भी थीम के अनुरूप हो गई है। फोटोशूट के लिए रंगों का चुनाव होता है, रस्मों की आत्मा के लिए नहीं।
अब विवाह का आयोजन रोशनी से जगमगाते बड़े बड़े बैंक्वेट हॉल में होता है। सजावट ऐसी होती है कि मानो किसी फिल्म का सेट हो। डीजे की तेज धुन पर बच्चे-बड़े सब झूमते हुए मिलते है। सजावट के लिए फूल विदेशों से मंगवाए जाते हैं, खाना पचास प्रकार का बनता है और मेहमानों के स्वागत के लिए भी अलग से इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के लोग मिलते है तो अब पहले जैसी खुश्बू कहाँ मिलेगी ?
वर्तमान के विवाह परिवार के लिए एक चुनौती बन चुका है इस नई परम्परा को कोई भी माता-पिता पसंद नहीं करते है और यदि बेटी की शादी है उसमें कोई कमी न रह जाए। समाज क्या कहेगा? रिश्तेदार क्या सोचेंगे? महँगाई आसमान छू रही है। सोने के गहने, बैंक्वेट हॉल का किराया, कैटरिंग, कपड़े, गिफ्ट — हर चीज़ ने बजट की सीमा तोड़ दी। पर बेटी की खुशी और परिवार की प्रतिष्ठा के सामने माता पिता अपनी चिंताएँ छुपाएँ न छुपा सकते है ।
अब प्रतिष्ठा की होड़ में विवाह केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रदर्शन का मंच बन गया है। किसने कितने बड़े होटल में शादी की? कितने व्यंजन थे? दूल्हा किस गाड़ी में आया?
कई माता-पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर देते हैं — कर्ज़ तक ले लेते हैं — ताकि मान-सम्मान बना रहे। पर इस दौड़ में कहीं भावनाएँ पीछे छूट जाती हैं।ऐसे में हम ढूंढते है कि इन रस्मों की खुश्बू जिससे हमें संतोष और सुकून प्राप्त होता था।असल में वो असली खुश्बू क्या थी? वह खुश्बू थी, अपनेपन की।वह खुश्बू थी, रिश्तों की सादगी की।
वह खुश्बू थी सामूहिक श्रम की — जब पूरा मोहल्ला मिलकर शादी करवाता था।आज सब ‘पेशेवर’ हो गया है — सजावट से लेकर मेहमाननवाज़ी तक, इसी से रिश्तों की गर्माहट ठंडी पड़ती जा रही है।परंपरा केवल रस्मों में नहीं, भावना में होती है।यदि हम दिखावे की जगह भावनाओं को महत्व दें, तो भव्यता और परंपरा साथ-साथ चल सकती हैं।आज आवश्यकता है कि खर्च कम हो तो भी चलेगा, पर रिश्तों की मिठास बनी रहनी चाहिए।क्योंकि यादें रोशनी की नहीं, उस पारम्परिक खुश्बू की आती है… जो दिलों में बसती है।
3. शादियों पर भी बाजारवाद हावी हो गया है-राघवेंद्र दुबे

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हमारे विवाह समारोह टीवी सीरियल और फिल्मों के प्रभाव से ग्रस्त हो चुके हैं। शादियों पर भी बाजारवाद इतना हावी हो चुका है की मूल धार्मिक कर्मकांड – दूल्हे की एंट्री, दुल्हन के मेकअप, कपड़ों के प्रदर्शन, रिसेप्शन की दिखावट में दबकर रह गया है।
चलताऊ गानों पर भोंडा नृत्य प्रदर्शन इतनी देर तक चलता है कि जिस शुभ घड़ी में लग्न का मुहूर्त निकाला जाता है उसका कोई महत्व ही नहीं रह गया है। पहले कोई ना कोई बुजुर्ग इस प्रकार के होते थे जो डांट फटकार कर समय से कार्य करने पर जोर देते थे। आजकल वह पीढ़ी उपेक्षा के कारण मौन होकर तमाशा देखने वाली हो गई है।
अगर इस स्थिति में परिवर्तन लाना है तो प्रयास नई पीढ़ी को ही करना होगा।

4.भव्य होते विवाह समारोह सांस्कृतिक गंध से रीते-डॉ आरती दुबे

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भव्य होते विवाह समारोह सांस्कृतिक गंध से रीते क्यों? वाह… विषय ही ऐसा है कि सीधे दिल में उतरता है।आज सच में यह प्रश्न खड़ा होता है — रोशनी बढ़ी है, पर उजाला घटा क्यों है?
भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो वंश परंपराओं का संगम माना गया है। वैदिक परंपरा में विवाह को संस्कार कहा गया — अर्थात जीवन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया। पर आज के दौर में प्रश्न उठता है कि जब विवाह समारोह पहले से अधिक भव्य, खर्चीले और तकनीकी रूप से आकर्षक हो गए हैं, तो उनमें वह सांस्कृतिक सुगंध क्यों क्षीण होती जा रही है?
पहले विवाह का केंद्र विधि-विधान और संस्कारिक अर्थ हुआ करता था। सप्तपदी के मंत्र, कन्यादान की भावना, अग्नि की साक्षी — सबका एक आध्यात्मिक आधार था।आज विवाह एक “इवेंट” बन चुका है। वेडिंग प्लानर, थीम डेकोर, प्री-वेडिंग शूट, डेस्टिनेशन मैरिज — सब कुछ है, पर अर्थ का गहरापन कम होता दिखता है। मंत्रों का उच्चारण होता है, पर उनके अर्थ से जुड़ाव नहीं होता।आज विवाह सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच बन गया है। कौन सा रिसॉर्ट? कितने कोर्स का भोजन? किस डिजाइनर का लहंगा? किस सेलिब्रिटी सिंगर की प्रस्तुति?भव्य सजावट, लाइटिंग और आतिशबाज़ी के बीच विवाह की आत्मा कहीं दब जाती है।
यह प्रतिस्पर्धा संस्कृति नहीं, उपभोक्तावाद को जन्म देती है।
लोक परंपराओं का क्षरण
भारतीय विवाहों में क्षेत्रीय लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा, घरेलू रस्में और सामूहिक सहभागिता की गहरी परंपरा रही है।
आज डीजे की तेज धुनों में वे लोकगीत दब गए हैं।हल्दी और मेहंदी की रस्में भी “फोटो-सेशन” का हिस्सा बन गई हैं।
जहाँ पहले पूरा गाँव या मोहल्ला सहभागी होता था, अब आयोजन सीमित मेहमानों और दिखावे तक सिमट गया है।विवाह का मूल उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की संतुलित यात्रा का आरंभ था।अग्नि के समक्ष लिए गए वचन जीवन के नैतिक अनुबंध होते थे।पर आज अधिकांश नवदंपत्ति स्वयं उन वचनों का अर्थ नहीं जानते।संस्कार की आत्मा अनुवाद की प्रतीक्षा में खड़ी है।
मंत्रों का अर्थ समझाया जाए।
लोकगीत और पारंपरिक रीति-रिवाजों को पुनर्जीवित किया जाए।विवाह को सामाजिक प्रतिस्पर्धा नहीं, सांस्कृतिक उत्सव बनाया जाए।सादगी और गरिमा का संतुलन रखा जाए।जब आधुनिकता और परंपरा का समन्वय होगा, तब विवाह पुनः अपनी सांस्कृतिक सुगंध से महकेगा।आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि विवाह कम भव्य हों, बल्कि इस बात की है कि वे अधिक अर्थपूर्ण हों।रोशनी, सजावट और संगीत के बीच यदि संस्कार की लौ जलती रहे, तो भव्यता भी संस्कृति की सहचरी बन सकती है।अन्यथा, हम केवल चमकते मंचों पर संस्कारों की छाया भर देख पाएँगे।
5.आज शादी में केवल प्रदर्शन रह गया है तेल ,मंडप, बन्ना -बन्नी चाक-भात,घोड़ी,रतजगा सब गायब -आशा जाकड़ ‘आस’

एक या अधिक लोग और लोग मुस्कुरा रहे हैं की फ़ोटो हो सकती है

आजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी घरों में वैवाहिक आयोजनों में पारंपरिक खुशबू क्यों नहीं आती ,ना रीति रिवाज में पारंपरिक रस्में में दिखाई देती है?
विवाह वैदिक परम्परानुसार विवाह एक पवित्र संस्कार है। इसकी सुगंध परिवार को ही नहीं बल्कि आसपास के वातावरण को भी सुगंधित करती थी। आज आपाधापी, सुविधा संपन्न और व्यस्तता के दौर में विवाह परंपरागत ना होकर एक औपचारिक उत्सव बन गया है जिसमें परंपराएं और रीति रिवाज सब गौण हो गए हैं ।बस चटक- मटक ,भड़कीली पोशाक ,नाच गाना रह गया है ।
जो शादी पहले आठ/ 10 दिन में होती थी अब दो दिन में हो रही हैं। 2 दिन में शादी का क्या गाना क्या बजाना ।आज सभी परंपराएं परंपराओं ने औपचारिकता का बाना पहन लिया है। पूरी शादी में ढोल बजता है या डीजे बजता है
आज रीति रिवाज सब खोते जा रहे हैं। शादी एक इवेंट मात्रा हो गई है। मेहंदी हल्दी ने आधुनिक रूप ले लिया है मेहंदी में सभी हरे वस्त्र पूरी सजावट हरी चाहे हाथों में मेहंदी हो या ना हो, हल्दी में सब पीत वर्ण चाहे दूल्हा -दुल्हन के हल्दी ठीक से लगी ही ना हो ।आज शादी में केवल प्रदर्शन रह गया है तेल ,मंडप, बन्ना -बन्नी चाक-भात,घोड़ी,रतजगा सब गायब हो गए हैं जिन पर पहले गीतों की बौछार होती थी। चाक-भात का उत्सव बड़ी धूमधाम से होता था पर आज समयाभाव के कारण यह उत्सव भी छूमंतर सा हो गया है। दो दिन पूरे होते ही मेहमानों का जाना शुरू हो जाता है लड़की की विदाई से पूर्व ही अतिथियों की विदाई प्रारंभ हो जाती है।
विवाह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवार ,दो संस्कृतियों का मिलन होता है ।पंडित जी श्लोक के द्वारा विवाह का अर्थ बतलाते हैं आज वह भी बड़े संक्षेप में किया जाने लगा है। आज शादी पहले की अपेक्षा बहुत खर्चीली, भव्य सजावट और तकनीकी साधनों से परिपूर्ण होती है।
आजकल प्री वेडिंग शूट होता है जिसमें बहुुत खर्च हो जाता है।जो फूहड़ता का प्रतीक है। आजकल काॅकटेल पार्टी का प्रचलन बढता जा रहा है। जो पाश्चात्य संस्कृति का प्रतीक है। हमारी भारतीय संस्कृति कहां जा रही है, विवाह उत्सव की गरिमा व पवित्रता कम होती जा रही है।
6.सजावट के साथ संवेदना भी हो और मंच के साथ आंगन की स्मृति भी जीवित रहे, तभी विवाह उत्सव-यादगार और आत्मीय रहेंगे -राजेश जयंत 

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आजकल के विवाह पहले से कहीं अधिक भव्य हैं। रोशनी आसमान छूती है, सजावट आंखों को बांध लेती है, आयोजन में कोई कमी नहीं रहती। सब कुछ बड़ा है, व्यवस्थित है, प्रभावशाली है।
लेकिन कभी कभी लगता है कि इस बड़ेपन में कुछ छोटा सा बहुत जरूरी तत्व पीछे छूट गया है- वह अपनापन।
कभी शादी घर की दीवारों से शुरू होती थी। हल्दी की खुशबू रसोई तक जाती थी। मेंहदी लगाते समय हंसी बिना कारण फूट पड़ती थी। दादी की आवाज में गाया गया बन्ना गीत किसी माइक्रोफोन का मोहताज नहीं होता था। विदाई के आंसू सजाए नहीं जाते थे, वे अपने आप आ जाते थे।
आज सब कुछ समय से बंधा है। रस्में पूरी होती हैं, पर उनमें ठहराव कम है। काम किराए के कलाकार करते हैं, अब रस्मों में रिश्तों का हाथ कम लग पाता है।भव्यता बुरी नहीं है। आधुनिकता भी नहीं। पर विवाह की असली गरिमा रोशनी की ऊंचाई से नहीं, रिश्तों की गहराई से बनती है।सजावट के साथ संवेदना भी हो और मंच के साथ आंगन की स्मृति भी जीवित रहे, तभी विवाह सच में उत्सव बनता है- “केवल आंखों का नहीं, हृदय का”
7.अब सिर्फ फ़ैशन शो भव्य विवाह रह गया है अतः पारस्परिक रस्में नहीं  दिखाई देती- प्रभा तिवारी
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क्योंकि आज के परिवेश में परिवार में ही एक दूसरे को अपना स्टेटस,दिखावा , शोबाजी आडम्बर में व्यक्ति इतना ग्रसित हो गया है कीअपने घर में बुजुर्गों, अपने माता-पिता का, दादा दादी का वो सम्मान, महत्व नही रहा जो पहले के जमाने में था पहले दादा दादी नाना नानी के इर्द-गिर्द बैठकर शादी का मीनू तैयार करते थे औरपहले शादी में 8:15 दिन पहले से परिवार के लोग मामा मामी मौसी, काका काकी सब मिलकर हर काम ,रीति रिवाज से लेकर हंसी मजाक, शादी के गीत ढोलक पर गाती थी भुआ,मामी,मौसी गाती थी डांस करती थी।अब वो सब नगण्य हो गया ।
इसलिए वो जो पारंपरिक खुशबू जो माता पूजन से शुरू होती थी और बेटी की बिदाई तक जो रस्में निभाई जाती थी वो आज के परिवेश में धूमिल हो गई।
पहले महिलाएं पुरुष साधारण सज-धज कर तैयार होते थे और ज्यादा हमारी भारतीय संस्कृति, रीति रिवाज को शादी में मान्यता देते थे अब सिर्फ फ़ैशन शो भव्य विवाह रह गया है अतः पारस्परिक रस्में न दिखाई देती है।

8.शादी सिर्फ़ एक घर में होती थी किंतु उत्सव पूरा मोहल्ला मनाता था-सपना उपाध्याय

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आज का विषय मेरे अन्तर्मन में कई वर्षों से उमड़ – घुमड़ रहा था आज अपने विचार इस संदर्भ में व्यक्त करने का अवसर प्राप्त हुआ है ।हमारी प्राचीन सामाजिक व्यवस्था को चार भागो में बाँटा गया था -(१ )ब्रह्मचर्य आश्रम ०-२५ वर्ष (२) गृहस्थाश्रम २५-५० वर्ष (३) वानप्रस्थ आश्रम ५०-७५ वर्ष (४) सन्यास आश्रम ७५-१०० वर्ष, वैसे तो सभी सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण थे किंतु इनमे गृहस्थाश्रम जीवन को पूर्णता प्रदान करने के कारण अति महत्व रखता था ।समय बीतता गया और संस्कारों की जगह आडंबर ने लेली ।
पुराने समय की शादी में बेन -बेटियों ,मासी , बुआ का बेसब्री से इंतजार होता था।हर रस्म को बखूबी निभाया जाता था ,कम पकवान सही किंतु साथ बैठ कर हँसी ठिठोली के साथ खाना खाने का स्वाद बड़ा देता था ,अपने -अपने प्रांत बोली अनुसार लोकगीत ,भजन गाने का अपना ही ढंग था दोनों पक्षों द्वारा गाली गाने का मज़ा तो भारत – पाक क्रिकेट देखने जितना आनंद देता था ।सिर्फ़ वर-वधू नहीं दो परिवारों का आजीवन के लिए मिलन होता था ।कोई दिखावा नहीं कोई आडंबर नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ आत्मीयता ।शादी सिर्फ़ एक घर में होती थी किंतु उत्सव पूरा मोहल्ला मनाता था ।मनुहार ऐसी की नावन सात दिन पहले से कुटुंब संग् पामना (मेहमान ) का न्योता दे आती थी ।यदि किसी कन्या के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती थी तो सब राशि इखट्टा कर कन्या को ब्याह देते थे ।
चलिए अब वर्तमान के विवाह की तरफ़ रुख़ करते है ।
सबसे पहले तो यह तय किया जाता है कि किस दिन के कार्यक्रम में किसको बुलाना है फिर मनुहार पत्रिका ताकि तय हो जाए की कौन -कौन आ रहा है ? किसको कहा ठहराना है इत्यादि सब आपकी आर्थिक स्थिति को देख कर तय किया जाता है । सारे रस्मों रिवाज को ताक पर रखकर बच्चों से लेकर बूढ़ो का रुझान सिर्फ़ कपड़ो और अन्य दिखावे की वस्तुओं पर केंद्रीत रहता है । वर वधू अपनी मस्ती में मस्त और रिश्तेदार सेल्फी और रील बनाने में मस्त
खाने का तो पुछो ही नहीं साल भर का खाना दो दिनों में खिला दिया जाता है चावल -६ प्रकार के , दाल -४ प्रकार की सब्ज़िया अनगिनत ,मिठाइयाँ ,मेवे और ना जाने क्या क्या माँ अन्नपूर्णा भी सोचती होगी की मेरा क्या हाल कर दिया है ?
सभी शादिया वर्तमान में ऐसी होती है ऐसा भी नहीं है कुछ लोग आज भी बहुत समृद्ध होते हुए भी सादगी पसंद शादिया करते है । शादिया भव्य नहीं शालीन होनी चाहिए जिसमे दिखावा नहीं रीतरिवाज और परंपरा को अधिक महत्व देना चाहिए ।काश हम सब मिलकर पुनः इस संस्कार को एक नवीन सुंदर रूप दे सके ।
9.आज के वैवाहिक भव्य आयोजनों में घरों की वैवाहिक आयोजन की खुशबू मानो ख़ो सी गई है-सुषमा शुक्ला

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आज के समय में एक प्रतियोगिता सी हो गई है दिखावे की और सादगी सरलता स्नेह को समय लील कर गया
आज के भव्य विवाह में चमक-दमक का शोर बहुत है, पर आत्मीयता की मधुर तान कहीं खो गई,
रस्में निभती तो हैं, पर भावनाओं की सुगंध नहीं, मानो परंपरा की आत्मा ही सो गई।दिखावे की दौड़ में रिश्तों का सरल स्पर्श पीछे छूट गया, हर पल कैमरों में कैद हो रहा है,रीति-रिवाज का मर्म समझने की जगह, सब कुछ एक प्रदर्शन बनकर ही रह गया है।
यदि फिर से खुशबू चाहिए, तो रीति में भावना का दीप जलाना होगा,
हर रस्म के अर्थ को समझकर, उसे दिल से निभाना और अपनाना होगा।
सादगी और अपनापन जब विवाह का आधार बनेंगे, तब परंपरा मुस्कुराएगी,
बड़ों के आशीर्वाद और स्नेह की छाया में, हर रस्म फिर से महक उठ जाएगी।
10. आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। अब पारंपरिक गीतों की जगह डीजे की धुनें गूंजती हैं-  डाॅ.दविंदर कौर होरा, इंदौर

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आज का समय प्रदर्शन और वैभव का समय है। विवाह जैसे पवित्र संस्कार भी इससे अछूते नहीं रहे। बड़े-बड़े बैनकेट हॉल, डेस्टिनेशन वेडिंग, थीम डेकोरेशन, डीजे नाइट और सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारण, सब कुछ पहले से अधिक भव्य और आकर्षक दिखाई देता है। फिर भी एक प्रश्न मन में उठता है कि इतनी चमक-दमक के बाद भी वैवाहिक आयोजनों में वह पारस्परिक खुशबू क्यों नहीं आती? जो पहले साधारण घरों में भी सहज रूप से बिखरी रहती थी। क्यों अब रीति-रिवाजों में पारस्परिक रस्मों का रस कम होता जा रहा है?
सबसे पहले समय की भागदौड़ इसका प्रमुख कारण है। पहले विवाह कई दिनों तक चलता था। घर के आंगन में हल्दी, मेहंदी, मंडप और सात फेरे जैसे संस्कार पूरे परिवार और पड़ोसियों की सहभागिता से संपन्न होते थे। आज कार्यक्रमों के इवेंट की तरह व्यवस्थित किया जाता है, जहाँ हर रस्म समय सीमा में बांध दी जाती है। रस्मों का आत्मीय भाव कम होकर और रिक्तता बढ़ गई है।
दूसरा कारण है.. बदलती जीवन शैली और पाश्चात्य प्रभाव।
आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। अब पारंपरिक गीतों की जगह डीजे की धुनें गूंजती हैं, लोकगीतों की जगह फिल्मी गीतों पर नृत्य होता है। दादी- नानी द्वारा सिखाई गई रस्मों की जगह वेडिंग प्लैनर की सूची चलती है। परिणामस्वरूप वह सौंधी महक जो पारिवारिक सहभागिता और सांस्कृतिक परंपरा से आती थी, धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी है।
तीसरा कारण है ..संयुक्त परिवारों का विघटन।
पहले विवाह पूरे परिवार का उत्सव होता था, चाचा- ताऊ, मामा- मौसी, बुआ- फूफा सभी मिलकर तैयारियां करते थे। रिश्तों की गर्माहट ही विवाह की असली खुशबू थी।
अब अधिकांश परिवार छोटे हो गए हैं, रिश्तेदार दूर शहरों या विदेशों में बस गए हैं। समारोह में अतिथियों की संख्या भले अधिक हो, पर आत्मीयता की निकटता कम हो गई है।फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि परंपराएं पूरी तरह समाप्त हो गई हैं।
कई परिवार आज भी विधि-विधान से विवाह करते हैं और पारस्परिक रस्मों को जीवित रखने का प्रयास करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिक सुविधाओं को अपनाते हुए भी अपने सांस्कृतिक जड़ों को ना भूलें। विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का संगम है। यदि हम उन्हें प्रेम, सम्मान और पारिवारिक सहभागिता को प्राथमिकता दें, तो भव्यता के साथ पारंपरिक खुशबू भी स्वतः लौट आएगी।

11.कृतज्ञता भी अब नदारद है की आप हमारी ख़ुशी में समय निकाल कर शामिल हुए – विभा शर्मा 

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विवाह केवल महंगे कपड़ों ,गहनों और मेकअप के एल्बम बनाना नहीं होते ,इवेंट मेनेजर की रूचि भव्यता भले ही दे दे पर वह आत्मीयता नहीं दे सकती जो आपके आगमन पर मेजबान के चेहरे पर हुआ करती थी ,और समारोह के बाद की कृतज्ञता भी अब नदारद है की आप हमारी ख़ुशी में समय निकाल कर शामिल हुए ,अब सब कुछ मेसेज भेज कर कम्पनी ही कर देती है निमंत्र्ण से बिदाई तक.कई बार मुहूर्त निकल जाते है मेकअप के पार्लर से दुल्हन की आने में विलम्ब के कारण ,ना देवताओं का आव्हान ,ना शुद्ध वातावरण ना भाव बचे हैं .     कुलदेवी-कुलदेवता का पूजन वंशपरंपरा और पूर्वजों से जोड़ता है। नदी-तालाब की मिट्‌टी, कुएं का पानी, आम के पत्ते, बांस आदि की अनिवार्यता बताती है कि हमारा सबकुछ प्रकृति पर निर्भर है, हमें अपने हर कर्म, हर निर्णय में प्रकृति का ध्यान रखना है।
हल्दी सौभाग्य और उज्ज्वलता का प्रतीक है। शादी में हल्दी की रस्म इसके पीत रंग और सुगंध के ज़रिए समूचे कुनबे को प्रीत के अपनेपन से सराबोर कर देती है। शहनाई की मंगल ध्वनि शुभता और दिव्यता की अनुभूति कराती है। आब विवाह का सेट ,स्टेज ,रिसोर्ट की कीमत ,भोजन की सीरिज ही विवाह माना जाने लगा है .