
बचपन को बोझ मत बनाइए : उसे उड़ान भरने दीजिए
पूनम गौरव जैन
बचपन विकास का समय है, दबाव का नहीं। बचपन जीवन का वह सबसे कोमल और संवेदनशील दौर होता है, जब बच्चा केवल अक्षर नहीं सीखता बल्कि अपने आसपास की दुनिया को समझना शुरू करता है। आम तौर पर स्कूली जीवन के शुरुआती वर्षों में बच्चे का मन, उसकी सोच और आत्मविश्वास आकार लेता है। दुर्भाग्य से आज इसी दौर में उस पर अपेक्षाओं, लक्ष्य निर्धारण और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा का बोझ डाला जाने लगा है।

▪️अधूरी इच्छाओं का बोझ बच्चों पर न डालें
अक्सर माता पिता अनजाने में ही बच्चों पर अपनी अधूरी इच्छाओं का बोझ लाद देते हैं। कोई चाहता है कि बच्चा डॉक्टर बने, कोई इंजीनियर, कोई अफसर। बच्चे की रुचि, उसकी क्षमता और उसका स्वभाव पीछे छूट जाता है और आगे रह जाती है केवल तुलना, रैंक और प्रदर्शन की दौड़। यह दौड़ बच्चे को आगे नहीं बढ़ाती, बल्कि उसे भीतर से तोड़ने लगती है।

▪️आजाद सोच के बिना बचपन अधूरा है
इस उम्र में बच्चों को सबसे पहले आजाद सोच की जरूरत होती है। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि वे जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार्य हैं। जब बच्चे को बार बार यह बताया जाता है कि उसे क्या बनना है, कैसे बनना है और दूसरों से बेहतर कैसे बनना है, तो उसका बचपन धीरे धीरे डर और दबाव में बदल जाता है।
▪️मार्गदर्शन जरूरी है, नियंत्रण नहीं
बच्चों को बंदिशों में बांधना समाधान नहीं है। इसका मतलब यह भी नहीं कि उन्हें बिल्कुल खुला छोड़ दिया जाए। मार्गदर्शन जरूरी है, लेकिन नियंत्रण नहीं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन डर नहीं। ध्यान रखना जरूरी है, लेकिन निगरानी के नाम पर घुटन नहीं। बच्चे को यह भरोसा चाहिए कि गलती करने पर उसे डांटा नहीं जाएगा, बल्कि समझाया जाएगा।

▪️पढ़ाई के साथ खेल और जीवन का अनुभव भी जरूरी
पढ़ाई महत्वपूर्ण है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन पढ़ाई ही सब कुछ नहीं है। जीवन में जितनी जरूरत ज्ञान की है, उतनी ही जरूरत खेल, प्रकृति और सामाजिक अनुभवों की भी है। खेल केवल शरीर को मजबूत नहीं करता, वह टीम भावना सिखाता है, हार जीत को स्वीकार करना सिखाता है और आत्मविश्वास पैदा करता है।
▪️किताबी नहीं, व्यावहारिक शिक्षा की जरूरत
आज की शिक्षा व्यवस्था बच्चों को किताबी ज्ञान तक सीमित कर रही है। अंकों को सफलता का पैमाना बना दिया गया है। जबकि असली शिक्षा वह है, जो बच्चे को व्यावहारिक बनाती है। उसे सवाल पूछने की आजादी देती है और सोचने, प्रयोग करने व अपनी राह खोजने का अवसर देती है।

▪️बिंदास बचपन ही मजबूत मन बनाता है
इस उम्र में बच्चों को बिंदास होना चाहिए। हंसना, खेलना, गिरना, उठना, दोस्त बनाना, झगड़ना और फिर सुलह करना, यह सब उनके मानसिक विकास का हिस्सा है। जब हम उन्हें हर समय तुलना और अपेक्षाओं में बांध देते हैं, तो हम उनसे उनका स्वाभाविकपन छीन लेते हैं।
▪️हर बच्चा अलग है और यही उसकी ताकत
माता पिता और समाज की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को सहारा दें, दिशा दें, लेकिन अपनी मर्जी उन पर न थोपें। बच्चे को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अपनी रुचि पहचाने। कोई बच्चा खेल में अच्छा है, कोई कला में, कोई विज्ञान में, कोई लोगों से जुड़ने में। हर बच्चा अलग है और यही उसकी असली ताकत है।

▪️भरोसे से बनता है भविष्य
एक खुशहाल, संतुलित और आत्मविश्वासी बच्चा ही आगे चलकर एक जिम्मेदार नागरिक बनता है। इसलिए जरूरी है कि हम बचपन को प्रतियोगिता का मैदान न बनाएं। उसे सीखने, समझने और आनंद लेने का अवसर दें। मजबूत भविष्य की नींव डर और दबाव से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और स्वतंत्रता से रखी जाती है।
बचपन को बोझ मत बनाइए। उसे जीने दीजिए। उसे उड़ान भरने दीजिए। यही सबसे बड़ी शिक्षा है।





