
भावनात्मक और प्रेरणादायक कहानी: जिन हाथों ने अपना सुहाग उजाड़ा, वही हाथ अब दूसरों के सुहाग का सामान बना रहे हैं
बड़वानी : मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले की सेंट्रल जेल से एक ऐसी भावनात्मक और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जो यह साबित करती है कि इंसान चाहे कितनी भी बड़ी गलती क्यों न कर बैठे, अगर उसे सही दिशा और अवसर मिले तो वह खुद को बदल सकता है। जिन महिलाओं के हाथों पर कभी अपने ही पति की हत्या का आरोप लगा, आज वही हाथ दूसरों के सुहाग के लिए साज-सज्जा का सामान तैयार कर रहे हैं। यह उनके लिए सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक गहरे प्रायश्चित और नई जिंदगी की शुरुआत है।

आदिवासी बहुल निमाड़ क्षेत्र में स्थित इस जेल में महिला कैदियों के लिए “मुक्ति” नाम का एक स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाया गया है। यह समूह उम्मीद, आत्मनिर्भरता और एक नए जीवन की राह का प्रतीक बन गया है। जेल प्रशासन के इस प्रयास का मकसद महिलाओं को ऐसे कौशल सिखाना है, जिससे वे जेल से बाहर निकलने के बाद सम्मानजनक जीवन जी सकें। इस तरह की पहल करने के निर्देश पूरे प्रदेश में जेल डीजीपी ने जारी किए थे।

जेल अधीक्षक शेफाली तिवारी के अनुसार, “मुक्ति” समूह का पंजीकरण जून 2025 में किया गया। उन्होंने बताया कि जेल का जीवन महिलाओं के लिए बेहद कठिन होता है। यह दरअसल उनके लिए जेल के अंदर जेल होती है । जहां पुरुष कैदी विभिन्न गतिविधियों में खुद को व्यस्त रख लेते हैं, वहीं महिलाएं सीमित जगह में रहकर अधिक मानसिक और भावनात्मक दबाव झेलती हैं। ऐसे में इस तरह की गतिविधियां उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाने और उनके दुख को कम करने में मदद करती हैं।

इसी उद्देश्य से जेल परिसर में महिलाओं के लिए कार्यशाला, शेड और बच्चों के लिए आंगनबाड़ी की व्यवस्था की गई है। वर्तमान में बड़वानी सेंट्रल जेल में करीब 1100 कैदी हैं, जिनमें 36 महिलाएं शामिल हैं। इनके साथ छह छोटे बच्चे भी रह रहे हैं।

“मुक्ति” समूह में शुरुआत में 10 महिला कैदियों को शामिल किया गया था, जिनमें अधिकतर वे थीं जो अपने पति की हत्या के मामलों में सजा काट रही हैं या विचाराधीन हैं। समय के साथ कुछ महिलाओं के जमानत पर रिहा होने के बाद उनकी जगह नई महिलाओं को शामिल किया गया, जिससे समूह का काम लगातार चलता रहा।
इस समूह के माध्यम से महिलाओं को ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI) के प्रशिक्षकों द्वारा कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शुरुआत में उन्होंने जेल के बगीचे में उगाए गए आम और नींबू से अचार बनाना शुरू किया। आज स्थिति यह है कि जेल ने बाहर से अचार खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया है।
समय के साथ महिलाओं ने अपने हुनर का दायरा बढ़ाया। रक्षाबंधन के मौके पर उन्होंने करीब 70 किलो लड्डू तैयार किए, जिन्हें जेल में आए आगंतुकों ने खरीदा। साथ ही सुंदर राखियां भी बनाई गईं। गणेश चतुर्थी और नवरात्रि जैसे त्योहारों पर मिठाइयां, पारंपरिक आभूषण, पायल, चूड़ियां और रंग-बिरंगी डांडिया तैयार की गईं।
अब ये महिलाएं शादी-ब्याह के सीजन के लिए दुल्हन के सामान की आकर्षक पैकेजिंग भी तैयार कर रही हैं। साड़ियों और श्रृंगार के सामान के लिए बनाए गए खूबसूरत बॉक्स और पैकेट बाहर बाजार में भी भेजे जा रहे हैं। जेल प्रशासन ने इसके लिए एक ब्यूटी पार्लर से समझौता किया है, जिससे इन उत्पादों की मांग बढ़ने की उम्मीद है।
निमाड़ के प्रसिद्ध गणगौर पर्व के लिए भी समूह ने विशेष सामग्री तैयार की है और इसके प्रचार के लिए विज्ञापन भी जारी किए हैं। अन्य महिला कैदी भी इस समूह की सदस्याओं को काम करते देख सीख रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मिलेट्स को “श्री अन्न” के रूप में बढ़ावा देने के अभियान के तहत, इन महिलाओं ने मिलेट आधारित खाद्य पदार्थ बनाना भी सीखा है। वे अब दक्षिण भारतीय व्यंजन भी तैयार कर रही हैं और इसके लिए पंजीकरण की प्रक्रिया में हैं।
इन महिलाओं की व्यक्तिगत कहानियां भी उतनी ही मार्मिक हैं। साविताबाई ने अपने पति की शराबखोरी से परेशान होकर उसकी हत्या कर दी थी। सात साल की सजा काटने के बाद अब वह सिलाई सीखकर आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं। सरोज ने भी वैवाहिक विवाद में पति की हत्या की थी और अब सीखे हुए कौशल के जरिए रोजगार पाना चाहती हैं। आशा, जो पहले ढाबा चलाती थीं, अब मिलेट आधारित व्यंजन सीखकर भविष्य में अपने ढाबे में इसे शुरू करने की योजना बना रही हैं। वहीं नाहिदा और कलावती जैसी महिलाएं भी जेल से बाहर निकलकर अपना व्यवसाय शुरू करने का सपना देख रही हैं।
इन महिलाओं का कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि इतनी बड़ी गलती के बाद उन्हें जेल में ऐसा अवसर मिलेगा, जहां वे कुछ नया सीख सकें और अपने मन का बोझ हल्का कर सकें। ज्यादातर महिलाएं सिलाई सीखने को लेकर उत्साहित हैं, क्योंकि यह उनके लिए भविष्य में स्थायी रोजगार का साधन बन सकता है।
जेल अधीक्षक के अनुसार, हाल ही में गुड़ी पड़वा के अवसर पर समूह की महिलाओं के कैंटीन खातों में उनकी कमाई की राशि जमा की गयी है, जिससे उनका आत्मविश्वास और भी बढ़ रहा है।
“मुक्ति” समूह आज बड़वानी केंद्रीय जेल में पुनर्वास, आत्मनिर्भरता और नई शुरुआत का प्रतीक बन चुका है। यह न केवल इन महिलाओं के जीवन को बदल रहा है, बल्कि समाज को भी यह संदेश दे रहा है कि हर व्यक्ति को एक दूसरा मौका मिलना चाहिए।





