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सांसद असदुद्दीन ओवैसी कह रहे हैं कि हिजाब पहनकर हमारी बेटियां स्कूल-कॉलेज जाएंगीं, डॉक्टर बनेंगीं, इंजीनियर बनेंगीं, एसडीएम बनेंगीं, कलेक्टर बनेंगीं और इंसा अल्लाह उस दिन भले ही मैं न रहूं, लेकिन एक दिन वह भी आएगा जब हिजाब पहनने वाली हमारी बेटी प्रधानमंत्री भी बनेगी।तो हिजाब मामले में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान कह रहे हैं कि यह कंट्रोवर्सी नहीं है बल्कि मुस्लिम लड़कियों को चार दीवारी में कैद रखने की सोची समझी साजिश है। देश की दूसरी लड़कियों, महिलाओं की तरह मुस्लिम लड़कियां, महिलाएं भी बहुत अच्छा परफार्म कर रही हैं और लडकों से बहुत आगे हैं। उनका आशय यही है कि मुस्लिम लड़कियों को “हिजाब” में समेटने की जरूरत कदापि नहीं है।
हिजाब मामले की तुलना पर्दा प्रथा से होती है। भारत में जो हालत पर्दा की है, वही हिजाब की भी है। पूरा समाज दो अलग-अलग वर्गों में बंटा है। एक किसी तरह के पर्दे को पिछड़ेपन का प्रतीक मानता है तो दूसरा वर्ग मजबूर है या सहमत है इन परंपराओं का पालन करने के लिए। ठीक उसी तरह जैसे लाख कानून, महिला सुरक्षा के प्रावधान होने के बावजूद अब भी लाखों महिलाएं अत्याचार का शिकार होने को बेबस हैं, भले ही वह परंपरा का पूरा सम्मान कर रही हों। और दूसरा वर्ग वह भी है जहां बिना ऐसी कथित परंपराओं का पालन किए अपनी जिंदगी को आजादी से सम्मान के साथ जिया जा रहा है।
और ओवैसी जी हमारे देश में हर वर्ग की राष्ट्रभक्त बेटी प्रधानमंत्री बनने का हक रखती है, उसे हिजाब से जोड़ने या न जोड़ने की बात बेमानी है।लगता तो ऐसा है कि अब यह मामला स्कूल ड्रेस कोड से आगे बढ़ते हुए कॉमन सिविल कोड तक पहुंचने वाला है। समान नारिकता संहिता का मतलब है भारत में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून, चाहे वह किसी भी मजहब या जाति का हो। मौजूदा वक्त में देश में हर धर्म के लोग शादी, तलाक, जायदाद का बंटवारा और बच्चों को गोद लेने जैसे मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के हिसाब से करते हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसी का पर्सनल लॉ है, जबकि हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्घ आते हैं। फिर विरोध होगा, लेकिन इससे महिलाओं की स्थित मजबूत होगी क्योंकि कुछ धर्मों में महिलाओं के बहुत सीमित अधिकार है। फिर क्या महिलाओं के लिए हिजाब या पर्दा की वकालत करने वाले सभी लोग इस यूनिफार्म सिविल कोड की भी वकालत करेंगे?