
Experience Vs Contract System: आवश्यक सेवाओं का संविदाकरण और उसके दूरगामी परिणाम
मनोज श्रीवास्तव की विशेष प्रशासनिक रिपोर्ट
मनोज श्रीवास्तव 1987 बैच के IAS अधिकारी है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में शासन-प्रशासन को भीतर से देखने वाले मनोज श्रीवास्तव इस लेख में उस प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हैं, जिसमें आवश्यक सेवाओं को भी संविदाकरण के भरोसे छोड दिया गया है। अनुभव, प्रशिक्षण और संस्थागत स्मृति से बनी जिन सेवाओं पर नागरिकों का जीवन और सुरक्षा निर्भर करती है, वे आज अस्थायी व्यवस्था के हवाले होती जा रही हैं।
पता नहीं ऐसा क्यों है कि हम जिसे Essential Services की श्रेणी में रखते हैं, उसका भी संविदाकरण कर दिया गया। कई बार तो यह प्रक्रिया दैनिक मजदूरीकरण तक जा पहुंची। जो सेवाएं सीधे नागरिकों के जीवन और सुरक्षा से जुडी हैं, उन्हें भी अस्थायी व्यवस्था के भरोसे छोड दिया गया।
▪️विभागीय विशेषज्ञता से अस्थायी हाथों तक
▫️जो सेवाएं कभी विभागीय विशेषज्ञता, सांस्थानिक प्रशिक्षण, अनुशासन और वर्षों के अनुभव से परिपक्व होती थीं, उन्हें स्थानीय निकायों के हवाले कर दिया गया। प्रारंभ में विभाग का संबंधित अमला भी निकायों को सौंपा गया, लेकिन समय के साथ वह अमला सेवानिवृत्त होता गया। उसकी जगह तदर्थ ढंग से रखे गए संविदा कर्मी या दैनिक वेतनभोगी आते चले गए, जो प्राय: सिफारिश के आधार पर नियुक्त हुए।
▪️लागत बचत का चवन्नीकरण मॉडल
▫️जिस तरह निजी क्षेत्र में एक सिद्धहस्त और अनुभवी पत्रकार को उचित वेतन देने की जगह कम मानदेय पर कई अस्थायी पत्रकार रख लिए जाते हैं, उसी तरह आवश्यक सेवाओं में भी स्थापना खर्च घटाने के नाम पर चवन्नीकरण को स्वीकार कर लिया गया। जो सेवाएं कभी दशकों के अनुभव की धरोहर थीं, वे अस्थायी और असुरक्षित हाथों में सौंप दी गईं। इसका सीधा असर सेवा की गुणवत्ता और सार्वजनिक सुरक्षा पर पडा।
▪️आर्थिक सुधारों का तर्क
▫️आर्थिक सुधारों के समर्थक इस संविदाकरण को अनिवार्य और प्रगतिशील कदम मानते हैं। 1991 के बाद अपनाए गए आर्थिक मॉडल में सरकार की भूमिका सीमित करना और निजी क्षेत्र को अवसर देना केंद्रीय विचार रहा। तर्क दिया गया कि स्थायी कर्मचारियों पर पेंशन, भत्ते और चिकित्सा सुविधाओं का बोझ राजकोषीय घाटे को बढाता है, जबकि संविदा व्यवस्था में लचीलापन होता है।
▪️नवउदारवादी दृष्टिकोण और श्रम की कमजोरी
▫️विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने सार्वजनिक व्यय कम करने और निजीकरण को प्रोत्साहित किया। लेकिन स्थायी रोजगार घटने से श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर हो गई। संविदा कर्मचारी असुरक्षा के कारण संगठित नहीं हो पाते और अपनी बात रखने से डरते हैं। यह व्यवस्था श्रम को कमजोर और पूंजी को मजबूत करती है, जिसके परिणामस्वरूप गरीबों के लिए गरीब सेवाएं उपलब्ध होती हैं।
▪️लोक कल्याणकारी राज्य की चेतावनी
▫️लोक कल्याणकारी राज्य के समर्थक मानते हैं कि स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता, अग्निशमन और आपदा प्रबंधन जैसी सेवाएं बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि मूल मानवीय अधिकार हैं। जब इन क्षेत्रों में किफायत का तर्क प्रवेश करता है तो गुणवत्ता स्वत: हाशिये पर चली जाती है।
▪️प्रशासनिक स्मृति का क्षरण
▫️संविदाकरण की सबसे बडी क्षति संस्थागत स्मृति का नष्ट होना है। कोई कर्मचारी जब बीस-तीस वर्ष एक ही विभाग में काम करता है, तो वह नियम पुस्तिका से आगे जाकर स्थानीय परिस्थितियों, व्यवहारिक समाधान और संभावित जोखिमों को समझता है। यह अनुभव पुस्तकों में नहीं, बल्कि कार्य के दौरान संचित होता है।
▪️अनुभव बनाम संविदा व्यवस्था
▫️जल आपूर्ति जैसे विभागों में अनुभवी कर्मचारी जानते हैं कि किस क्षेत्र में पाइपलाइन कब डाली गई, कहां दबाव की समस्या रहती है और मौसमी संकटों से कैसे निपटना है। जब ऐसे कर्मचारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनकी जगह अल्पकालिक संविदा कर्मी आते हैं, तो यह संपूर्ण अनुभव भंडार समाप्त हो जाता है।
▪️संविदा भर्ती और भ्रष्ट तंत्र
स्थायी भर्ती में परीक्षा और पारदर्शिता जैसी प्रक्रियाएं होती हैं। संविदा भर्ती में ये सुरक्षा तंत्र कमजोर हो जाते हैं। स्थानीय नेता, अधिकारी और ठेकेदार मिलकर अपने लोगों को नियुक्त कराते हैं। इससे अयोग्यता और भ्रष्टाचार को बढावा मिलता है।
▪️असुरक्षित कर्मचारी और कमजोर जवाबदेही
▫️संविदा कर्मचारी नौकरी की असुरक्षा के कारण गलत आदेशों का विरोध नहीं कर पाते। वे न स्वतंत्र होते हैं और न ही वास्तविक अर्थों में जवाबदेह। आज अनेक विभागों में स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों के बीच विभाजित कार्यबल दिखाई देता है, जो असंतोष और अविश्वास को जन्म देता है।
▪️अंतरराष्ट्रीय अनुभव
▫️जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने सार्वजनिक सेवाओं में गुणवत्ता को प्राथमिकता दी। उन्होंने संविदाकरण के बजाय प्रशिक्षण, कौशल विकास और संस्थागत क्षमता निर्माण में निवेश किया। इसी कारण उनकी सार्वजनिक सेवाएं विश्व में श्रेष्ठ मानी जाती हैं।
▪️सुधार का वैकल्पिक मार्ग
▫️यह कहना गलत नहीं कि सरकारी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। लेकिन समाधान संविदाकरण नहीं है। बेहतर भर्ती प्रक्रिया, निरंतर प्रशिक्षण, प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था ही वास्तविक सुधार का मार्ग है।
▪️ अपनी बात
▫️अंततः यह एक नैतिक प्रश्न है कि हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। यदि लागत बचत को सर्वोच्च मूल्य बना लिया गया, तो गुणवत्ता और सुरक्षा स्वाभाविक रूप से हाशिये पर चली जाएंगी। संविदाकरण की नीति केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा से जुडा प्रश्न है। जब आवश्यक सेवाओं से अनुभव और संस्थागत स्मृति बाहर हो जाती है, तब हादसे संयोग नहीं रह जाते।
हादसे ऐसे ही नहीं घटते।
मनोज श्रीवास्तव
मनोज श्रीवास्तव भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। सेवानिवृत्ति के पश्चात वे वर्तमान में राज्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ वे एक संवेदनशील साहित्यकार और विचारशील लेखक भी हैं। शासन, समाज और सार्वजनिक नीतियों पर उनके लेख अनुभवजन्य गहराई और नैतिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। उनका साहित्यिक जुडाव उन्हें समकालीन प्रशासनिक विमर्श में एक विशिष्ट स्वर प्रदान करता है।
मनोज श्रीवास्तव की फेसबुक वाल से साभार





