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film Apne Paraye (1980): कुछ नयी कुछ पुरानी बातें -उपन्यास ‘निष्कृति’को बासु चैटर्जी ने फ़िल्म बनाने के लिये क्यों चुना?

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film Apne Paraye (1980)
film Apne Paraye (1980)

कुछ नयी कुछ पुरानी बातें

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के 1917 में लिखे उपन्यास ‘निष्कृति

film Apne Paraye (1980): उपन्यास ‘निष्कृति’को बासु चैटर्जी ने फ़िल्म बनाने के लिये क्यों चुना?

अंजू शर्मा  की खास रिपोर्ट
बासु चैटर्जी ने जब शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के 1917 में लिखे उपन्यास ‘निष्कृति’ को फ़िल्म बनाने के लिये चुना होगा तो उसकी क्या वजह रही होगी यह शोध का विषय है। इस कारण यह है कि यह उपन्यास न तो देवदास, चरित्रहीन, परिणीता या श्रीकांत जैसा बहुत लोकप्रिय रहा और न ही इसकी कहानी में कोई ख़ास बात है। यह एक टिपिकल फैमिली ड्रामा है जिसके केंद्र में एक संयुक्त परिवार है। आप कहेंगे तो इसमें क्या ख़ास क्या है। तो ख़ास बात ये है कि मानव मन की गहन अनुभूतियों के चितेरे शरतचंद्र के इस उपन्यास को बहुत ही खूबसूरती से फ़िल्माया है बासु दा ने। मानव व्यवहार पर उनकी पकड़ यहाँ भी तनिक ढीली होती दिखाई नहीं पड़ती।
कथानक की बात करें तो यह एक ऐसे संयुक्त परिवार की कहानी है जिसमें दो भाई हैं बड़े भैया (उत्पल दत्त) पेशे से सफल वकील हैं जबकि उन्हीं का चचेरा भाई है चंदर (अमोल पालेकर) जो उतना उच्च शिक्षित नहीं है और लगभग बेरोजगार है। मृदंग बजाने और गाने का शौकीन चंदर अक्सर बड़े भैया से व्यापार के लिये पैसे लेकर बर्बाद कर देता है। दोनों की पत्नियाँ हैं सिद्धेश्वरी यानी बड़ी माँ या बड़ी भाभी (आशा लता) और शीला यानी छोटी चाची या छोटी बहू (शबाना आज़मी)। सिद्धेश्वरी अक्सर अस्वस्थ रहती हैं और पूरा घर नौकरों के साथ छोटी बहू ही संभालती है जो बहुत मानिनी है। दोनों देवरानी जेठानी में बहुत प्रेम है अलबत्ता नोंकझोंक और मान मनुहार चलती रहती है। अमूमन पुराने संयुक्त परिवारों की तरह यहाँ भी चंदर के कमाऊ न होने से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता और बड़े भाई के बच्चों के साथ उनके दोनों बच्चे भी पलते हैं।
लेकिन तभी एक ट्विस्ट आता है जब मंझले भैया यानी बड़े भैया के सगे छोटे वकील भाई हरीश (गिरीश कर्नाड) और उनकी पत्नी नयनतारा (भारती आचरेकर) अपने बिगड़ैल बेटे के साथ लौटकर इसी घर में रहने चले आते हैं। नयनतारा जब शीला को पूरे घर को चलाते देखती है ईर्ष्या के मारे वह बड़ी भाभी के कान भरना शुरू कर देती है जो दिल की भली महिला हैं पर बहुत भोली और कान की कच्ची भी है। हरीश और नयनतारा मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी कर देते हैं कि जो चंदर और शीला को घर छोड़कर गाँव रहने जाने पर मजबूर कर देती हैं। लेकिन वहाँ भी हरीश उन पर केस कर देता है। आगे की कहानी बड़ी दारुण है लेकिन इसे आप फ़िल्म देखकर ही जान पाएंगे कि आगे क्या होता है।
बांग्ला पृष्ठभूमि पर बने इस उपन्यास में वे सभी जरूरी तत्व हैं जो स्वामी, छोटी बहू, अमर प्रेम, मंझली दीदी, बालिका बधू, ममता,काबुलीवाला आदि फिल्मों में देखने को मिलते हैं यानी बांग्ला संस्कृति, बंगाली परिवेश, वेशभूषा आदि। और इन सबसे बढ़कर इसका संगीत। आश्चर्यजनक रूप से डिस्को के प्रणेता बप्पी लाहिरी ने 1980 में अपने पराये का संगीत भी रचा जिसमें बांग्ला संगीत की वही धुनें उपस्थित हैं जो कानों में मधुर रस घोलकर मन के तारों को भी झंकृत कर देती हैं। विशेषकर येसुदास का गाया, ‘श्याम रंग रंगा रे….’, और किशोर कुमार का गाया ‘कैसे दिन जीवन में आए’, एक डुएट भी है जिसे येसुदास और आशा भोंसले ने गाया है, ‘गाओ मेरे मन…’।
बाकी अभिनय की बात करें तो ऐसी मंझी हुई स्टार कास्ट से भला और क्या उम्मीद करेंगे आप कि वे आपको अपना कायल न बना लेंगे। मानिनी शबाना आज़मी को देखते हुए मुझे बार बार स्वामी फ़िल्म याद आती रही, दोनों ही फिल्मों में उनका यादगार और शानदार अभिनय देखने को मिलता है, खिलंदड़ मनमौजी भोले भाले चंदर के रोल में अमोल पालेकर खूब जमे हैं। भारती आचरेकर रोल के हिसाब से अपनी नाटकीयता को बनाए रखती हैं। गिरीश कर्नाड अपनी ग्रे शेड की भूमिका में लगभग चौंका देते है लेकिन उन्हें पर्दे पर देखना सुकून से भर देता है, वे मेरे बहुत प्रिय अभिनेता हैं। सबसे अधिक प्रभावित करते हैं किसी संयुक्त परिवार के मुखिया की भूमिका में उत्पल दत्त जो नामी वकील होते हुए भी एक भुलक्कड़ बड़े भैया का इतना सहज अभिनय करते हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है कि उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ किस फ़िल्म में दिया। बेईमान नौकर मनोहर की भूमिका में मानिक दत्त भी बढ़िया हैं।
तो एक साफ़ सुथरी, सीधी सादी और प्यारी सी घरेलू फ़िल्म, पारिवारिक कूटनीतियाँ, मीठी नोंकझोंक देखने और सुमधुर बांग्ला संगीत सुनने के शौक़ीन हैं तो यूट्यूब या अमेज़ॉन प्राइम पर देख डालिये अपने पराये। देख चुके हैं तो बताइये कैसी लगी वरना देखकर कमेंट जरूर कीजियेगा।
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अंजू शर्मा

गत डेढ़ दशक से लेखन में सक्रिय चर्चित लेखिका अंजू शर्मा की अबतक सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपको इला त्रिवेणी सम्मान, राजीव गांधी एक्सलेंसी अवार्ड, राजेंद्र बोहरा सम्मान, स्त्री शक्ति सम्मान आदि कई सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है।