कविता-आम हो गए खास

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आम हो गए खास

डॉ सीमा शाहजी

बौराये आम
बन गए वनफल
आम हो गए खास
महकने लगे वन के कोने कोने
आया निमन्त्रण सखी का
चलो चले वन की और
लेकिन
आम्रपाली में अब
नही गूंजती
कोयल की कूक
नही गदराती है हवाएं
चौकीदार जो खड़े है
हर पेड़ के साथ
बदल गया वनों का रिश्ता
इंसान के साथ
अब आम भेंट नही
बिकने का साधन है
वह रस, वह गन्ध,
वह मन को छू लेने वाली खुशबू
वह आम की सौरभ
जब होंठो से निकलकर
पहुँची मानव की फितरत तक
तो ,बदल गया वन क्षेत्र
बाजारों के लंबे हाथ
पहुँच चुके हैं अबोध टहनी तक
मिल जाते है आम अब
मंडी के नीचे
सखी!कौन जाए अब
वृक्षों के नीचे …….