छत्रछाया से टकराव तक: सत्ता, परिवार और अजित पवार की अकेली लड़ाई

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छत्रछाया से टकराव तक: सत्ता, परिवार और अजित पवार की अकेली लड़ाई

कीर्ति कापसे की त्वरित टिप्पणी

महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का नाम केवल एक नेता भर नहीं था, वह पवार परिवार के भीतर चल रही सत्ता की सबसे तीखी धुरी भी थे। विमान हादसे में उनका असामयिक निधन उस अध्याय का अचानक अंत है, जो वर्षों से शरद पवार की राजनीति के समानांतर—और कई बार उसके विरुद्ध—लिखा जा रहा था।
अजित पवार,शरद पवार की राजनीतिक विरासत के सबसे स्वाभाविक उत्तराधिकारी माने जाते रहे, लेकिन यही उत्तराधिकार परिवार के भीतर सबसे बड़ा टकराव भी बना। जहां शरद पवार राजनीति को धैर्य, संतुलन और सामूहिक निर्णय की कला मानते रहे, वहीं अजित पवार ने सत्ता को तत्काल निर्णय, प्रशासनिक पकड़ और कठोर नियंत्रण के रूप में देखा। यही फर्क धीरे-धीरे राजनीतिक मतभेद से आगे बढ़कर पारिवारिक राजनीतिक संघर्ष में बदल गया।
बारामती—जो कभी पवार परिवार की एकजुट ताकत का प्रतीक था—वहीं से सत्ता की दो धाराएं निकलीं। एक ओर शरद पवार की वैचारिक राजनीति, दूसरी ओर अजित पवार की सत्ता-केंद्रित यथार्थवादी राजनीति। पार्टी के भीतर बग़ावत, अलग गुट बनाना और सत्ता के नए समीकरण गढ़ना—इन फैसलों ने यह साफ़ कर दिया कि अजित पवार अब केवल ‘शरद पवार के भतीजे’ नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाले नेता बन चुके हैं।
यह टकराव सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नहीं था, बल्कि विरासत बनाम नियंत्रण की लड़ाई थी। सवाल यह नहीं था कि पवार परिवार का चेहरा कौन होगा, बल्कि यह था कि महाराष्ट्र की राजनीति अनुभव से चलेगी या सत्ता के गणित से। अजित पवार ने सत्ता का गणित चुना—और उसी रास्ते पर चलते हुए वे कई बार आलोचना, आरोप और अलगाव के केंद्र में रहे।
उनके समर्थक उन्हें विकास और प्रशासन का मजबूत स्तंभ मानते थे, तो आलोचक उन्हें पारिवारिक एकता तोड़ने वाला चेहरा बताते रहे। सच यह है कि अजित पवार ने जानबूझकर वह भूमिका चुनी, जिसमें लोकप्रियता से अधिक प्रभाव और रिश्तों से अधिक सत्ता मायने रखती है।
आज उनके निधन के साथ पवार परिवार की वह खुली दरार भी इतिहास का हिस्सा बन गई है, जिसे समय ने कभी भरने नहीं दिया। शरद पवार की छत्रछाया में शुरू हुआ यह सफर अंततः उसी छाया से टकराकर समाप्त हुआ—यही अजित पवार की राजनीति का सबसे बड़ा और सबसे कड़वा सत्य है।
आज अजित पवार नहीं हैं, लेकिन उनके जाने से जो प्रश्न पीछे रह गए हैं, वे कहीं ज़्यादा भारी हैं। क्या सत्ता के लिए परिवार से टकराव राजनीति की मजबूरी था, या विरासत को अपने तरीके से गढ़ने की जिद? क्या यह संघर्ष टाला जा सकता था, या पवार राजनीति की नियति में ही लिखा था?
शरद पवार जीवित रहते हुए भी आज अपनी ही राजनीतिक विरासत को नए सिरे से परिभाषित होते देख रहे हैं—बिना उस व्यक्ति के, जिसने सबसे पहले उस विरासत को चुनौती दी थी। बारामती खामोश है, लेकिन उसकी खामोशी जवाब नहीं, सिर्फ़ संकेत देती है।
अजित पवार का राजनीतिक जीवन यहीं समाप्त नहीं होता; वह अब बहस, व्याख्या और पुनर्मूल्यांकन में प्रवेश करता है। महाराष्ट्र की राजनीति इसी अनिश्चितता में आगे बढ़ेगी—यह तय करते हुए कि सत्ता रिश्तों से बड़ी थी, या रिश्ते सत्ता से।

और शायद, इसी अधूरे प्रश्न में अजित पवार की राजनीति की अंतिम पहचान छिपी है।