
भोपाल के तथाकथित `जमीन घोटाले’ पर सरकार की चुप्पी संदेहास्पद, सोशल मीडिया पर मचा बवाल!
वरिष्ठ पत्रकार के.के. झा की विशेष रिपोर्ट
इंदौर। भोपाल के गुराड़ी घाट लैंड डील में 50 से ज्यादा IAS-IPS अधिकारियों द्वारा की गई संदिग्ध भूमि खरीदारी पर पूरे प्रदेश में आक्रोश बढ़ता जा रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार अब तक इस मामले पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। चार साल में 11 गुना मूल्यवृद्धि वाले इस विवादास्पद सौदे पर कोई आधिकारिक जांच घोषित न किए जाने से सवाल उठने लगे हैं कि क्या अधिकारी वर्ग की गरिमा बचाने के लिए सरकार जानबूझकर आंखें मूंदे बैठी है?
प्राप्त जानकारी के अनुसार अप्रैल 2022 में भोपाल के कोलार क्षेत्र के गुराड़ी घाट गांव में 50 के करीब अधिकारियों (मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों के कैडर) ने एक ही दिन एक रजिस्ट्री के जरिए 2.023 हेक्टेयर कृषि भूमि खरीदी थी। मात्र ₹5.5 करोड़ में हुई इस खरीदारी के 16 महीने बाद अगस्त 2023 में ₹3,200 करोड़ के वेस्टर्न भोपाल बायपास प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली, जिसका रूट खरीदी गई जमीन से महज 500 मीटर की दूरी से गुजरता है। इसके बाद जून 2024 में भूमि का उपयोग कृषि से आवासीय में बदल दिया गया। वर्तमान में इस जमीन की कीमत ₹55 से ₹65 करोड़ तक पहुंच चुकी है। यानी महज चार वर्षों में करीब 11 गुना का अप्रत्याशित मुनाफा।
सरकार की खामोशी पर संदेह
एक मीडिया समूह द्वारा इस घोटाले की पड़ताल के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है, फिर भी मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री या सरकार की ओर से अब तक कोई बयान नहीं आया है। सूत्रों का कहना है कि उच्चाधिकारियों के दबाव में पूरा मामला दबाने की कोशिश की जा रही है।
विपक्षी दलों का सरकार पर तीखा हमला
कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि इस पूरे मामले की सीबीआई या राज्य लोकायुक्त द्वारा तत्काल जांच होनी चाहिए। उन्होंने पूछा है — “क्या प्रोजेक्ट की जानकारी पहले से अधिकारियों को थी? क्या यह सरकारी प्रोजेक्ट का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ कमाने का मामला है?
सोशल मीडिया पर बवाल
सोशल मीडिया पर इस खबर के साथ जूनियर आईएएस अधिकारी की कथित निराशा और लीक की कहानी भी तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि आंतरिक प्लॉट मिलने के बाद महसूस किए गए धोखे के कारण ही पूरी जानकारी बाहर आई। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही कानूनी रूप से कोई गलती न हुई हो, लेकिन नैतिकता, हितों के टकराव और पारदर्शिता के सवाल बेहद गंभीर हैं।
अभी तक सभी 50 अधिकारियों की चुप्पी बरकरार है। कोई भी अधिकारी या उनके परिवार की ओर से इस मामले पर कोई सफाई नहीं दी गई है।यह मामला न केवल मध्य प्रदेश की नौकरशाही की छवि पर सवाल खड़ा कर रहा है, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और अधिकारियों के सामूहिक निवेश के बीच बढ़ते घनिष्ठ संबंधों पर भी गंभीर बहस छेड़ रहा है।सरकार कब तक चुप्पी तोड़ेगी और और क्या कोई जांच का ऐलान करेगी — यह देखना अब बेहद दिलचस्प हो गया है।





