
दिल्ली के रेस्त्रां में भीषण आग, 21 की मौत, आप भी सुरक्षित नहीं..!
निर्मल सिरोहिया की विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली: बुधवार सुबह नईदिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक रेस्टोरेंट में लगी भीषण आग में 21 लोग अपनी जान गवां बैठे। इनमें से अधिकांश वे थे जो समीप के एक अस्पताल में अपने किसी परिजन की जीवन रक्षा के लिए उनका इलाज कराने और देखभाल के दौरान यहां मौजूद थे।
बताया जा रहा है कि रेस्त्रां को यहां छह कमरे बनाने की इज़ाजत मिली थी ताकि समीप ही अस्पताल होने की वजह से मरीजों के जरूरतमंद परिजनों को कुछ देर आराम करने की सुविधा मिल सके। लेकिन लालची रेस्त्रां मालिक ने बगैर सुरक्षा प्रबंधन के यहां 25 कमरे बना लिए। यहां हमेशा की तरह वे सभी निर्दोष हैं, जिन पर इस बात की जिम्मेदारी होती है कि वे इस तरह के अवैधानिक कार्यों को समय पूर्व रोकें। इतने अधिक लोग मरे हैं तो हल्ला मचेगा, कार्रवाई के नाम पर जांच होगी और फिर अगले हादसे का इंतजार..!
और हां एक एडवायजरी भी जारी होगी, जिसमें देश भर की राज्य सरकारें अपने जिम्मेदार प्रशासन को ऐसी इमारतों की जांच के निर्देश जारी करेगी। इस हादसे से पहले दिल्ली में भी ऐसी कई एडवायजरी जारी हुई होगी और जांच के नाम पर जो हुआ होगा, वह किसी से छुपा नहीं है। अन्यथा यह हादसा नहीं होता।
अब सवाल यह है कि यह हादसा सिर्फ दिल्ली के लिए चिंता का विषय है या देशभर के ऐसे सभी शहरों के लिए है। क्योंकि लालच और लापरवाही का आलम देशभर में एक सा है। सिर्फ रेस्त्रां और होटल ही नहीं, कोचिंग संस्थान, स्कूल, अस्पताल, बाजार, सिनेमाघर, बड़ी इमारतें लगभग सभी असुरक्षित हैं। कुछ समय पूर्व गुजरात के कोचिंग संस्थान और उत्तरप्रदेश के अस्पताल में हुए अग्निकांड के बाद जारी एडवायजरी से प्रशासन हरकत में तो आया लेकिन सुरक्षा प्रबंध कितने पर्याप्त और सुरक्षित है इसकी कोई गारंटी नहीं है। उदहारण के लिए शहर की कुछ कोचिंग और अस्पतालों का मुआयना कर लीजिए आपको ख़ौफ़नाक हक़ीक़त नजर आ जाएगी। कोचिंग में भेड़-बकरी की तरह ठूंसे बच्चे नजर आएंगे और उनमें इंट्रेंस और एक्ज़िट सिर्फ एक ही दिखाई देगी। खिड़कियां और गैलरी तो न के बराबर होंगी। यही हाल अस्पतालों का है जहां मरीज तो असहाय होता ही है, उनके परिजन भी असहाय नजर आते है। न बैठने की जगह है, न खड़े रहने की, आराम तो बहुत दूर की बात है। इस बीच दिनभर अस्पताल कर्मी अभद्रता करते हैं सो अलग। मुंहमांगा पैसा देने के बाद बेइज्जत होना आम है।
विश्वास न हो तो शहर के नामी अस्पतालों में घूम आइएगा, हाट-बाजार से कम नजारा नहीं मिलेगा। और सुरक्षा…. उसकी कोई गारंटी नहीं। न मरीज को, न उसके परिजन को…!
तो फिर सवाल लाज़मी है कि जिम्मेदार कहां हैं और क्या कर रहे हैं ? वे इंतज़ार कर रहे हैं किसी नई एडवायजरी या फिर किसी हादसे का….!





