हिन्दू संयुक्त परिवार एवं उनके आपस की संपत्ति में अधिकार

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संयुक्त हिंदू परिवार की परिभाषा में एक साथ एक ही घर में कई पीढ़ियों के लोग रहते हैं जिस परिबार मे तीन या अधिक पीढ़ियों के सदस्य साथ साथ निबास करते है जिनकी रसोई , पूजा पाठ एबं संपत्ति सामूहिक होती है उसे ही सयुंक्त परिबार कहते है।

भारतीय संस्कृति में संयुक्त हिंदू परिवार आदर्शता कि निशानी रही है और बरसों बरस तक संयुक्त हिंदू परिवार कानूनी तौर पर मान्यता में रहा है। संयुक्त हिंदू परिवार के सभी लाभ परिवार के सभी सदस्य आपस में प्राप्त करते हैं उनका रहना खाना-पीना कारोबार सब कुछ संयुक्त रूप से जीवनयापन करते हैं।

ऐसे परिवार के सदस्यो को आपसी तौर पर संपत्ति में सम्मिलित करने के कानूनी प्रावधानों में कुछ सुधार अत्यंत आवश्यक है ताकि परिवार की महिलाएं संयुक्त परिवार के लाभ से वंचित ना हो।

पहले संयुक्त हिंदू परिवार में महिलाओं को संपत्ति में सम्मिलित करने का कोई प्रावधान नहीं होता था, अब कुछ परिवर्तन आया और महिलाओं को हिंदू परिवार की संपत्ति में सम्मिलित करने के लिए के लिए कुछ रिश्तो को मान्यता दी गई जैसे पिता – पुत्री, पति – पत्नी, मां – बेटी, ससुर – बहू।

संयुक्त हिंदू परिवार में अभी भी कुछ रिश्ते बहुत निकटता के हैं और जीवन के हर हिस्से में सामुदायिकता से रहते हैं उनका घर बार, मकान, खाना पीना, रहना, कारोबार, सब कुछ संयुक्त परिवार में जिंदगी गुजरती है इसे कुछ रिश्तो को भी नियमों में मान्यता दी जानी चाहिए जैसे देवर – भाभी, जेठ – छोटे भाई की पत्नी, भाई – बहन, सास – बहू, बहू – सास, अंकल बड़े पिताजी – भतीजी, देवरानी – जेठानी, जेठानी – देवरानी, पोता – अपनी दादी, बेटा – सगी माॅ,  ननंद – भाभी भाई की पत्नी।

इन सभी रिश्तो को यदि मान्यता मिलती है तो संयुक्त हिंदू परिवार टिके रहेंगे और यह सभी महिलाएं अपने आपको परिवार में सुरक्षित महसूस समझेगी।

हमारे शिक्षाविद, पत्रकार, वकील, विधी सलाहकार, रिटायर्ड जजेस को इस विषय पर मंथन कर सरकार को सुझाव देना चाहिये।