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घर के मुख्य द्वार पर मांगलिक चिन्हों जैसे – ऊँ, स्वास्तिक का प्रयोग करना चाहिए। घर में मुख्य द्वार जैसे अन्य द्वार नहीं बनाने चाहिए तथा मुख्य द्वार को फल, पत्र, लता आदि के चित्रों से अलंकृत करना चाहिए।
बृहदवास्तुमाला में कहा गया है…
मूलद्वारं नान्यैद्वारैरभिसन्दधीत रूपद्धर्या।
घटफलपत्रप्रथमादिभिश्च तन्मंगलैश्चिनुयात्॥
इसी प्रकार मुख्य द्वार पर कभी भी वीभत्स चित्र इत्यादि नहीं लगाने चाहिए।
घर वास्तु अनुसार होना चाहिए जिसमें आगे और पीछे आंगन हो. खुद की भूमि और खुद की ही छत हो. चंद्र और गुरु से युक्त वृक्ष या पौधें हो.
ब्रह्मस्थल या घर का आंगन : घर में आंगन नहीं है तो घर अधूरा है। घरके आगे और घर के पीछे छोटा ही सही, पर आंगन होना चाहिए।प्राचीन हिन्दू घरों में तो बड़े-बड़े आंगन बनते थे।

घर में पूजा के कमरे का स्थान सबसे अहम होता है। इस स्थान से ही हमारे मन और मस्तिष्क में शांति मिलती है तो यह स्थान अच्छा होना जरूरी है। यह हमेशा ग्राउंड फ्लोर पर होना चाहिए .पूजा कक्ष में गुम्बद, ध्वजा, कलश, त्रिशूल या शिवलिंग इत्यादि नहीं रखने चाहिए. पूजाघर के ऊपर या नीचे की मंजिल पर शौचालय या रसोईघर नहीं होना चाहिए, न ही इनसे सटा हुआ। सीढ़ियों के नीचे पूजा का कमरा बिलकुल नहीं बनवाना चाहिए।
मृत पूर्वजों के चित्र -बैठक में ही मृत पूर्वजों के चित्र दक्षिण या पश्चिमी दीवार पर लगाना चाहिए। इस कक्ष की दीवारों का हल्का नीला, आसमानी, पीला, क्रीम या हरे रंग का होना उत्तम होता हैघर में बहुत सारे देवी-देवताओं के चित्र या मूर्ति न रखें। घर में मंदिर न बनाएं.घर में सीढ़ियां विषम संख्या (5, 7, 9) में होनी चाहिए। 13. उत्तर, पूर्व तथा उत्तर-पूर्व (ईशान) में खुला स्थान अधिक रखना चाहिए
घर हमेशा हर तरफ से खुला होना चाहिए, इसका मतलब यह है कि यह किसी भी अन्य इमारत से सटे नही होने चाहिए (दो घरों में एक आम दीवार नहीं होनी चाऊँ, स्वास्तिक का प्रयोग हिए)।सोलार हीटर मकान के दक्षिण-पूर्व में रखना चाहिए. मकान पर स्थित पानी की टंकी हमेशा दक्षिण-पश्चिम कोने में होनी चाहिए. सीढ़ी और ल़िफ़्ट पश्चिम, दक्षिण दिशा में होनी चाहिए |
