
सीखना चाहें तो फील्ड रिपोर्टर भी पीयूष पांडे के विज्ञापनों की भाषा से सीख सकते हैं
🔺कीर्ति राणा
मेरा तो दूर दूर तक पद्मश्री (स्व) पीयूष पांडे से कोई परिचय नहीं रहा। तब दैनिक भास्कर इंदौर ने भास्कर उत्सव आयोजित किया था, उसमें आए थे, रवींद्र नाट्यगृह में उनका उद्बोधन भी हुआ था लेकिन उस कार्यक्रम कवरेज के लिये अपनी ड्यूटी लगी नहीं थी तो जाने का सवाल ही नहीं उठता।
फिर उनके निधन का मुझे दुख क्यों ? परिचय तो मेरा सौम्या मोटर्स वाले प्रवेश अग्रवाल से भी नहीं था, वो कांग्रेस नेता और पूर्व सीएम कमलनाथ के कोर ग्रुप में रहे पर अपना उनसे भी कोई परिचय-मुलाकात नहीं रही लेकिन उनकी मौत ने भी मुझे झकझोर दिया है। रुका कौन है, जो हैं वो भी जाएंगे ही, फिर भी पीयूष जी का जाना कचोटता रहा है।

जब भारत में एकमात्र दूरदर्शन था तब 1988 में पंद्रह अगस्त को देशभक्ति गीत घर घर गूंजा था ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा….’ फिर तो यह गीत तब के बच्चों से लेकर जवान-बुजुर्गों तक को रट सा गया था। अन्य भाषा में भी गीत की पंक्तियां होने से यह गीत देश राग ही बन गया था। तब इस गीत को पं भीमसेन जोशी की पहाड़ी आवाज और ढेर सारे कलाकारों-खिलाड़ियों के साथ पहली बार किसी बहुभाषी गीत में एक साथ इतनी शीर्षस्थ हस्तियों को देखा था।बाकी का तो पता नहीं लेकिन अपने को तो तब भी यह पता नहीं था कि गीत का लेखक कौन हैं। आज जब उनके यादगार विज्ञापनों की पंच लाइन के साथ यह जाना कि मिले सुर मेरा तुम्हारा के भी लेखक वहीं हैं तो यह बात भी याद आई कि काम से नाम होने के बाद भी विनम्र होना आदमी को बड़ा बनाता है। आज जब किसी एक काम, किसी पद से थोड़ी-बहुत पहचान मिल जाने पर ही कई लोगों के पैर जमीन से हवा में उठ जाते हैं तो एड गुरु पीयूष पांडे से आम आदमी बने रहना तो सीखा ही जा सकता है।मैंने पढ़ा कि अपने ऑफिस में वो तनावमुक्त रहते, अपनी पहचानेजाने वाली हंसी के साथ स्टॉफ को तनावमुक्त वातावरण में काम करने का वातावरण बना कर रखते थे। चाहें तो आज के वो सारे संपादक भी सीख सकते हैं जो चौबीस घंटे ज्वालामुखी पर बैठे रहने के साथ ही दफ्तर में अपने सहकर्मियों पर फुफकारते रहते हैं।

उनके निधन पर विभिन्न अखबारों में जितना कुछ लिखा और पढ़ा उसमें यह बात फिल्ड में काम करने वाले पत्रकारों के काम की हो सकती है कि खबरें वही पसंद की जा सकती हैं जिनसे पाठक तत्काल जुड़ जाए, पांडित्यपूर्ण भाषा नहीं भी हो लेकिन खबर की भावना असरकारक हो।पीयूष जी के जितने चर्चित विज्ञापनों का जिक्र किया गया है उन सब की पंच लाईन सीधे आम आदमी को आकर्षित करने वाली ही रही है-यानी अमीर और गरीब सब उसे सहजता से समझ सकते हैं।
फील्ड के रिपोर्टर हर रोज एक्स्क्लुसिव खबरें, बायलाईन खबरें भी लिखते हैं किंतु कितनी खबरें पाठकों को याद रहती है। फील्ड के रिपोर्टर अपनी लिखी खबर पर अगले दिन अपने परिवार के अन्य सदस्यों से ही फीड बेक लें तो यह भी हो सकता है कि परिवार के सदस्यों ने वह खबर पढ़ी ही न हो या उसी अखबार में प्रकाशित कोई अन्य खबर उसे पसंद आ गई हो।

एक होता है गिलास में भरा साधारण पानी और एक होता है गिलास में भरे पानी को ठंडा करने के लिए डाले गए बर्फ के छोटे टुकड़े। पहले वाले गिलास का पानी गटगट कर गले से नीचे उतर जाता है लेकिन बर्फ के टुकड़े वाला पानी गटगट कर गले से नीचे उतर ही नहीं सकता। भाषा चाहे खबर की हो या विज्ञापन की आज पीयूष जी के निधन पर उनकी इतनी चर्चा हो रही है तो इसीलिये कि उनके विज्ञापनों की भाषा बिना बर्फ के टुकड़े वाले पानी के समान थी। उन्होंने जितने एड बनाए उसके मूल में वही आम आदमी था जिसे बड़े बड़े ब्रांड भी नहीं समझ पाते हैं।

जिस शख्स ने गीत लिखा तो सारा देश गाने लगा मिले सुर मेरा तुम्हारा। जिसने पार्टी का नारा गढ़ा अबकी बार भाजपा सरकार तो सारे देश ने इस नारे को सिद्ध कर के दिखा दिया।आम आदमी या कहें देश की नब्ज पहचानने वाले पीयूष पांडे जी को नमन 🙏
फोटो गूगल से साभार





