ईरान-इजरायल युद्ध का असर: बड़वानी के केला किसानों पर संकट, निर्यात ठप होने से गिर गए दाम

75

ईरान-इजरायल युद्ध का असर: बड़वानी के केला किसानों पर संकट, निर्यात ठप होने से गिर गए दाम

बड़वानी : मध्य-पूर्व में जारी ईरान-इजरायल युद्ध का असर अब भारत के केला उत्पादक किसानों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के प्रसिद्ध केले की मिठास पर इस अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का कड़वा असर पड़ा है। खाड़ी और मध्य-पूर्वी देशों में निर्यात बाधित होने के कारण जिले के सैकडों किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। बाजार में मांग घटने से कीमतों में भारी गिरावट आई है और किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों में बेचनी पड़ रही है।

बड़वानी जिला नर्मदा नदी के किनारे स्थित होने के कारण प्रदेश के प्रमुख केला उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां की उपजाऊ जमीन और नर्मदा के पानी से होने वाली सिंचाई और मौसम की अनुकूलता के कारण यहां का केला स्वाद और गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। जिले से हर साल बड़ी मात्रा में केला ईरान, दुबई सहित कई मध्य-पूर्वी देशों में निर्यात किया जाता है। आम तौर पर रमजान के महीने में इन देशों में केले की मांग काफी बढ़ जाती है, जिससे किसानों को अच्छे दाम मिलते हैं, लेकिन इस बार युद्ध और क्षेत्रीय तनाव के कारण बाजार लगभग ठप पड़ा हुआ है।

केला उत्पादक और निर्यातक संतोष लछेटा ने बताया कि बड़वानी जिले से केले का निर्यात वर्ष 2016 से शुरू हुआ था। पिछले वर्ष जिले से करीब 1.6 लाख टन केला निर्यात किया गया था, जो मुख्य रूप से समुद्री मार्ग से ईरान और दुबई भेजा गया। दुबई से यह केला सड़क मार्ग के जरिए सात-आठ अन्य देशों तक पहुंचाया जाता है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष बड़वानी जिले में करीब ढाई से तीन करोड़ केले के पौधे लगाए गए हैं। बड़वानी और पड़ोसी धार जिले के नर्मदा पट्टी क्षेत्र में अनुकूल परिस्थितियों के कारण सालभर केले की प्लांटिंग और हार्वेस्टिंग होती रहती है।

लछेटा के अनुसार युद्ध के कारण केले की कीमतों में भारी गिरावट आई है। पहले जहां केले का भाव 2000 से 2100 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रहा था, वह अब घटकर 1200 से 1300 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। उन्होंने बताया कि जो केला बंदरगाहों पर ईरान और अन्य देशों के लिए पैक होकर तैयार था, उसे खराब होने से बचाने के लिए दिल्ली के व्यापारियों को घाटे में बेचना पड़ रहा है।

राजलक्ष्मी बनाना ग्रुप के जितेंद्र सोलंकी ने बताया कि वह खुद 50 से 60 एकड़ में केले की खेती करते हैं और किसानों से खरीदकर निर्यात भी करते हैं। उन्होंने कहा कि इस समय मुंबई के शिपयार्ड में करीब 15 से 20 दिन का केला स्टॉक पड़ा हुआ है। निर्यात रुकने के कारण अब इस स्टॉक को घरेलू बाजार में खपाया जा रहा है, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ रहा है। उनका कहना है कि फिलहाल युद्ध के हालात सुधरते नजर नहीं आ रहे हैं और यदि स्थिति यही रही तो आने वाले दिनों में कीमतें और गिर सकती हैं।

 

जिले के एक अन्य किसान हरिओम कुमावत ने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में जिले के कुल उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा निर्यात हो जाता है। इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलती है और यदि कुछ मात्रा घरेलू बाजार में कम दाम पर भी बिकती है तो भी कुल मिलाकर मुनाफा बना रहता है। लेकिन इस बार निर्यात ठप होने से किसानों और निर्यातकों दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

IMG 20260307 WA0026

किसान महेश राठौड़ व बलराम यादव ने बताया कि उन्होंने छह एकड़ जमीन में केले की खेती की है, जिस पर प्रति एकड़ करीब 85 से 90 हजार रुपये की लागत आई है। उनकी कुल लागत पांच लाख रुपये से अधिक हो चुकी है। राठौड़ के अनुसार फसल पूरी तरह तैयार है, लेकिन बाजार में खरीदार नहीं मिल रहे हैं। कई किसानों को अपनी उपज लागत से भी कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो केला उत्पादक किसानों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।

उधर, महाराष्ट्र के सोलापुर के प्रमुख केला निर्यातक किरण ढोके ने बताया कि मुंबई सी-पोर्ट पर करीब 250 कंटेनर केले के लदे हुए खड़े हैं। इन कंटेनरों पर लगातार विभिन्न प्रकार के पोर्ट चार्ज लग रहे हैं, जिससे निर्यातकों की लागत बढ़ती जा रही है और उन्हें मजबूरी में माल वहां से हटाना पड़ रहा है।

ढोके ने बताया कि युद्ध शुरू होने से पहले जो कंटेनर दुबई पहुंच चुके थे, वहां भी स्थिति आसान नहीं है। कई जगह माल की कीमत से भी अधिक फ्रेट (भाड़ा) वसूला जा रहा है। इसके अलावा सोलापुर के कोल्ड स्टोरेज में करीब 24 हजार मीट्रिक टन (लगभग 1000 से 1200 कंटेनर) केला पड़ा हुआ है। निर्यात बंद होने के कारण यह पूरा स्टॉक अब घरेलू बाजार में बेहद कम दामों पर बेचना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो इसका सबसे बड़ा असर पूरी फाइनेंशियल चेन पर पड़ेगा, जो किसान से लेकर व्यापारी और निर्यातक तक जुड़ी हुई है। ढोके ने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप कर केला उद्योग को राहत देने की मांग की है, ताकि किसानों और निर्यातकों को हो रहे भारी नुकसान को कम किया जा सके।