
India-US trade deal draft : सच क्या है, सियासत क्या है और डर कितना जायज•••❓
New Delhi: भारत और अमेरिका के बीच कथित ट्रेड डील के ड्राफ्ट को लेकर इन दिनों राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक हलचल मची हुई है। दावा किया जा रहा है कि अमेरिका ने भारत पर निगरानी की शर्त थोप दी है, रूस से तेल खरीदने पर 25 प्रतिशत टैरिफ की धमकी दी गई है और भारत ने अमेरिकी सामानों पर जीरो टैरिफ मान लिया है। सुनने में यह सब किसी बड़े भू-राजनीतिक दबाव जैसा लगता है, लेकिन जब इन दावों को तथ्य, आधिकारिक बयानों और व्यापारिक प्रक्रिया के चश्मे से देखा जाता है, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल और उतनी सनसनीखेज नहीं दिखती।

▪️डील या सिर्फ ड्राफ्ट
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फिलहाल भारत और अमेरिका के बीच कोई अंतिम ट्रेड डील लागू नहीं हुई है। जो बातें सामने आ रही हैं, वे एक प्रस्तावित ड्राफ्ट या बातचीत की रूपरेखा से जुड़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते एक दिन में लागू नहीं होते। पहले ड्राफ्ट बनता है, फिर तकनीकी बातचीत होती है, उसके बाद राजनीतिक मंजूरी और अंत में कानूनी प्रक्रिया पूरी होती है। अभी मामला इसी शुरुआती चरण में है।

▪️रूस से तेल खरीद पर रोक का दावा
यह दावा कि भारत अब सीधे या परोक्ष रूप से रूस से तेल नहीं खरीदेगा, तथ्यात्मक रूप से साबित नहीं होता। न भारत सरकार की ओर से और न ही अमेरिका की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक आदेश सार्वजनिक हुआ है, जिसमें भारत को रूस से तेल खरीदने पर कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया गया हो। अमेरिका की चिंता रूस से ऊर्जा व्यापार को लेकर जगजाहिर है, लेकिन भारत ने अब तक हर मंच पर यह रुख दोहराया है कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों और किफायती जरूरतों पर आधारित है। अब तक के दस्तावेजों में यह बात संकेत के रूप में जरूर दिखती है कि अमेरिका इस मुद्दे पर दबाव बनाए रखना चाहता है, लेकिन इसे बाध्यकारी शर्त कहना सही नहीं होगा।

▪️अमेरिकी निगरानी और 25 प्रतिशत टैरिफ की धमकी
यहां सियासत और व्यापार की भाषा आपस में गड्डमड्ड हो रही है।अमेरिका अक्सर व्यापारिक वार्ताओं में निगरानी और चेतावनी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, ताकि सामने वाला देश दबाव महसूस करे। लेकिन निगरानी का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका भारत की नीतियों पर सीधा नियंत्रण करेगा। रूस से तेल खरीदने पर 25 प्रतिशत टैरिफ की बात भी एक संभावित दंडात्मक विकल्प के तौर पर सामने रखी गई है, न कि तत्काल लागू होने वाला आदेश। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ऐसी धमकियां बातचीत की रणनीति का हिस्सा होती हैं।
▪️टैरिफ घटने की बात कितनी सही
यह बात अपेक्षाकृत अधिक यथार्थ के करीब है कि अमेरिका भारतीय उत्पादों पर टैरिफ संरचना में नरमी के संकेत दे रहा है। 18 प्रतिशत तक टैरिफ घटाने की चर्चा पहले से चल रही है, खासकर टेक्सटाइल, चमड़ा और कुछ औद्योगिक उत्पादों को लेकर। लेकिन इसे अंतिम फैसला मान लेना जल्दबाजी होगी। टैरिफ में कटौती सेक्टर-वाइज और चरणबद्ध होती है, और कई शर्तों से जुड़ी होती है।
▪️अमेरिकी सामान पर जीरो टैरिफ का सच
यह दावा भी अधूरा है कि भारत ने अमेरिका से आने वाले बहुत से सामानों पर जीरो टैरिफ मान लिया है। भारत की कृषि, डेयरी और छोटे उद्योगों से जुड़े क्षेत्रों में यह राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है। अब तक की बातचीत में कुछ चुनिंदा औद्योगिक और टेक्नोलॉजी उत्पादों पर शुल्क कम करने की संभावना जरूर जताई गई है, लेकिन व्यापक जीरो टैरिफ की पुष्टि नहीं होती।
▪️असल लड़ाई कहां है
असल टकराव रूस के तेल से ज्यादा बाजार पहुंच और रणनीतिक दबदबे को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि भारत उसका बड़ा और भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार बने, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता छोड़ने के मूड में नहीं है। यही वजह है कि बातचीत आगे बढ़ रही है, लेकिन किसी एक पक्ष की पूरी शर्तें मान लेने जैसी स्थिति नहीं बनी है।
▪️राजनीतिक शोर और आर्थिक हकीकत
इस पूरे मुद्दे में राजनीतिक बयानबाजी ने व्यापारिक तथ्य को ढक दिया है। बड़े शब्दों में निगरानी, धमकी और शर्तें जरूर सुनाई दे रही हैं, लेकिन जमीन पर फिलहाल कोई ऐसा आदेश नहीं है, जो भारत की ऊर्जा नीति या संप्रभु निर्णय को तुरंत बदल दे।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर जो बातें सोशल मीडिया और कुछ बयानों में सामने आ रही हैं, वे पूरी सच्चाई नहीं बतातीं। अभी कोई अंतिम डील लागू नहीं हुई है, रूस से तेल खरीद पर कोई कानूनी प्रतिबंध तय नहीं है और टैरिफ कटौती भी प्रस्ताव के स्तर पर है। यह मामला व्यापार से ज्यादा भू-राजनीति का है, जहां दबाव, संकेत और रणनीति अहम भूमिका निभाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि बातचीत जारी है, लेकिन भारत ने अब तक अपने हितों से पीछे हटने का कोई औपचारिक संकेत नहीं दिया है।





