भारतीय सेना – एक परिचय दृष्टि    

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भारतीय सेना – एक परिचय दृष्टि    

– एन के त्रिपाठी

भारतीय सेना के प्रति समस्त भारत वासियों में अगाध श्रद्धा है। प्रत्येक नागरिक इस बात से अवगत है कि हमारी सेना दुर्गम सीमाओं पर विपरीत परिस्थितियों में भी देश की सुरक्षा करती है। देश की सुरक्षा के लिए सेना के जवानों ने सर्वोच्च परंपरा का पालन करते हुए सहर्ष अपना बलिदान भी दिया है। देश इसके लिए उनका चिर कृतज्ञ है।

भारतीय सेना का गठन और परम्पराएँ अंग्रेजों की देन हैं। इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने व्यापार के लिए सत्रहवीं शताब्दी में समुद्र तट पर प्रेसिडेंसी शहरों – मद्रास (1639–40), बॉम्बे (1668), तथा हुगली नदी पर कलकत्ता (1690) की स्थापना की। इन तीनों शहरों में कंपनी ने अपनी सुरक्षा के लिए सेना का गठन किया। सेना को यूरोपीय पद्धति से परेड, अनुशासन तथा युद्ध संरचना में प्रशिक्षित किया गया। इनमें सिपाही भारतीय तथा अफ़सर अंग्रेज़ होते थे। सिपाहियों को मस्कट और बाद में रायफल दी गईं, परंतु तोपखाना और तकनीकी इकाइयां पूर्ण रूप से अंग्रेजों के नियंत्रण में थीं। अठारहवीं शताब्दी में 1757 में प्लासी तथा 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद अंग्रेजों के पास राजनैतिक सत्ता आ गई है और सेना का विस्तार किया गया। सेना का गठन बटालियन और रेजीमेंट के आधार पर छावनियों में किया गया, जो आज भी प्रचलित है।

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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय सैनिकों की शक्ति से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। 1857 में सेना के विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम के दमन के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के स्थान पर स्वयं भारत की सत्ता संभाल ली और सेना का पुनर्गठन किया। सेना में भर्ती केवल निष्ठा के आधार पर कुछ जातियों और क्षेत्रों से की गई।

आकार और जनसंख्या में बहुत छोटे इंग्लैण्ड ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए भारतीय सेना का भरपूर उपयोग किया। अफ़्रीका में सोमालीलैंड, युगांडा, रोडेशिया,सूडान,इजिप्ट और साउथ अफ़्रीका तथा एशिया में इराक़, ईरान, अदन, चीन, सिंगापुर, इंडोनेशिया और हांगकांग में भारतीयों ने अंग्रेजों के लिए अपना बलिदान दिया। अंग्रेज़ सदैव भारतीय सेना से सशंकित भी रहते थे। भारत में अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा के लिए 70 हज़ार की अंग्रेज़ी सेना रखी थी, जबकि प्रथम विश्वयुद्ध में 13 लाख तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में 25 लाख भारतीयों ने अंग्रेजों के लिए युद्ध किया। अनेक सैनिक विश्वयुद्ध के समय सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में सम्मिलित हो गये थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात अंग्रेजों का भारत छोड़ने का निर्णय, स्वतंत्रता संग्राम के अतिरिक्त, भारतीय सेना का बदला हुआ रवैया भी था। 1946 में नौसेना ने विद्रोह कर दिया जो बांबे से कराची, कोचीन और कलकत्ता तक फैल गया। वायुसेना में भी असंतोष था। पूना और मद्रास छावनियों में विद्रोह हुआ। अंततः 1947 में देश को विभाजन के साथ स्वतंत्रता मिली। सेना भारत और पाकिस्तान में बँट गई।

स्वतंत्रता के बाद 1962 में भारत की सेना को चीन से निर्णायक पराजय का सामना करना पड़ा। राजनैतिक उदासीनता के चलते भारतीय सेना उपकरण, हथियार, संचार साधन और संख्या बल की कमी के कारण वीरता के उपरान्त भी परास्त हो गई। भारत ने अपनी गलती स्वीकारी और सेना का सुदृढ़ीकरण किया। 1965 और 1971 में पाकिस्तान के विरुद्ध सफलता प्राप्त हुई। 1971 की बांग्लादेश की भव्य विजय द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार देखी गई। 1999 में कारगिल में विजय प्राप्त हुई। दुर्भाग्यवश सेना को चार दशक से अधिक, पहले पंजाब और फिर जम्मू और कश्मीर में, आंतरिक आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर भी इसी कारण हुआ।

1998 में भारत ने न्यूक्लियर क्षमता प्राप्त कर ली। देश में विगत कुछ वर्षों में सुरक्षा उद्योग का विकास हुआ है। भारत की तीनों सेनाओं का तीन थियेटर कमाण्ड में पुनर्गठन किया जाना शेष हैं। अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत की सेना विश्व में सबसे शक्तिशाली है। भारतीय सेना को सैल्यूट!