
Indore Water Tragedy: इंदौर में मौतों के बाद NGT सख्त: MP में ‘जहरीले पानी’ की जांच करेंगे IIT इंदौर व CPCB
वरिष्ठ पत्रकार के के झा की विशेष रिपोर्ट
भोपाल/इंदौर: इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों के बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), सेंट्रल ज़ोन बेंच ने कड़ा रुख अपनाते हुए मध्यप्रदेश के शहरी क्षेत्रों में पेयजल प्रदूषण की राज्यव्यापी वैज्ञानिक जांच के आदेश दिए हैं। जांच का जिम्मा IIT इंदौर और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की विशेषज्ञ टीमों को सौंपा गया है।
NGT ने सीवेज मिश्रित पेयजल आपूर्ति को जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करार देते हुए नगर निकायों की कार्यप्रणाली पर सख्त सवाल उठाए हैं। ट्रिब्यूनल ने यह आदेश उस इंदौर जल त्रासदी की पृष्ठभूमि में दिया है, जिसमें सरकारी तौर पर कम से कम 15 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि स्थानीय स्तर पर मृतकों की संख्या 23 तक बताई जा रही है। इस घटना में सैकड़ों लोग गंभीर रूप से बीमार पड़े।
छह सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित
NGT ने पूरे प्रदेश में जमीनी जांच के लिए छह सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति के गठन के निर्देश दिए हैं। समिति में शामिल होंगे— आईआईटी इंदौर के निदेशक द्वारा नामित विशेषज्ञ, CPCB के प्रतिनिधि
मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) (नोडल एजेंसी) तथा पर्यावरण विभाग तथा नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी
समिति को छह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च 2026 को होगी।
कलेक्टरों और निगमायुक्तों को सीधे निर्देश
NGT ने आदेश दिया है कि फैसले की प्रति प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों और नगर निगम आयुक्तों को भेजी जाए, ताकि वे पेयजल की गुणवत्ता निगरानी, पाइपलाइन सुरक्षा और प्रदूषण रोकथाम के निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित करें।
एनजीटी की प्रमुख गाइडलाइन
ट्रिब्यूनल ने वैज्ञानिक और निवारक व्यवस्था अपनाने पर ज़ोर देते हुए कहा है— पेयजल स्रोतों और वितरण नेटवर्क की नियमित व स्वतंत्र जांच उन बिंदुओं की पहचान जहां सीवेज लाइनें पेयजल पाइपलाइनों से टकरा या लीक हो रही हैं
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम का सख्त पालन
इंदौर जल संकट बना ट्रिगर
एनजीटी का यह हस्तक्षेप इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में सामने आए जल संकट के बाद हुआ, जहां सीवेज पानी पेयजल पाइपलाइनों में मिल गया। इससे डायरिया और गैस्ट्रोएंटेराइटिस का गंभीर प्रकोप फैला, अस्पताल भर गए और शहरी जल प्रबंधन की खामियां उजागर हो गईं।
हालांकि राज्य सरकार ने आपातकालीन जल आपूर्ति, चिकित्सा राहत और मुआवजे के कदम उठाए हैं, लेकिन जवाबदेही तय करने और दीर्घकालिक समाधान को लेकर सवाल अभी भी कायम हैं। सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने एनजीटी के इस फैसले को पारदर्शिता, वैज्ञानिक निगरानी और भविष्य की त्रासदियों को रोकने की दिशा में अहम कदम बताया है।





