
Jain Society Warns Not to Underestimate Sanatan Society : कब कम होगी सनातनी और जैन समाज में तनातनी?
Ratlam : मध्य प्रदेश के रतलाम शहर स्थित एक मंदिर इन दिनों सुर्खियों में हैं वैसे तो इस मंदिर पर 2 अलग-अलग धर्मावंलबियों के स्वाधिकार संबंधित मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। जहां यदि किसी धार्मिक त्योहार पर कोई आयोजन करना होता हैं तब जिला प्रशासन द्वारा अनुमति ली जाना आवश्यक होता हैं।तत्पश्चात धार्मिक आयोजन में जिला प्रशासन के अधिकारियों की टीम की मौजूदगी में कोई भी धार्मिक आयोजन सम्पन्न होता हैं। शहर के मध्य प्राचीन राजपैलेस क्षेत्र स्थित बागड़ो के वास में यह मंदिर विद्यमान हैं जो तकरीबन 400 वर्ष से अधिक प्राचीन हैं जहां रियासत काल में राजा-महाराजाओं के आदेश पर धार्मिक आयोजन सम्पन्न होते आ रहें थे।
मंदिर के भीतर भगवान शिव का अवतार चौमुखा महादेव विद्यमान हैं वहीं परिसर में प्राचीन काल से भित्ति चित्र, राजा-महाराजाओं द्वारा स्थापित किए गए शिलालेख आदि मौजूद थे। जिन्हें न्यायालय से रिपेयरिंग करवाने के नाम पर अनुमति लेकर जैन समाज के पदाधिकारियों ने वहां से सनातन धर्म के इन चिन्हों और अन्य साक्ष्यों को धीरे-धीरे नदारद कर दिया और धीरे-धीरे वहां जैन समाज के भगवान की मूर्तियां विराजमान कर दी गई अब ऐसे में यहां सनातन धर्मावलमिबयों की निष्क्रियता को भी हम नकार नहीं सकते हैं जिन्होंने सनातन धर्म के मंदिर में जैन धर्म की मूर्तियां विराजमान करने दी गई और वह लोग निष्क्रिय होकर देखते रहें।
अब हम बात करते हैं यहां धार्मिक आयोजन की तो यहां सनातन धर्म सभा द्वारा पंडित नियुक्त किया गया हैं जो प्रतिदिन भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं यही क्रम जैन समाज का भी हैं जिनके द्वारा निर्धारित पंडित मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। सनातन धर्मावलमिबयों का कहना है कि मंदिर हमारा है तो जैन धर्मावलंबियों का कहना है कि मंदिर हमारा है। उसकी वजह सिर्फ यही हैं कि इस मंदिर को जैन समाज का मंदिर दर्शाना। मंदिर के आधिपत्य की लड़ाई न्यायालय में चलते-चलते 5 दशक से भी अधिक समय बीत चुका हैं और जिला प्रशासन मंदिर की और से सनातन धर्म के लिए न्यायालय में केस लड़ रहा हैं जिसकी शासन की और से पैरवी एडवोकेट बाबुलाल त्रिपाठी ने की थी और न्यायालय के फैसला सनातन धर्म के पक्ष में हुआ था तब जैन समाज ने उच्च न्यायालय में केस दर्ज किया था। तब से केस उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। इधर सनातन धर्म के पदाधिकारियों का कहना हैं कि हम इस मामले में यदि सुप्रीम कोर्ट तक भी जाना होगा तो झिझकेंगे नहीं। इतिहास दर्शाता हैं कि रतलाम रियासत काल में महाराजाओं के वंशजों में किसी जैन ने हुकूमत का संचालन नहीं किया है इतिहास में स्पष्ट हैं कि राजा-महाराजा सनातन धर्म को ही मानने वाले थे और उनके द्वारा स्थापित किए गए रतलाम में दर्जनों मंदिर विद्यमान हैं जिन्हें राजा-महाराजाओं के बाद में शासन की गाइड लाइन के अनुरूप कोर्ट ऑफ वार्ड्स का दर्जा दिया गया हैं और सरकारी व्यवस्था के अधीन यह मंदिर संचालित होते हैं।
अब ऐसे में जैन समाज के अनुयायियों की हठधर्मिता से विगत 5 दशक से अधिक समय से सनातनी और जैन समाज में तनातनी चल रही हैं। इस तनातनी को कम करने हेतु दोनों पक्षों को आपसी समन्वय, सामंजस्य और सद्भावना से समझौता करना समाज, शहर तथा प्रदेश-भर में सद्भावना का संदेश जाएगा जो प्रदेश के लिए मिसाल बन सकता हैं।
जानिए पूरा घटनाक्रम?
इस मामले में शिवरात्रि पर्व पर धार्मिक आयोजन के पश्चात शहर की फिजा को फिर नजर लग गई। जब शिवरात्रि पर्व पर हुए अभिषेक को जैन समाज द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर तथा भड़काऊ भाषा का उपयोग कर एक सामान्य घटना को एक मनगढ़त कहानी बनाकर दो शांतिप्रिय समाजों में अनावश्यक खाई पैदा करने की साजिश रची गई और दुर्भावना से प्रशासन को ज्ञापन देकर शहरवासियों में भ्रान्ति उत्पन्न की गई। जबकि इस आयोजन के दौरान शिवरात्रि पर्व पर जिला प्रशासन के अधिकारियों की देख-रेख में यह आयोजन सम्पन्न हुआ और आयोजक तथा सनातन धर्म सभा के अध्यक्ष अनिल झालानी ने मंदिर परिसर में साफ-सफाई करवाने के लिए एक व्यक्ति को जिम्मेदारी दी गई और उसके द्वारा मंदिर परिसर को स्वच्छ किया गया।
इस मामले में सनातन समाज द्वारा शहर के नागरिकों के समक्ष स्पष्टीकरण किया गया कि श्री चोमुखा महादेव मंदिर महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर अभिषेक, पूजन, आरती के पश्चात परम्परानुरूप प्रसादी वितरण किया गया था। प्रसादी को लेकर जो कुछ विघ्न संतोषियों द्वारा असभ्य शब्दों का इस्तेमाल किया गया था वह सरासर गलत एवं निंदनीय है। वहां वितरित की गई भोलेनाथ की प्रसादी थी जिसमें कलाकंद एवं आलू की चिप्स का उपयोग हम ही नहीं समूचे सनातन समाज के अनुयाई फरियाली मानकर उपवास में भी करते हैं। सनातन धर्म में भगवान को लगाए गए छप्पन भोग में भी आलू का प्रयोग शास्त्रानुसार होता है।
मंदिर में स्थापित जैन देवी-देवताओं की तरफ प्रसादी नहीं बाटी गई तथा पूर्ण अनुशासन के साथ उस तरफ न तो कोई गया और न ही किसी मूर्ति आदि से छेड़छाड़ की गई। यह मौके पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वयं देखा। आयोजकों ने चोमुखा महादेव जो हमारे आदि देव हैं, उस तरफ ही प्रसादी बांटी गई। हम संपूर्ण शहरवासियों को स्पष्ट करना चाहते हैं कि मंदिर का प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है और मंदिर शासन के अंतर्गत है। उच्च न्यायालय के निर्णय अनुसार दोनों धर्म के अनुयायी अपने आराध्य देवी देवता की पूजा-अर्चना करने हेतु स्वतंत्र हैं। जैन समाज के प्रबुद्धजनों से विनम्र निवेदन है कि आप भी सनातन धर्म के ही अंग हो। आपकी हमारी पूजा प्रणाली भिन्न-भिन्न हो सकती है। हम सनातन धर्मी विश्व कल्याण की कामना करते हैं। हम वासुदेव कुटुंबकम वाले हैं। सर्वे भवंतु सुखीनः सिद्धांत वाले हैं। हमारी सोच संकीर्ण नहीं है। हमारे देवस्थान न्यास जैसे गढ़कैलाश मंदिर आदि मंदिरों में अशोक चोटाला (जैन), अमित कटारिया (जैन) आदि संरक्षक व ट्रस्टी है जो कि जैन हैं और बड़े दुर्भाग्य की बात हैं कि महादेव के आयोजन के विरुद्ध ज्ञापन देने में सबसे अग्रणी थे यह दोनों।
जबकि यह लोग प्रतिवर्ष गढ़कैलाश में आलू चिप्स और साबूदाना की आलू से बनी खिचड़ी प्रसाद में बाटते हैं। इन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि यहां चोमुखा महादेव में उन्हें क्या आपत्ति है। वास्तविकता यह हैं कि एक दिन पहले ट्रस्ट अध्यक्ष जो कि उनके अन्य पदाधिकारियों को खरी-खोटी सुना रहें थे और राजेंद्र खाबीया ने अपने आपसी विवाद को इस तरफ मोड़कर जैन सनातन समरसता तथा सद्भावना को बिगाड़ने का कार्य किया। प्रसारित वीडियो की भाषा से यह प्रमाणित होता है। भगवान श्री ऋषभदेव जी हमारे शास्त्रों में तीर्थंकर हैं। सनातन धर्मावलम्बी बुद्ध को भी भगवान मानते है, नानक भी हमारे है, महावीर भगवान अकेले जैन समाज की बपौती नहीं है। सभी सनातनियों के लिए पूज्यनीय देव है। देश के हर धर्म का आदर करना सनातनियों का मूल उद्देश्य है। आज का समय हिंदू धर्म को बचाने का है। यह तभी हो सकता है जब सनातन धर्म बचेगा। आपस में द्वेष भाव रखेंगे तो हिंदू धर्म की रक्षा कैसे होगी। अतः आपसी मनमुटाव दूर कर अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को धर्म में ना घसीटें!
देखिए दोनों वीडियो!





