महाशिवरात्रि विशेष: Kathi Dance निमाड़ की शिव-गौरा की एक आनुष्ठानिक यात्रा

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महाशिवरात्रि विशेष

महाशिवरात्रि विशेष: Kathi Dance निमाड़ की शिव-गौरा की एक आनुष्ठानिक यात्रा

डॉ सुमन चौरे 

काठी निमाड़ की शिव-गौरा की एक आनुष्ठानिक यात्रा है। काठीवालों की यह पदयात्रा उनके घर से देव उठनी ग्यारस से शुरू होकर महाशिवरात्रि को पचमढ़ी में चौरागढ़ के महादेव को धजा चढ़ाकर संपन्न होती है। इस यात्राकाल में काठीवाले गायन, वादन और नृत्य करते हुए जाते हैं। यह मूलत: पुरुष नृत्य है। आकर्षक वेशभूषा में काठी नृत्य दिव्यता का अनुभव करवाता है।

काठी, काष्ठ द्वारा निर्मित देवी का स्वरूप होती है, इसलिए इसे काठ, काठी देव, काठी माता और काठी धजा कहते हैं। काष्ठ से काठी माता का स्वरूप बनाने के समय बड़ी ही पवित्रता, शुचिता और नियमों का ध्यान रखा जाता है। काठी माता का मूल काष्ठ (लकड़ी) गज-सवा गज का बाँस होता है। इसे पचमढ़ी के महादेव मन्दिर के आस-पास के जंगल से लाते हैं। रीति के अनुसार काठी बनाने के लिए इस जंगल के बाँस को एक ही झटके में उखाड़ा जाता है, इसक़े साथ काट पीट नहीं की जाती है। दल के सदस्य इस हरे ताज़ा बाँस को अपने स्थानों तक लाते हैं।

कुअँर उदय सिंह अनुज का आलेख- निमाड़ का लोकनृत्य काठी

महाशिवरात्रि विशेष काठी वाले

देवी प्रतिमा के काष्ठ प्रतीक के हाथों का आधार तैयार करने के लिए बाँस के ऊपरी हिस्से पर एक हाथ लम्बाई की बेर या बेल पत्र के वृक्ष की लकड़ी आड़ी बाँधी जाती है। इस पर सफ़ेद, लाल और पीले कोरे कपड़े लपेट कर हाथों का स्वरूप दिया जाता है। देवी का मुख बनाने के लिए काठ के ऊपर के सिरे पर सफेद और लाल कपड़ा लपेटकर उसे मोरपंखों के मुकुट आदि से सुशोभित कर उस पर टीकी और नाड़ा बाँधा जाता है। शृंगार के लिए रंग-बिरंगे मनकों की माला और चूड़ियाँ पहनाई जाती हैं। देवी रूप में सम्पूर्ण शृंगार कर लाल साड़ी ओढ़ाई जाती है। ओढ़नी पर चमचमाती मालायें पहनाई जाती हैं। लाल वस्त्र में पैसा, सुपारी, अक्षत, कुमकुम और गुड़ बाँधकर काठी माता की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। काठी माता को जमीन पर नहीं रखा जाता है। उन्हें स्थिर खड़ा रखने के लिए लकड़ी के एक पाट पर रखा जाता है। इस पाट को ‘फावड़ी’ कहते हैं।

बूढ़ा {कहानी} 

लोक के राम 

काठी दल के लोगों को ‘भगत’ कहते हैं। आम बोलचाल में इनको ‘काठी वाले’ कहा जाता है। एक काठी दल में कम से कम चार भगत या सदस्य होते हैं। ये सब एक ही कुटुम्ब के सदस्य होते हैं। वे अपने कुटुम्ब की परम्परा के अनुसार काठी देवी की आराधना करते हैं। काठी माता उठाने वाला व्यक्ति धोती-कुरता पहनता है और सिर पर फेंटा बाँधता है। वह जूते-चप्पल नहीं पहनता है। किसी का स्पर्श न हो जाय, इसलिए वह सभी लोगों से कुछ दूरी बनाकर रहता है। इस भगत को ‘रजोळ्या’ कहते हैं। यह घर परिवार का प्रमुख व्यक्ति होता है। दल में दो या अधिक नर्तक होते हैं। परात या थाली बजाने वाला एक व्यक्ति होता है, जिसे ‘खोरदार’ कहते हैं। बजाने वाली यह छोटी परात पीतल की बनी होती है; किन्तु अधिक वज़नदार होती है। लोगों द्वारा काठीमाता को चढ़ाई गई भेंट और भगतों को दी गई भेंट को खोरदार सम्भाल कर रखता है। यह माँगने वाली जाति नहीं है। जब धजा उठाकर चलते हैं, तो मार्ग में भक्त लोग काठी माता की पूजा करते हैं और दान-दक्षिणा देते हैं। निजी लाभ के लिए इनका संचय काठी दल नहीं करता है। मार्ग लम्बा होता है और यात्रा पैदल होती है। देव उठनी ग्यारस से प्रारंभ होकर काठी दल की यात्रा महाशिवरात्रि को पचमढ़ी में सम्पन्न होती है। भक्तजनों द्वारा दिए गए इसी दान और दक्षिणा के माध्यम से काठी दल अपनी यात्रा का व्यय वहन करता है। इस व्यय में देवी की पूजा-आरती, प्रसाद और भोजन का खर्चा भी शामिल रहता है।

मैं हूँ शांता

काष्ठ देवी की आराधना बैठकर नहीं की जाती है, अपितु, खड़े होकर या नृत्य करते हुए ढाक और परात की धुन पर थिकरते क़दमों के साथ गाथाओं को गाते हुए स्तुति करते हैं। काठी नर्तक बड़े डमरु जैसा एक वाद्य बजाते हैं, जिसे ढाक, डुगडुगी और डमरु कहते हैं।

विलुप्त हो रही साहित्य की विधा पहेलियों पर केन्द्रित पुस्तक “मन का पिटारा”

नर्तकों की वेशभूषा बड़ी ही मनमोहक होती है। ये लाल रंग के चोगे पहनते हैं। ऊपर कुरते जैसा पूरी बाँह का शरीर से चिपका अंगरखा रहता है, जो नीचे बड़ा गहरा घेरदार होता है, इससे पूरा शरीर ढँका रहता है। पूरे चोगे पर सफेद या पीले रंग के कपड़े के टुकड़ों या चौड़े गोटे के चाँद-सूरज, सितारे और फूल टँके रहते हैं। कुछ लोग चोगों की घेर में सफेद या पीले रंग के कपड़े की पट्टियाँ भी टकवा लेते हैं, जो लाल घेर को और अधिक सुन्दर बना देती हैं। इसे सिलाई-कढ़ाई की भाषा में एप्लिक वर्क कहते हैं। चोगे के ऊपर से कमर पर कपड़े का एक चौड़ा पट्टा बाँधा जाता है, जिसपर कौड़ियों की माला टँकी रहती है और रेशम के रंग-बिरंगे फुंदे लगे रहते हैं। जो नृत्य के अवसर पर लटकते हैं, झूमते हैं तो बड़े ही लुभावने लगते हैं। साथ ही इस पट्टे पर रेशमी रूमाल भी लटकन के तौर पर टँके रहते हैं, जो नृत्य के समय लहर-लहर लहराते हैं। चोगे के साथ धोती या चूड़ीदार पाजामा पहनते हैं।

अवंतिका उज्जयिनी

आकर्षण केवल चोगे का ही नहीं है, बल्कि फेंटा (पगड़ी) की सुन्दरता भी देखते ही बनती है। पगड़ी चमकीले सितारों से सुशोभित की जाती है; उसपर मोरपंख और कलगी लगाते हैं, जो नृत्य के समय झूमते रहते हैं। पगड़ी को चार गज के एक पीले पट्टे से सिर से गले तक घुमाते हुए बाँधकर, उस पीले कपड़े के दोनों छोरों को आपस में बाँध कर पीठ की ओर से घुटने तक लाकर छोड़ दिया जाता है। मुख शृंगार पर भी पूरा ध्यान दिया जाता है। चमकदार भोडल से मुख सज्जा करते हैं। माथे पर तिलक लगाकर उसके दोनों ओर भौंहों के ऊपर क्रम से लाल रंग से टीकियाँ लगाई जाती हैं; जिसके चारों ओर पीले या सफेद रंग की बिंदियों से सजावट की जाती है।

 

नृत्य करते समय अंग की थिरकन के साथ पगड़ी पर लगे मोरपंख और तुर्रा, गले की मालाएँ, कान के लोलक और कमर में बँधी कौड़ियों की मालाओं के साथ फुंदने भी उछल-उछल कर आनन्द में नृत्य करते से प्रतीत होते हैं। पाँवों में बँधे घुँघरुओं की झनकार, डुगडुगी की कंपन और परात पर डंडे की थाप से उपजी ध्वनि नर्तकों के मुख से निकले गीतों को गति तो देते ही हैं, साथ ही नर्तकों के पैरों की थिरकन को भी बढ़ाते हैं। नर्तकों के एक हाथ की डुगडुगी पर जैसे ही दूसरे हाथ में थामी छोटी लकड़ी की डंडी से चोट करते हैं, तो लगता है, भगवान् शिवशंकर का डमरू नाद कर रहा है। देव आराधना करते हुए काठी नर्तकों की नृत्य मुद्रा ऐसी प्रतीत होती है, मानों नृत्य के देवता स्वयं धरती पर अवतरित हो गए हों।

काठी नृत्य के अवसर पर चलने वाले लोकगीत गणेश वन्दना से प्रारम्भ होते हैं। इसके बाद गाथा गायी जाती है। निमाड़ के काठी दल ‘गोंडेण नार’, ’चूड़िलो’, ‘शंकर-पार्वती विवाह’, ‘राजा हरिशचन्द्र’, ‘समुन्दर मन्थन’ और ‘कालियादह’ के गाथा गीत गाते हैं। गाथा गीतों पर क्षेत्रीयता का प्रभाव भी दीखता है और निमाड़ में प्रचलित गाथा गीतों के साथ निमाड़ के प्रतिवेशी भुवाणा क्षेत्र और मालवा क्षेत्रों में कुछ और अन्य गाथा गीत भी गाये जाते हैं। भुवाणा क्षेत्र के काठी दल, ‘भीलट देव’ और ‘भैरो देव’ और ‘नानी बाई का मायरा’ भी गाते हैं। जबकि मालवा क्षेत्र के काठी दल ‘मटकी फोड़’ और ‘नानी बाई का मायरा’ भी गाते हैं। निर्मल भोले मन वाले लोक का अपने आराध्य देव से ऐक्यभाव है। वो अपने भगवान् को अपने ही परिवार और समाज का ही अंग समझता है। लोक की इस भावना को विभिन्न गाथाओं में देखा जा सकता है। जैसे ‘शंकर-पार्वती विवाह’ की गाथा में काठीवाले आदिदेव महादेव शंकर की माता के माध्यम से गाथा आगे बढ़ाते हैं। इन गाथाओं के माध्यम से लोगों को सामाजिक व्यवहार की शिक्षाएँ भी दी जाती हैं। काठी वालों की गाथा गाने और नृत्य करने की रीत भी बड़ी निराली होती है।

नर्तक गाथा की एक कड़ी गाते हैं, जिसको रखोळ्या और खोरदार दोहराते हैं। नर्तक फिर से उसी कड़ी को गाते हुए तेज चक्री जैसे गोल-गोल घूमकर डुगडुगी बजाकर नृत्य करते हैं। नृत्य करते हुए ये इतनी गति से घूमते हैं, कि देखने वालों की आँखें चकरा जाती हैं। एक गाथा लगभग चार-पाँच घण्टे में पूरी होती है। जब कोई खास अरज होती है, तब ही पूरी गाथा गाते हैं। आमतौर पर मन्नत वाले पूरी गाथा गवाते हैं। जब किसी के द्वार पर या आँगन में गाथा गाते हैं, तो उस गाथा की कुछ ही कड़ियाँ गाते हैं। मार्ग में चलते-चलते भी गाते जाते हैं। काठीवाले महाशिवरात्रि को पचमढ़ी में महादेव को धजा चढ़ाते हैं। धजा चढ़ाते समय कुछ नियमों का पालन किया जाता है। इस अवसर पर काठी माता का पूरा शृंगार चढ़ाया जाता है और फिर उसमें लगी धजा चढ़ाई जाती है। परम्परा के अनुसार इस अवसर पर महिलाओं की उपस्थिति वर्जित रहती है।

 

गोंड ‘बड़ा महादेव’ को, कोरकू ‘डोंगरदेव’ को, बंजारे ‘रामदेव’ को, बलाही ‘सोमवार बाबा’ को और ‘पचमढ़ी के महादेव’ को मानते हैं। बलाही (बलाई) लोग पचमढ़ी के महादेव को काठी धजा चढ़ाते हैं। काठी उठाने के कुछ नियम होते हैं, जैसे कोई मन्नत मानकर पाँच या ग्यारह साल काठी उठाते हैं, तो कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परम्परा चली आती है। जब भगत देव उठनी ग्यारस पर काठी उठाकर निकलते हैं, तो फिर घर की ओर पीछे मुड़ कर नहीं देखते। अनुष्ठान पूर्ण करने के बाद ही वे घर लौटते हैं। यात्रा में शुचिता का पूरा ध्यान रखा जाता है। पूरी काठी-यात्रा काल में सभी भगत प्रतिदिन स्नान कर प्रात:काल काठी की पूजन करते हैं।

 

परिवार छोड़कर यात्रा पर निकले भगत स्वपाकी होते हैं। वे यात्रा काल में पूर्ण सात्विक भोजन करते हैं। प्याज, लहसुन और माँस आदि नहीं खाते। वे सब जमीन पर सोते हैं। वे काठीमाता को कभी भी जमीन पर नहीं रखते, हमेशा ही फावड़ी (पाट) पर खड़ा रखते हैं। चौरागढ़ में धजा चढ़ाने के बाद नर्तक अपना घेरदार चोला छोड़कर मन्दिर में नए वस्त्र पहनते हैं। वे सामान्य परिधान धारण कर घर लौटते हैं। जिस बाँस से काठी माता बनाई जाती है, उसे और जिस फावड़ी पर काठी माता को रखते हैं, उसे घर लौटकर घर के अंदर छत पर एक कोने में ऐसे स्थान पर सुरक्षित रखते हैं, ताकि उसे छुआछूत से बचाया जा सके। जब कोई व्यक्ति किसी ताव-ज्वर या किसी व्याधि से पीड़ित होता है, तब वह काठीवालों के घर आता है। काठीवाला भगत इस फावड़ी को धोकर इसका जल पीड़ित को पिला देता है। कहा जाता है, जन-जन में यह आस्था है, श्रद्धा है, कि इस जल को पीने वाला पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। काठी लोक-आस्था की देवी माता है।

 

काठी वाले देव उठनी ग्यारस को काठी माता अपने घर से उठाते हैं, तो वे सर्वप्रथम मन्दिर में या भगवान् के द्वार पर गणपति का गीत गाते हैं।

उनमें से एक गीत –

आयो सभा का माँयS गजाननS आयो जीS

गौराS माताS होS पिता शिव शंकराS

जिन्नS थारो नावS धरायोS

गजानन आयो जीS…

अरेS अगरS चन्नन का रेS…बण्योS थारो पाळणोS

अरेS रेशमS डोरS लगाओS

गजाननS आयो जीS…

भावार्थ: सभा के मध्य गजानन महाराज आ गए हैं। गजाननजी की माता गौरा और पिता शिवशंकर हैं, जिन्होंने अपने पुत्र का नाम रखा है। आपका पालना चंदन की लकड़ी का है, जिसमें रेशम की लम्बी डोर बँधी है। इस पालने पर गजानन झूलते हैं।

 

फिर मंदिर के बाद काठी वाले गाँव प्रधान के घर या पटेल के आँगन में जाकर काठी माता को खड़ी करते हैं और नृत्य करते हैं। पटेलन काठी माता की कुमकुम, सिंदूर, पुष्प से पूजाकर अन्न वस्त्र भेंट करती हैं। फिर रखोळ्या और नर्तकों को कुमकुम लगाकर सादर भेंट देती हैं। एक सूपड़े में अन्न, वस्त्र, गुड़, खोपरा या नारियल फल अपनी श्रद्धा व मानता के अनुसार भेंट किया जाता है। भगत अन्न को अपनी झोली में डालकर आशीर्वाद स्वरूप मुट्ठीभर अन्न पूजनकर्ता के घर में बरकत हेतु उछाल देते हैं।

 

मन्नत मानने की कई रीतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग ऐसी मानता लेते हैं, कि हमारे घर संतान हो या हमारी संतान का व्यवसाय जम जाय या खेती का काम धंधा अच्छे से चल निकले या हमारी संतान का विवाह हो जाय, तो हम रातभर काठी माता को रोकेंगे और गाथा करवायँगे तथा फिर सबको भोजन करवायँगे। जब उनकी मनोकामना पूर्ण होती है, तो काठी वालों को निमंत्रित करते हैं और उनके घर रातभर का आयोजन होता है, वे लम्बी-लम्बी गाथाएँ गाकर नृत्य करते हैं। अपने सभी कुटुम्बजनों और रिश्तेदारों को न्यौता भेजा जाता है। काठी माता और भगतों को मन्नत के अनुसार सूपड़े से भेंट दी जाती है। जबकि कुछ लोग अपनी मानता के अनुसार काठी माता को घर बुलाकर पूजन और दान- दक्षिणा करते हैं, इनकी रातभर के आयोजन की मानता नहीं होती है।

 

काठी वाले एक जगह लम्बे समय तक नहीं रुकते हैं। वे चलते ही चलते जाते हैं, अपने घर से पचमढ़ी तक। मार्ग के गाँवों में गाथा गायन और नृत्य करते जाते हैं। जिस गाँव से वे गुजरते हैं, वहाँ के पटेल या मुखिया से रज़ा लेते हैं, उनके गाँव में रुकने के लिए। काठी वाले अपनी अनेक पीढ़ियों से पचमढ़ी जाते हैं, इसलिए कई गाँवों के लोगों से उनके संबंध बन जाते हैं। गाँव के मन्दिरों में और चावड़ी-चौपाल पर जब ये लोग नृत्य करते हैं, तो वहाँ दर्शक भक्त बड़ी संख्या में एकत्र हो जाते हैं। गाथा गायन के अनुसार नृत्य में ठुमके, झुककर घूम्मर देना बड़ा आकर्षण पैदा करता है। गाथाओं में परिवारों के लिए सीख भी हैं। ‘शंकर-पार्वती विवाह’ की गाथा में उमा कहती हैं, “हे शंकर, हमको चूड़िलो पहनने की इच्छा है।” इसपर शंकरजी उमा को दो तुम्बा दे देते हैं। इसपर उमा रुष्ट होकर कहती हैं, कि आपके पास दाम चुकाने के लिए धन नहीं है, तो अपने नन्दी को बेच दो।

गाथा गीत की एक कड़ी –

चूड़िलोS- चूड़िलोS करतोS मणिहारो आयोS

हमखS तेS चूड़िलो अभरातS जीS

होS भोळा संकर दS रेS असरफीS

लेवोS लेवोS उमा, लेओ दोई तुम्बाS

तेकी तो पेरो सोभागेणS चूड़िलोजी

ओS भोळा तुम्भ्याS की कूणS देSसे चूड़िलोS

नहीं होयS दामS तो एचीS दS थारो नन्दीगणS.

हमखS तेS पेराओ चूड़िलोS…

उमाS थारो बापS तेS राजा हिमाचलS

नंदी तो म्हारो प्राणS पियारोS…

नन्दी खS तूनS कसोS वरजियोS

 

भावार्थ: ‘चूड़ी लो, चूड़ी पहन लो’ की आवाज़ लगाते हुए मणिहारी आया। उमा ने कहा, “हे मेरे स्वामी भोला शंकर, हमें चूड़ी पहनने की अभिलाषा है, अशरफी दे दो।” शंकर भगवान् ने अपने दो तुम्बे दे दिए। उमा को रोष आ गया। उन्होंने कहा, “तुम्बे से कौन चूड़िला पहनाएगा। तुम्हारे पास दाम चुकाने के पैसे नहीं हैं, तो अपने नन्दी को बेच दो।” नन्दी को बेचने की बात सुनकर शंकरजी क्रुद्ध हो गए। वे उमा से बोले, “तुम्हारे पिता हिमाचलराज हैं, वह तुम्हें चूड़िला पहना देंगे। नन्दी तो मुझे मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारा है, तुमने नन्दी को बेचने की बात करने की हिम्मत कैसे की।” कथा आगे बढ़ती है, उमा रुष्ट होकर अपने पिता के घर जाने लगीं। तब शंकर की माता ने उमा को समझाया – “मेरी लाड़ली बहू, तुझे मैं अशरफी देती हूँ, तू चूड़ीला पहन ले, मेरा बेटा तो ऐसा ही अवगढ़ ढाणी है, तू चली जायगी, तो कौन ऐसे बैरागी को अपनी बेटी देगा।”

गाथा गीत की आगे की एक कड़ी –

लेवोS सोभागेण असरफीS ओS

माताS मनावS ववूS म्हारी पेरो चूड़िलो

म्हारो तो जायो बाबा बैरागीS

तूS जासे तूS तोS राखS म्हारीS लाजS

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भावार्थ: शंकरजी की माँ कहती हैं, हे सौभाग्यवती बहू, यह अशरफी लो और चूड़िला पहन लो। मेरा बेटा तो ऐसा ही बाबा बैरागी है। अगर तू घर से चली गई, तो मेरे घर की लाज कौन रखेगा। गीत के भाव जानों, तो सुखद आश्चर्य होता है, कि यह लोकमाता की ममता है, कि वह अपने बेटे की गृहस्थी पर आँच आने से बचाने की कोशिश पूरी करती है।

 

माता अपने अवघड़ ढाणी बेटे से चूड़ी खरीदने के लिए अशरफी माँगने वाली गौरा को समझाती हैं- “बहू, मैं तुझे अशरफी दूँगी, तू चूड़िला पहन ले।” यहाँ पारिवारिक व्यवहार के दर्शन होते हैं। गाथा में भगवान् शंकर का तादात्म्य लोक से स्थापित किया गया है। महादेव का तो आदि और अन्त नहीं है, वे तो सृष्टि निर्माण के पहले से ही हैं। किन्तु भक्ति भावना में तो वे काठी वालों के ही अपने और अपनी जाति के ही उन जैसे एक व्यक्ति हैं, जहाँ आर्थिक तंगी के बीच जीवन चलता है। खर्चों पर से पति पत्नी के बीच नोंक-झोंक होती रहती है और माँ उनके मनमुटाव को दूर करती है। इसके साथ ही भगवान् शंकर उमा की नंदी बेचने वाली बात से क्रुद्ध हो जाते हैं। भगवान शंकर बिना नंदी के नहीं रह सकते। यहाँ भगवान शंकर एक किसान के रूप में हैं। यदि किसान अपना बैल (नंदी) बेच देगा, तो वह उसके बिना अपनी खेती किसानी कैसे करेगा। यही भाव इस गीत में भगवान् शंकर के क्रोध के पीछे है। किसान बिना सोने-चाँदी के अलंकार के रह सकता है; किन्तु बिना बैल के नहीं रह सकता।

‘गोंडेण नार’ गाथा गीत की एक कड़ी में शंकरजी कहते हैं, कि हे गोंडेण, खाने को घर में कुछ नहीं है, तो तू जंगल से कंदमूल खोदकर ले आ-

सुणS होS गोंडेणS नारS माथS धरS खीड़ाS

नS खोदी लाS कंद मूळ फल, दूरS होयS पीड़ा

हिम्माचलS की बेटी उमा सुकुमारीS

कंदS मूलS खोदतS जुरS आया भारीS

देखीS नS गोंड राजा शंकर मनS मS भरमायाS

या तो बेटी राजघर कीS मनS क्यों वनS पौचायाS

चौरागढ़ पS चवरS बणायीS

पौढ़ाई हो गोंडेणS नारS

सूर्या गाय को दूध धुवाड़्यो नS न्हावणS करड़S भरतारS

तवS जाई जुरS उतरयो उमा सुकुमार

भावार्थ: भगवान् शंकर उमा से कहते हैं, सुनो गोंडेण नार, तुम सिर पर टोकना रखकर जंगल में जाकर कंदमूल फल खोदकर ले आओ, जिन्हें खाकर हमारी भूख की पीड़ा शान्त हो जायगी। हिमालयराज की बेटी उमा कंदमूल खोदकर लाई, तो उसे ज्वर आ गया। गोंडण नारS (देवी उमा) की दशा देखकर गोंडराजा (भगवान् शंकर) भ्रमित हो गए, कि मैंने गलती कर दी। यह तो राजा की सुकुमारी बेटी है, मैंने इसे कंदमूल फल लाने के लिए जंगल क्यों भेजा। शंकर ने चौरागढ़ पर चँवर बनाई और उन्हें विश्राम कराया। सूर्या गाय का दूध तुरंत दुह कर, इस दूध से देवी को स्नान करवाया, तब सुकुमारी उमा का ज्वर उतर गया।

 

काठी वाले राजा हरिश्चन्द्र की गाथा भी गाते हैं और नृत्य करते हैं।

इस गाथा का एक अंश-

सतयुगS मS रेS हुयोS एक राजा हरिसचन्दS

जेनS करियोS सतS को विचारS

सतS ओढ़णूS ओकोS सतS बिछावणूS

सतS तेS जीमणS सतS भरी स्वाशS

एकS वारी रेS ओखS हुयो सुपणोS

सुपणा में दान करियोS रेS सगळो राजS

माया रेS मुनि जेनS लई लियो सगळो राजS

अरेS हरिसचन्द नS एची तारामती नार

नS एची दियो रेS नानो वीरS

नS धरी रेS मुनि का हाथS दखिणाS

अरे होयS जसी नहीं होयS रेS होणीS

हरिसचन्दS ली सतS की परीछाS

डोमS राजा घरS मसाण्याS की डीकरीS

जवS जाई मुरदाS जळावS

राणीS नS तेS आधी साड़ी फाड़ी नS

नS आधी सी तनS ढकायS

भोळो रेS संकर हुओ हाजिर नS

जीवाड़ी दियो रोहित बाळS

देवS दनुज सब करS रेS फूल की वरसा

सतS को नावS हरिसचन्दSS

 

भावार्थ: सतयुग में एक राजा हरिश्चन्द्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने सत्य का विचार किया। सत्य ही बोलना, सत्य ही ओढ़ना, सत्य ही बिछावना, सत्य ही जीमना और सत्य ही श्वास-प्रश्वास में लेते थे। एक रात उन्हें ऐसा स्वप्न आया, कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण राज्य ऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया है। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र आये, राजा ने अपना स्वप्न सुनाया। ऋषिराज ने कहा, “तो स्वप्न पूरा करो।” हरिश्चन्द्र ने ऋषि को अपना सम्पूर्ण राज्य दान में देने के लिए जल अंजुली में लेकर संकल्प करने के लिए मुद्रा धरी, तब ऋषि बोले, “हे राजन, यह राज्य मेरा है, संकल्प के लिए आप अलग से दक्षिणा लाइये।” हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्नी और छोटे बालक को बेच दिया और स्वयं डोम राजा के घर बिक गए। हरिश्चन्द्र की नौकरी श्मशान पर रहती थी। उसे शव दाह के लिए कर वसूल करना होता था। एक दिन उनकी पत्नी अपने प्रिय पुत्र का शव लेकर आई, तब भी हरिशचन्द्र ने कर माँगा। उनकी पत्नी ने कहा, “ये आपका पुत्र है और मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।” हरिश्चन्द्र ने उत्तर दिया “मैं तो डोमराजा का नौकर हूँ, कर लिए बिना इसका दाह नहीं हो सकता है।” पत्नी ने अपने शरीर की आधी साड़ी फाड़कर कर दी। तब सत्य रूप में भगवान् शंकर प्रकट हो गए। ये सब भगवान् शंकर की ही लीला थी। उन्होंने हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को जीवित कर दिया और हरिश्चन्द्र को वरदान दिया कि तुम्हारे नाम से यह युग ‘सतयुग’ के नाम से पहचाना जायगा। शंकर ही ऋषि विश्वामित्र के रूप में राज्य लेने के लिए आये थे। उन्होंने पूरा राज्य हरिश्चन्द्र को लौटा दिया।

 

काठी एक बड़ा ही कठिन अनुष्ठान है। तेज ठंड के मौसम में कड़े नियमों का पालन करते हुए नंगे पाँव पैदल ही लम्बी दूरी तय करना, किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। विभिन्न कठिनाइयों के कारण धीरे-धीरे काठी वाले कम होते जा रहे हैं। लेकिन तनिक भी कम नहीं हुआ है, काठी वालों की दिव्यता और उनका आकर्षण।

डॉ. सुमन चौरे

डॉ सुमन चौरे, लोकसंस्कृतिविद्, भोपाल