
आओ मध्य प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री की बात करते हैं…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
मध्य प्रदेश विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्षों को याद करने की परिपाटी वास्तव में हमें अपने समृद्ध अतीत से परिचित कराती है। आज प्रदेश के करोड़ों नागरिकों को यह पता नहीं होगा कि कैलाश नाथ काटजू कौन थे? या यह बात पता नहीं होगी कि उड़ीसा के पहले और पश्चिम बंगाल के दूसरे राज्यपाल कौन थे और उनका मत प्रदेश से क्या नाता था? और सीधे सीधे पूछा जाए तो मध्यप्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री कौन थे, यह बात जनसामान्य को पता नहीं होगी? और सामान्य तौर पर काटजू अस्पताल का नाम किसके नाम पर रखा गया है, भोपाल के ही 90 फीसदी निवासी यह नहीं बता पाएंगे। और यह बता पाना तो किसी के बस की बात नहीं है कि देश के चौथे रक्षा मंत्री और तीसरे गृहमंत्री कौन थे और उनका मध्य प्रदेश से क्या नाता था? ऐसे सभी सवालों का जवाब एक ही है- कैलाश नाथ काटजू। आइए आज हम इनकी बात करते हैं। 17 जून को उनकी जयंती पर मध्य प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। इस बहाने उनके बारे में बारे में जानना हम सभी के लिए ज्ञानवर्धक है।
कैलाश नाथ काटजू (17 जून 1887 -17 फरवरी 1968) एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री , केंद्रीय गृह मंत्री और केंद्रीय रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे भारत के सबसे प्रख्यात वकीलों में से एक थे। उन्होंने अपने समय के कुछ सबसे महत्वपूर्ण मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय सेना के मुकदमे भी शामिल हैं । काटजू भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में आरंभिक रूप से शामिल हुए और अपने कार्यों के लिए साथी स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं के साथ कई वर्ष कारावास में बिताए। वह 15 अगस्त 1947-20 जून 1948 तक उड़ीसा के प्रथम राज्यपाल रहे। इसके बाद 21 जून 1948-1 नवंबर 1951 तक पश्चिम बंगाल के दूसरे राज्यपाल के रूप में उन्होंने कार्य किया। 5 नवंबर 1951-10 जनवरी 1955 तक वह देश के तीसरे गृह मंत्री रहे। 10 जनवरी 1955 – 30 जनवरी 1957 तक वह देश के चौथे रक्षा मंत्री रहे। और इन सब पदों पर रहने के बाद कैलाश नाथ काटजू 31 जनवरी 1957 से 11 मार्च 1962 तक पूरे 5 साल एक माह ग्यारह दिन तक मध्य प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री रहे। तो देश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर रहने वाले कैलाश नाथ काटजू मध्य प्रदेश की वह धरोहर हैं जिनके बारे में प्रदेश के हर नागरिक को जानकारी होना ही चाहिए।
कैलाश नाथ काटजू का जन्म 17 जून 1887 को जावरा रियासत (वर्तमान मध्य प्रदेश में) में हुआ था। उनका परिवार कश्मीरी पंडित था जो जावरा में बस गया था। उनके पिता त्रिभुवन नाथ काटजू रियासत के पूर्व दीवान थे। कैलाश नाथ ने जावरा के बार हाई स्कूल में शिक्षा प्राप्त की, जिसके बाद उन्हें रंग महल स्कूल में अध्ययन के लिए लाहौर भेजा गया। उन्होंने अगले वर्ष पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और मार्च 1905 में लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उसी वर्ष जुलाई में, उन्होंने इलाहाबाद के मुइर सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। सितंबर 1907 में, उन्होंने प्रांत में द्वितीय स्थान प्राप्त करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून में डिग्री प्राप्त की। 1908 में, उन्होंने उसी विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने उसी वर्ष कानपुर में वकालत शुरू की, फिर 1914 में इलाहाबाद चले गए। उन्होंने 1919 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून में डॉक्टरेट (एलएल.डी.) की उपाधि प्राप्त की और 1921 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में शामिल हुए।
1933 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में काटजू ने मेरठ षड्यंत्र मामले में आरोपियों का बचाव किया और बाद में दिल्ली के लाल किले में भारतीय राष्ट्रीय सेना के मुकदमों में आरोपी सैन्य अधिकारियों का प्रतिनिधित्व किया। 17 जुलाई 1937 को, वे गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में संयुक्त प्रांत के विधि एवं न्याय एवं संसदीय कार्य मंत्री बने। वे इलाहाबाद जिले (दोआबा) के निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा के लिए चुने गए। 2 नवंबर 1939 को मंत्रालय ने इस्तीफा दे दिया और जल्द ही काटजू को 18 महीने के लिए जेल भेज दिया गया। उन्हें 1942 में फिर से जेल भेजा गया। उन्होंने भारत की संविधान सभा में भी कार्य किया। 1935 से 1937 के बीच, उन्होंने इलाहाबाद नगर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में और बाद में प्रयाग महिला विद्यापीठ, इलाहाबाद के कुलाधिपति के रूप में कार्य किया। भारत की स्वतंत्रता के बाद, काटजू कई उच्च राजनीतिक पदों पर आसीन हुए। प्रारंभ में उन्हें 15 अगस्त 1947 से 20 जून 1948 तक उड़ीसा का राज्यपाल बनाया गया। वे 21 जून 1948 को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने और 31 अक्टूबर 1951 तक इस पद पर रहे। 1951 में वे मंदसौर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और 1951 में जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में विधि मंत्री के रूप में शामिल हुए। नवंबर 1951 में वे सी. राजगोपालाचारी के उत्तराधिकारी के रूप में देश के गृह मंत्री बने। 1955 में उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया। वे 31 जनवरी 1957 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 11 मार्च 1962 तक इस पद पर रहे। उन्होंने सामान्य प्रशासन, गृह, प्रचार, योजना एवं विकास, समन्वय और भ्रष्टाचार विरोधी विभागों का भी कार्यभार संभाला।
काटजू और उनकी पत्नी रूप किशोरी के पाँच बच्चे, तीन बेटे और दो बेटियाँ थीं। सबसे बड़े बेटे, शिव नाथ काटजू ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया और सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में प्रवेश किया और उत्तर प्रदेश विधानमंडल के सदस्य चुने गए । एक अन्य बेटे, ब्रह्मा नाथ काटजू , उसी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुँचे। उनकी बेटियों में से एक सरोज मुखर्जी थीं। काटजू के पोतों ने भी ख्याति अर्जित की है। उनके पोते मार्कंडेय (शिव नाथ के पुत्र) ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। एक अन्य पोते विवेक काटजू, आईएफएस , एक सेवानिवृत्त राजनयिक रहे, जिन्होंने कई संवेदनशील पदों पर कार्य किया।तिलोत्तमा मुखर्जी, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और राजनीतिज्ञ एवं पूर्व राजनयिक शशि थरूर की पहली पत्नी , काटजू की पोती (पोती की बेटी) हैं।
काटजू 1967 की गर्मियों में गुर्दे की बीमारी से उबर चुके थे। फरवरी 1968 की शुरुआत में उनकी हालत बिगड़ने के बाद, 17 फरवरी 1968 को शाम 7:55 बजे इलाहाबाद स्थित उनके आवास पर उनका निधन हो गया। अगले दिन उनके बेटे शिव नाथ ने गंगा तट पर उनका अंतिम संस्कार किया। डॉ. कैलाश नाथ काटजू ने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें से ‘पैरवी के क्षेत्र में प्रयोग: न्याय न्यायालयों में एक दिग्गज’,
‘मुझे याद आने वाले दिन’ और ‘पैरवी में यादें और प्रयोग’ शामिल हैं। वह एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के संस्थापकों में से एक थे और कंपनी के मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन के सात मूल ग्राहकों में से एक थे, जिसने नेशनल हेराल्ड और दो अन्य समाचार पत्र प्रकाशित किए।
तो कैलाश नाथ काटजू मध्य प्रदेश में भले ही कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री रहे हों, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर द्वारा स्थापित पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व विधानसभा अध्यक्षों को याद करने की परिपाटी के तहत जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और विधायक भगवान दास सबनानी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की, तो यह एक सुखद अनुभूति बन गई। वास्तव में अपने समृद्ध अतीत को याद करके
सभी गौरवान्वित महसूस करते हैं…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





