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संस्मरण – ऑस्ट्रेलिया की अँधेरी शाम 

संस्मरण – ऑस्ट्रेलिया की अँधेरी शाम

– एन के त्रिपाठी

वर्ष 1997 में इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देशों की अपनी पहली यात्रा के उपरांत, मैं लक्ष्मी को भी उनकी पहली विदेश यात्रा पर ले जाने के लिए उत्सुक था। 8 सितंबर, 2004 को बड़ी कठिनाई से छुट्टी और अनुमति प्राप्त कर मैं लक्ष्मी सहित मुम्बई से सिंगापुर पहुँचा। सिंगापुर और मलेशिया में कुछ दिन भ्रमण के उपरांत एक रात को ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तट के मध्य में स्थित डार्विन एयरपोर्ट पहुँचा। एयरपोर्ट पर वहाँ के स्थानीय समय के अनुसार अपनी घड़ी मिलाई। इमीग्रेशन पर कुछ समस्या के पश्चात दूसरी फ़्लाइट से भोर के समय हम ऑस्ट्रेलिया के पूर्वोत्तर कोने में स्थित कैंज़ (Cairns) शहर पहुँच गए।

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कैंज़ एक बंदरगाह शहर है जिसके पूरब में प्रशांत महासागर है। इसके तट के पास ही समुद्र के नीचे विश्व प्रसिद्ध ग्रेट बैरियर रीफ़ है जो 2300 किलोमीटर लंबी पानी के नीचे चली गई है। ये कोरल से बनी हैं तथा इनकी सुंदरता पनडुब्बी-नुमा नाव में बैठकर पर्यटकों द्वारा देखी जाती है। शहर के पश्चिम की ओर थोड़ी ही दूर पर ऊंचा पठार प्रारम्भ हो जाता है जहाँ घने और बहुत लंबे वृक्षों वाले वर्षा वन (rain forest) स्थित हैं।

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होटल पहुँचने के कुछ ही देर पश्चात हमारी बस आ गई। बस हमें पश्चिमी पठार के ऊपर ले गई जहाँ कुछ दूर आगे जाकर वर्षा वन क्षेत्र आ गया। हम लोग रोप वे पर बैठ कर 100 से 150 फ़ीट लम्बे वृक्षों के भी ऊपर चल रहे थे। घने पेड़ों के बीच से धरती देखना संभव नहीं था। एक विराट हरियाली नीचे थी। अचानक रोप वे वन के अन्दर धरती पर उतरा जहाँ पूर्ण अंधेरा था। बिजली के प्रकाश में वहाँ स्थित सुविधाओं में लंच की व्यवस्था थी। बिजली के प्रकाश में आस पास के पेड़ों पर अनवरत ऊँची बेलें चढ़ी हुई दिखाई दीं।

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लौटकर बस के गाइड ने शहर के बाहर ही एक विशाल और सुंदर पार्क के सामने उतार दिया और पार्क घूम कर साढ़े पाँच बजे उसी स्थान पर आने के लिए निर्देशित किया। मैं और लक्ष्मी धीरे धीरे पार्क में घूमते रहे। कुछ देर पश्चात लोग पार्क के गेट की ओर वापस लौटने लगे। मैंने अपनी घड़ी देखी और कहा कि अभी समय है कुछ और घूमते हैं। जब हम दोनों वापस गेट पर पहुँचे तो वहाँ न बस थी और न ही कोई व्यक्ति। हम लोग गेट से क़रीब सौ मीटर दूर एक तिराहे तक गए, परन्तु वहाँ भी बस नहीं थी। थोड़ी देर में सन्नाटा और अँधेरा फैल गया। शहर से दूर वहाँ निर्जन, बिना स्ट्रीट लाइट की सड़कों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।उन दिनों रोमिंग मोबाइल का चलन भी नहीं था। इस उलझन के बीच मुझे कुछ दूर पर धुंधला सा एक बूथ दिखाई दिया। उसके अंदर एक फ़ोन दिखाई दिया। फ़ोन के हैंडसेट को उठाया। उस पर आई हैलो की आवाज़ से एक आशा की किरण जगी। पुलिस कंट्रोल रूम से बात हुई और उन्होंने टैक्सी उसी स्थान पर भिजवाने का आश्वासन दिया। आधे घंटे बाद टैक्सी आ गई और रात में हम दोनो किसी प्रकार होटल वापस पहुँच सके।

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कैंज़ पहुँचने के थोड़ी ही देर बाद हमें बस से घूमने के लिए निकलना पड़ा था, इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया कि मेरी घड़ी में डार्विन का समय कैंज़ से आधा घंटे पीछे था। बड़े क्षेत्रफल के देशों में शहरों के समय पृथक-पृथक हो सकते हैं।