सखि बसंत आया / सखि बस अंत आया….

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व्यंग     

सखि बसंत आया / सखि बस अंत आया….

श्रीकांत द्विवेदी

बसंत शब्द का ध्यान आते ही मन में एक विशेष प्रकार के उत्साह एवं आनंद की अनुभूति होने लग जाती है । निस्संदेह इसीलिए हर किसी को इंतजार रहता है बसंत ऋतु के आगमन का । भारतीय पंचांग के अनुसार माघ के मध्य भाग से लेकर फागन- चैत्र माह तक का मौसम बसंत ऋतु से सराबोर रहता है । तय है कि इस दौर में प्रकृति अपने सबसे सुंदर स्वरूप में होती है । प्रकृति के स्वरूप में होने वाला मनभावन परिवर्तन ही बसंत ऋतु का आगमन होता है । इस ऋतु आगमन के साथ ही पतझर की शुरूआत , नई कोपलों की आहट , आम की डालियों पर इठलाते बोर , खेतों में पीली सरसों के साथ पीले फूलों की महक वातावरण में उल्लासित कर देती है ।

मौसम की इस सुहावनी दस्तक का कोयल अपनी मधुर कूक से स्वागत करती है । यहां तक तो सब कुछ मन को भाने वाला है । लेकिन इस मनभावन ऋतु परिवर्तन के साथ तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन से भी बेखबर न रहे । जलवायु का यह परिवर्तन धरती के तापमान में बढ़त के साथ अनेक प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दे रहा है । ऐसे में हम किस बसंत की अनुभूति करें । बसंत का संदेश तो प्रकृति में बदलाव के साथ मानव जाति के लिए मानवीय मूल्यों के जागरण का संदेश भी है । प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने का संदेश भी । इस संदेश का आशय यही कि हम प्रकृति को सहेजकर रखें । यदि ऐसा कुछ होता है , तभी तो बसंत है । जबकि सच तो यह है कि हमने प्रकृति के साथ मिलकर चलना छोड़ दिया है ।

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प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन तथा अनियोजित विकास की चाह ने बसंत की वास्तविक अनुभूति से हमें कौसों दूर कर दिया । वायु प्रदूषण एवं जल प्रदूषण से पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर है । ऐसे में भविष्य की बसंत ऋतु के स्वागत हेतु कोयल की तान कहां से लायेंगे । वायु प्रदूषण एवं दूषित पानी के कारण देशभर में हजारों – लाखों लोग काल -कवलित हो रहे हैं । कभी बसंत के आगमन के साथ प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को लेकर छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘ निराला ‘ द्वारा रचित कविता ‘ सखी री बसंत आयो रे ‘ या ‘ सखि बसंत आया ‘ जैसी रचना आज कितनी प्रासंगिक है , विचार करें । ऐसे में यदि आज बसंत के आगमन को लेकर निरालाजी को कुछ रचना होता तो शायद यही रचा जाता कि ‘ सखि बस अंत आया ।