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Navratra Special: पुरुषात्मक प्रकृति में मातृ शक्ति की साधना के नवरात्र का ज्योतिषीय मर्म

इस प्रकृति में सब कुछ गणित से ही कैसे उत्पन्न हुआ,नवरात्र बेला में अंकों का आध्यात्मिक मर्म बता रहे हैं,प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित अशोक शर्मा

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Navratra Special: पुरुषात्मक प्रकृति में मातृ शक्ति की साधना के नवरात्र का ज्योतिषीय मर्म

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संभागीय ब्यूरो चीफ चंद्रकांत अग्रवाल की प्रस्तुति

ज्योतिष के आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस संसार में सब कुछ गणित से उत्पन्न हुआ है। दुर्गा सप्तशती में देवी ने कहा प्रकृति पुरुषात्मकं इसी संदर्भ में हिंदू संस्कृति पुरुष सूक्त में पहला श्लोक
सहस्त्र शीर्षा पुरुषाः सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात्” स भूमि, व्यू घूं सर्वत्र…..
इस श्लोक का भी गणितीय अर्थ है। यहां सहस्त्र शीर्ष से- आशय हजारों पड़ी, हजारों खड़ी रेखाओं से है। इस प्रकार श्शु भचक्र ३८० का होता है। अर्थ अर्थ वृत्त १८० का होता है। २७ नक्षत्र, होते हैं, ६ ग्रह होते हैं । १२ राशियां होती हैं, एक चर्तुयुगी का एक मनवंतर होता है। चार लाख ३२ हजार वर्ष का कलयुग है। १२ = १०८ होते हैं। ये १०८ संख्या भगवान की है। नौभाव होते हैं. नौरस भी है हैं, भक्तिनौप्रकार है। रत्न भीनौ है धान्य भी नवहैं, रंग नौभी हैं। ग्रहभीनौ र्हैं इस प्रकार समस्त ब्रम्हाण्ड नौ की संख्या से ओत-प्रोत है, इसी लिए ऋतुओं के संधि काल में नवरात्र मनाने की परंपरा ऋषियों ने बनाई। अब रात्रि ही क्यों? दिन क्यों नहीं? देवी ही क्यों ? देवता क्यों नहीं? इसके पीछे का विज्ञान प्रकृति पुरुषात्मक है के सिद्धांत से है। प्रकार की उर्जायें होती है। इन नौ प्रकार की ऊजाओं से भौतिक उर्जायें बनती है. जिससे जैविक एवं पदार्थों की रचन होती है। इसी का परिणाम ये भौतिक सृष्टि है। इसमें (लाज्मा, क्वार्क, एंटीकर्वाक, पार्टिकल, एंटीपार्टिकल, मॉलीक्यूल्स, मास. और कलाकाष्ठ ये जैविक सृ‌ष्टि के है आधार है।

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आयुर्वेद के अनुसार कोई भी वस्तु शून्य से परिपक्वता प्राप्त करने में नौ माह का ही समय लेती है। कोई भी- बीमारी का निर्मूलनौ माह की चिकित्सा में हो जाता है। अगर नहीं होता है तो वहरोग असाध्य है। रात्रिकाल में प्रत्येक वस्तु विकासात्मक दृष्टि से तीव्रता से विकास करती है। जैसे- रात्रि फूलो और फलो में वृद्धि होती है। इसी प्रकार रात्रि में साधनात्मक दृष्टि से चेतना मे गति आती है जिसे योग मार्ग में कुंडलिनी शक्ति कहा गया है। इसमें भी चक्र के नौ आयाम हैं। शरीर में नौ द्वार है। इन्हें रन्धृ कहा जाता है रन्ध्रों को पार करके ही अंशात्मक जीव दशम भाव अर्थात परमात्मा को प्राप्त करता है। इस प्रकार ये भी नौ के अंक प्रतीक है। यदि पूर्णांक में से पूर्णाक निकल जाए तो शून्य बचेगा इसी लिए शून्य से शुरू होकर रनौ के बाद १० आता में वास्तव में १०नहीं वो शून्य ही है। समस्त माएं संतान को जन्म देती है इसीलिए समस्त संसार में जीव मां के निकट अपने आप को पाता है और भी भी सर्वाधिक प्रेम संतान से ही करती। कहते है संसार में मां प्यार सभी प्यार सेबडा है मां प्रेमसभीसेनौ माहबड़ा यहोता है। इसी श्रद्धा के वात्सल्य स्वरूप का नाम मां है।

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इसीलिए देवी को उपासना का विधान है। नव दुर्गा के नौ रूप स्त्री के संपूर्ण जीवन का विधान बताते है। प्रतिपदा से नवमी तक नौ रात यानि नवरात्रि नाम सार्थक है। चूंकि यहां रात्रि गिनते हैं रूपक के द्वारा हमारे शरीर को मुख्य नौ द्वारों वाला कहा गया है इसके भीतर निवास करनेवाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा है। शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए इसमें पंचकर्मके माध्यम सेजैसे वमन विस्चन, स्वेदन इत्यादि का हर छा माह में सफाई अभियान चलाने के लिए और ऊर्जा के सही ढंग से संचरण के लिए शुद्धि आवश्यक है इसीलिए नवरात्र में साधना उपासना की जाती है। वैसे तो चार नवरात्रियां होती हैं उनमें से दो गुप्त माघ और आषाढ की और दो प्रमुख चैत्र और शारदीय जिसमें चैत्र की नवरात्रि भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक शुध्दि के लिए अधिक उत्तम मानी गई है। इसमें मुख्य इन्द्रियों, अनु- -शासन, स्कछता, शरीरसंयम को पूरे वर्ष सुचारू रूपसे। क्रियाशील रखने की दृष्टि से साधना उपासना अनुष्ठान किए जाते हैं। साथ ही ऋतु संधि रोने के कारण पर बीमारियों का प्रकोप होता है है उनसे लड़ने के लिए इस समय पर भी शारीरिक और मानसिक प्रक्रिया का नाम नवरात्रि है। उपवास एक ऐसा तरीका है, उपवास शब्द का अर्थ होता में उप-यानि-समीप और वास-यानि रहना – अपने इष्ट के समीप रहना इससे कोई भी इंसान अनंत- आनंद और उल्लास की प्राप्ति अपने ईष्ट के समीप रह प्राप्त करता है।
मार्कण्डेय पुराण के अन्तर्गत शक्ति तत्व के निरूपण की प्रतीकात्मक शैली में शक्ति की साधना करने की विधि का वर्णन है। अतः ये अंश दुर्गा सप्तशति के नाम से प्रसिदद्
है इसमें तीन मुख्य बातें जहां से प्रसंग शुरू होता है। है। मेधा ऋषि सुरथ नामक राजा और समाधि नामक वैश्य के मध्य के प्रसंग से यह आख्यान प्रतिपादित है। यह सब जीव के भीतरी स्थापित है। मेधा कुऋषि से तात्पर्य बरिद है। सुरथ राजा से तात्पर्य ज्ञान है और स‌माधी नामक वैश्यू से तात्पर्य प्रशांत अवस्था मनुष्य के से शक्ति का आविर्भाव होता है यही शक्ति सात प्रमुख दुर्गुण जिन्हें असुर प्रवृत्ति के स्वरूप से चिन्हित किया गया है। प्रथम असुर महिषासुर अर्थात महा इस असुर अर्थात स्वयं पूजित बताने वाला या एजने की इक्षा रखने वाला (२) धूम्रलोचन, क्रोध या बुध्दि के अंधकार को धूम लोचन कहते हैं 3 चंड-बुध्दि में उत्पन्न क्रोध कोचंड करतौ या असहिष्णु खंड-मन् -मन् की असंयमित या अराजक या नास्तिक अव अवस्था को मुंड कहते हैं। ५⑤ रक्तबीज – कामनाओंगे अनंत श्रृंखला ” को रक्तबीज कहते हैं (आसक्ति, मोह, ममत्व) ⑥ शुभ-अति हिंसक को शुभ कहते हैं। हिंसा में लिप्त को भी शुभ कहते है। निशुभ- दारुणः कर्कशा निर्दयी और भ्रन्ट ये निशुभ के पर्यायवाची शब्द है। अपने भीतर के इन सात आसुरी प्रवृत्तियों पर शासन करने वाली शक्ति का नाम ही दुर्गा इसीलिए दुर्गा, दुर्गति, तारिणी ऐसा कहा गया है। परीनव रात्रि का रह रहस्य है। विस्तार के लिए अनंत पृष्ठ भी कम पड़ जायें,ऐसा भगवती का अनंत वांग्मय कलेवा है। अतः इतने पर ही देवी को नमस्कार ।