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Online Shopping for Jadi Butia: जड़ी- बूटियों को बाजार मुहैया होगा, ऑनलाइन शापिंग को लेकर लघु वनोपज संघ कर रहा है मंथन

Online Shopping for Jadi Butia: जड़ी- बूटियों को बाजार मुहैया होगा, ऑनलाइन शापिंग को लेकर लघु वनोपज संघ कर रहा है मंथन

भोपाल। राजधानी में आयोजित पांच दिवसीय वन मेले में पांच दिन में 60 लाख रूपये से ज्यादा राज्य लघु वनोपज संघ ने व्यापार किया है। उसके बाद संघ ने सहकारी लघुवनोपज समितियों को एक बड़ा बाजार मुहैया कराने को लेकर तैयारी शुरू कर दिया है। जिससे प्रदेश की जड़ी- बूटियों को आॅनलाइन शापिंग के जरिए समितियां लोगों तक पहुंचाए। संघ से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि अगर वनोपज संघ आॅनलाइन शापिंग की दिशा में सफल होता है तो आने वाले समय में समितियां आर्थिक तौर पर पहले से ज्यादा मजबूत हो जाएगी। गौरतलब है कि निजी कंपनियां पहले से ही ई- मार्केटिग के क्षेत्र में अपना कब्जा जमा चुकी है। अगर सहकारी समितियां अपने उत्पादों को ई- मार्केटिंग के क्षेत्र में उतारती है तो निश्चित ही निजी कंपनियों का दबदबा आयुर्वेद के क्षेत्र में पहले से ज्यादा कमजोर साबित होगा।

गौरतलब है कि प्रदेश में 31 फीसदी भूमि वन से आच्छादित है। पंचमड़ी- और सतपुड़ा- विंध्याचल की पहाड़ियों पर 100 से ज्यादा दुर्लभ जड़ी- बूटियों का भंडार फैला हुआ है। नर्मदापुरम जिला स्थित सतपुड़ा- विंध्याचल की पहाड़ियों में 400 से ज्यादा वनस्पतियां पाई जाती हैं। इन पहाड़ियों में सिलेजिनेला- जिसे संजीवनी कहते है, सर्प जिह्वा, जंगली लहसुन, जंगली प्याज, मयूर शिखा सहित अन्य दुर्लभ जड़ी- बूटियों का भंडार फैला हुआ है। जिनका आयुर्वेद में बहुत ही ज्यादा महत्व बताया जाता है। सहकारी समितियों से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर हमारे उत्पादों को एक अच्छा प्लेटफार्म मिल जाता है तो प्रदेश का मान भी बढ़ेगा और लोगों को राहत भी मिलेगी।

वनोपज समितियों के मोबाइल नंबर किए जाएंगे जारी-

राज्य लघु वनोपज संघ के अधिकारी वनोपज समितियों के मोबाइल नंबर जारी करने की तैयारी कर रहे है। जिससे आम आदमी इन समितियों से जुड़े लोगों से आसानी से संपर्क कर सकें और इनके उत्पादों को लेकर चर्चा कर सकें। साथ ही संघ इनके औषधीय उत्पादों के गुण को आम जन तक पहुंचाने की दिशा में विचार कर रहा है। जिससे नई पीढ़ी आयुर्वेद को बेहतर से जान सकें। मेले के अलावा समितियोें के पास बड़े स्तर पर जुड़ने का कोई और दूसरा विकल्प नहीं है। यही वजह है कि राज्य लघु वनोपज संघ अब सहकारी समितियों को पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में विचार कर रहा है।