
राज-काज: कांग्रेस में ‘आपरेशन लोटस’ से बचने की बेचैनी….
दिनेश निगम ‘त्यागी’
कांग्रेस में ‘आपरेशन लोटस’ से बचने की बेचैनी….

– प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के सामने ‘आपरेशन लोटस’ को लेकर फिर बेचैनी है। वजह है राज्यसभा की एक सीट, जो विधायकों की संख्या के आधार पर कांग्रेस को मिल सकती है लेकिन इसे खोने का डर सता रहा है। यह सीट वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का कार्यकाल पूरा हाेने पर खाली हो रही है। वे कह चुके हैं कि इस बार वे दावेदार नहीं होंगे। चुनाव तीन राज्यसभा सीटों के लिए होंगे, इनमें से दो पर भाजपा की जीत तय है। एक सीट जीतने के लिए 58 वोटों की जरूरत है। मुकेश मल्होत्रा, राजेंद्र भारती और निर्मला सप्रे को छोड़ दें, तब भी कांग्रेस के 63 विधायक हैं। इस लिहाज से सीट मिलने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन खतरा भाजपा के ‘आपरेशन लोटस’ से है। इसके तहत कांग्रेस के 7 विधायक तोड़ने की कोशिश हो रही है। ऐसा हो गया तो सीट कांग्रेस के हाथ से खिसक जाएगी। इस पर रणनीति बनाने के लिए पिछले दिनों दिल्ली में पार्टी के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने वरिष्ठ नेताओं कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के साथ बैठक की। खतरा कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए नेताओं, विधायकों से ज्यादा है। खासकर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरािदत्य सिंधिया की मदद लेकर चंबल- ग्वालियर अंचल के विधायक तोड़े जा सकते हैं। इसलिए कांग्रेस अपने एक-एक विधायक की गतिविधियों और मेल मुलाकातों पर नजर रख रही है।
* मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा तक टला फेरबदल….*

– लगभग ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद निगम-मंडलों, आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियां हुईं तो उम्मीद की जा रही थी कि अब मंत्रिमंडल में बहुप्रतीक्षित फेरबदल भी हो जाएगा, लेकिन यह फिर टलता दिख रहा है। विभागों की समीक्षा के बहाने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव मंत्रिमंडल सदस्यों की परफारमेंस का आंकलन करना चाहते हैं। हालांकि उनके और पार्टी नेतृत्व की नजर में पहले से परफारमेंस में पिछड़े मंत्रियों के चेहरे हैं, फिर भी सभी को सुधरने का एक और मौका दिया गया था। मुख्यमंत्री की समीक्षा के बाद नए सिरे से परफारमेंस रिपोर्ट तैयार होगी। इसके आधार पर ही मंत्रियों को हटाने, उनका कद घटाने- बढ़ाने और नए लोगों को शामिल करने का निर्णय लिया जाएगा। लिहाजा, अब मंत्रिमंडल में फेरबदल का काम समीक्षा बैठकों के बाद ही हाेने की संभावना है। आश्वासन मिलने के बावजूद लोकसभा चुनाव से ही कुछ विधायक मंत्री पद की शपथ लेने का इंतजार कर रहे हैं। इनमें छिंदवाड़ा के कमलेश शाह जैसे विधायक शामिल हैं। शाह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ के खास थे। भाजपा इन्हें लोकसभा चुनाव के दौरान तोड़ कर पार्टी में लाई थी। वे विधानसभा का उप चुनाव कब का जीत चुके हैं लेकिन अब तक मंत्री नहीं बन सके। अन्य कई वरिष्ठ विधायक भी अपनी ताजपोशी का इंतजार कर रहे हैं।
*बंगाल विजय के सूत्रधार को कैसे भूल गया नेतृत्व….?*

– इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि एक समय पश्चिम बंगाल में भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नाक में दम किया था। टीएमसी के गुंडों का मुकाबला कर भाजपा कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी की थी। संघर्ष में सैकड़ों को अपना जीवन होम करना पड़ा था। कैलाश बताते हैं कि खुद उनके खिलाफ फर्जी 38 गंभीर किस्म के आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए। साफ है कि बंग भूमि में भाजपा की विजय की आधारशिला कैलाश विजयवर्गीय ने रखी। उनकी रणनीति की बदौलत टीएमसी के कई बड़े नेता पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए। नतीजा यह हुआ कि विधानसभा की 3 सीटें जीतने से शुरू हुआ भाजपा का सिलसिला 76 से हाेते हुए 200 के पार तक पहुंच गया। पश्चिम बंगाल में भगवा लहरा गया और भाजपा की सरकार ने शपथ ले ली। पर ताज्जुब वाली बात यह है कि बंगभूमि विजय के असली हीरो कैलाश को भाजपा नेतृत्व भूल गया। उनके परिश्रम की कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही। खबर यहां तक है कि ऐतिहासिक पल सरकार के शपथ ग्रहण में भी उन्हें नहीं बुलाया गया। बड़ा सवाल है कि भाजपा नेतृत्व बंगाल विजय के इस सूत्रधार को भूल गया या उन्हें श्रेय न मिल जाए इसलिए जानबूझ कर भुला दिया गया?
* यह बोल कर निर्मला ने पटकी अपने पैर में कुल्हाड़ी….*

– मौजूदा राजनीतिक माहौल में नैतिक चरित्र की बात करना बेमानी है लेकिन इसके पतन की पराकाष्ठा तक पहुंच रही हैं बीना से विधायक निर्मला सप्रे। दलबदल कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त करने का मामला हाईकोर्ट और विधानसभा स्पीकर के यहां लंबित है। लोकसभा चुनाव के दौरान मंच में मुख्यमंत्री के समक्ष भाजपा ज्वाइन करने का ऐलान करने वाली निर्मला ने हाईकोर्ट में कहा कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ी ही नहीं। इसे लेकर बहस चल रही है, इसी बीच उन्होंने अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने वाला बयान दे डाला। हर कोई कह रहा है कि कोई विधायक सरेआम ऐसी सौदेबाजी वाला बयान कैसे दे सकती हैं? उनके खिलाफ अपील दायर करने वाले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का नाम लेकर उन्होंने कहा कि यदि वे बीना को जिला बना दें और जिले के विकास के लिए 300 करोड़ रुपए दे दें तो वे कांग्रेस ज्वाइन कर लेंगी। यह अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा इसलिए है क्यों कि बयान देकर उन्होंने खुद स्वीकार कर लिया कि वे कांग्रेस में नहीं हैं। निर्मला ने यह भी कहा कि जो पार्टी बीना को जिला बनाएगी, मैं उसके साथ रहूंगी। दरअसल, जब से वे कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुईं तब से ही वे उप चुनाव में हार से डरी हुई हैं। वे भाजपा में चली तो गईं लेकिन इसे स्वीकार नहीं कर रहीं। बीना को जिला न बना कर भाजपा ने भी उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।
* राहुल ने दिखाया अपनी ही पार्टी नेताओं को आईना….*

– पिछले हफ्ते कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने मजाकिया लहजे में ही सही लेकिन प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा किया था। इस हफ्ते एक अन्य वरिष्ठ नेता अजय सिंह राहुल ने अपनी ही पार्टी को आईना दिखा कर नसीहत दे डाली। उन्होंने गुटबाजी को कांग्रेस के लिए नासूर बताया और कहा कि इसके लिए हम सब जवाबदार हैं। पार्टी की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हम खुद से जुड़े किसी को कार्यकर्ता नहीं रहने देते, उनके अंदर महत्वाकांक्षा जगा कर नेता बना देते हैं। हमारे चेले बने रहें, इसलिए सभी से कहते हैं कि क्षेत्र में आपकी पकड़ सबसे मजबूत है। तैयारी करो, हम टिकट दिलाएंगे। नतीजा यह होता है कि चुनाव आते तक दावेदारों की भरमार हो जाती है। एक को टिकट मिलता है और जिसे नहीं मिलता, वह अपनी तलवार की धार तेज करना शुरू कर देते हैं। यहीं से पार्टी की हार की इबारत लिख जाती है। इसलिए किसी के अंदर महत्वाकांक्षा जाग्रत नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पार्टी की दूसरी समस्या यह है कि एक नेता से जुड़े कार्यकर्ता ही आपस में झगड़ते हैं लेकिन ईमानदारी से उनका मनमुटाव दूर करने की कोशिश नहीं की जाती। जबकि इसे दूर करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए वर्ना यह दीमक की तरह कांग्रेस और नेता दोनों को खोखला कर देता है। इस नसीहत पर कौन ध्यान देता है, यह भविष्य बताएगा।
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