
Ram Mandir Tirath Kshetra Trust: अहंकार और लापरवाही की पराकाष्ठा!
सिर्फ चंपत राय नहीं, पूर्व IAS नृपेंद्र मिश्रा सहित राम मंदिर से जुड़े सारे मठाधीश बाहर होने चाहिए !
वेद माथुर
जिस पावन राम मंदिर के निर्माण ने संपूर्ण हिंदू समाज को वैश्विक गौरव की अनुभूति कराई थी, आज वह पवित्र स्थान चंदे और वित्तीय प्रबंधन में कथित अनियमितताओं के आरोपों से घिर गया है।
मेरा यह स्पष्ट और दृढ़ मत है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रमुख सदस्यों को अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे देना चाहिए। शुचिता और मर्यादा सिर्फ उपदेशों में नहीं, बल्कि आचरण में दिखाई देनी चाहिए। सिर्फ चंपत राय का इस्तीफा पर्याप्त नहीं है।
चंपत राय पर व्यक्तिगत रूप से वित्तीय हेराफेरी का आरोप लगाना भले ही अभी जल्दबाजी हो—और संभव है कि व्यक्तिगत जीवन में उनका कोई भौतिक लालच न हो—परंतु कभी-कभी सार्वजनिक जीवन में अपनी ‘अच्छाई’ और ‘बलिदान’ का अहंकार व्यक्ति को अंधा कर देता है। यही आत्ममुग्धता अंततः पूरे संगठन और समाज को ले डूबती है।
बड़ा सवाल:
चंपत राय के ड्राइवर तिल्लू (टिन्नू) यादव की भूमिका पर लगातार गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आख़िर एक ड्राइवर इतना शक्तिशाली कैसे हो गया कि वह ट्रस्ट के किसी अधिशासी अधिकारी (Executive Officer) की तरह व्यवहार करने लगा? इस संस्थागत ढिलाई का जवाब चंपत राय को देना ही होगा।
संदेह के घेरे में अन्य ट्रस्टी और प्रशासनिक विफलता:
ट्रस्ट के अन्य प्रमुख सदस्यों—अनिल मिश्रा और गोपाल राव—पर भी प्रशासनिक शिथिलता की सुई घूम रही है। जब करोड़ों राम भक्तों की अटूट आस्था और उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा दांव पर हो, तब ऐसी लापरवाही अक्षम्य हो जाती है।
एक भव्य और वैश्विक स्तर के मंदिर में चढ़ावे, चंदे की गिनती, उसके परिवहन और ऑडिट (Audit) की एक बेहद सरल और पारदर्शी एसओपी (SOP – Standard Operating Procedure) होनी चाहिए थी, जिसे कोई भी सामान्य पढ़ा-लिखा व्यक्ति लागू कर सकता था। लेकिन तकनीकी युग में भी ऐसी बुनियादी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई?
क्या यह केवल लापरवाही थी?
क्या यह प्रशासनिक अहंकार था?
या फिर इसके पीछे कोई गहरा संस्थागत संशय है?
राजनीतिक विरोधियों को मिला संजीवनी का अवसर
अतीत में जिन ताकतों ने राम मंदिर आंदोलन का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विरोध किया—चाहे वह मुलायम सिंह यादव का दौर हो, अरविंद केजरीवाल का “नानी के बयान” वाला रुख हो, या अखिलेश यादव की ढुलमुल राजनीति हो—आज इन अक्षम और अहंकारी ट्रस्टियों की वजह से उन सभी को राम मंदिर पर उंगली उठाने का सुनहरा अवसर मिल गया है।
राम मंदिर किसी एक व्यक्ति, नेता या ट्रस्टी के पुरुषार्थ से नहीं बना
यह समझना बेहद जरूरी है कि राम मंदिर किसी एक व्यक्ति, नेता या ट्रस्टी के पुरुषार्थ से नहीं बना है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था, सदियों के आत्मोत्सर्ग, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय और RSS-VHP जैसे संगठनों के लंबे और अनवरत संघर्ष का परिणाम है। राम भक्तों ने समर्पण राशि संगठन की साख को देखकर दी थी, किसी पदाधिकारी के व्यक्तिगत अहंकार को पोषित करने के लिए नहीं। इसलिए “मंदिर मैंने बनवाया” का भ्रम किसी को भी नहीं पालना चाहिए।
अयोध्या बार एसोसिएशन का सराहनीय और कड़ा कदम
इस पूरे प्रकरण में अयोध्या बार एसोसिएशन ने एक अत्यंत सराहनीय और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। उन्होंने कथित चंदा चोरी के आरोपियों की पैरवी न करने का संकल्प लिया है, साथ ही चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव को अयोध्या छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है।
यदि इन पदाधिकारियों में तनिक भी लोक-लाज और सनातन मूल्यों के प्रति निष्ठा बची है, तो उन्हें स्वयं ही इन पदों से दूर हो जाना चाहिए।
अब आगे क्या? ट्रस्ट का पुनर्गठन हो–
भले ही कानूनी रूप से आरोप सिद्ध होना अभी बाकी है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर हुई घोर लापरवाही और अहंकार ने संपूर्ण हिंदू समाज को आहत किया है। राम मंदिर के वैचारिक विरोधियों को जो बोलने का मौका मिला है, वह एक बड़ा रणनीतिक और नैतिक नुकसान है।
अब समय आ गया है कि:
ट्रस्ट का पुनर्गठन हो: इस पूरे ट्रस्ट को पेशेवर और आधुनिक विजन के साथ पुनर्गठित किया जाए।
पेशेवर प्रबंधन: संस्था में कॉर्पोरेट और पेशेवर योग्यता वाले सीईओ (CEO) और वित्तीय विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाए।
पूर्ण पारदर्शिता: दान की पाई-पाई का लाइव और पारदर्शी विवरण (Digital Tracking) जनता के सामने हो।
जय श्री राम! लेकिन अब इस परम पवित्र नाम की आड़ में अहंकार, अक्षमता और लापरवाही का तंत्र बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राम भक्तों का सीधा सवाल है—हे ट्रस्टियों, रामकाज की मर्यादा को और कितना गिराओगे?





