
•••पहले काव्य संग्रह ‘सुनो, तुमने शांति को देखा है’ के लोकार्पण पर रमण रावल की साफगोई
मैंने जो लिखा है वह कविता है
भी या नहीं मैं खुद नहीं जानता
कीर्ति राणा की विशेष रिपोर्ट
🔺कीर्ति राणा इंदौर। महर्षि वाल्मिकी को आदि कवि माना जाता है। बहेलिये का शिकार हुए क्रोंच पक्षी की घायल अवस्था देख कर इतने व्यथित हुए कि उनके मुंह से संस्कृत भाषा में जो पंक्तियां निकली उसे पहली कविता माना गया। उन्हें कहा पता था कि जो आह निकली है वो पहली कविता मानी जाएगी।
अमूमन पहली किताब लिखने वाला लोकार्पण के वक्त मंच पर पोमाता (फूले नहीं समाता) है। लेकिन पत्रकार-कवि रमण रावल तो जाने किस मिट्टी के बने हैं यह श्रोताओं को भी तब अहसास हो गया जब उन्होंने अपना आत्मकथ्य पढ़ कर सुनाते हुए बिना किसी लागलपेट के सार्वजनिक रूप से स्वीकारा कि मेरी लिखी कविताएं वाकई कविता है भी या नहीं मैं खुद नहीं जानता। पर मुझे पता है आप सब मुझ से रिश्तों की गर्मी के चलते आए हैं इसलिये इन अतुकांत कविताओं की तारीफ के पुल बांध सकते हैं। बीते 46 वर्षों में पत्रकारिता करते हुए जब मन पड़ा कविता लिखी हैं, कब लिखी-सब पर तारीख दर्ज करता रहा । आप तय करें कविता है या अकविता। कवि ना होने के कारण ही पुस्तक आकार देने में 44 साल लग गए। मैं बस इतना कह सकता हूं कि पत्रकारिता में भी मूल आधार लेखन ही है, तो साहित्य की किसी भी विधा का भी मूल तो लेखन ही है। मैंने भी पत्रकारिता से हट कर अपने मनोभावों को शब्दांकित करने का प्रयास किया है, जिसे कविता का नाम दिया है… तो मैं खुद पर ठठाकर हंसने को तैयार हूं, और आप को भी यह अवसर दे रहा हूं।

अपनी जिन कविताओं को रावल कविता नहीं मान रहे थे उस किताब के मुख पृष्ठ से लेकर कविताओं की जब साहित्यकार डॉ गरिमा दुबे ने डिटेल एमआरआई रिपोर्ट सार्वजनिक की तो कवि के चेहरे पर ‘सब ठीक है वाले’ संतुष्टि के भाव झलक रहे थे । शीर्षक से बात शुरु करते हुए गरिमा दुबे ने कहा हम सब हैं तो शांति की तलाश में लेकिन अशांति के बीच रह रहे हैं। सच को सच की तरह कहने का सलीका उनमें इसलिये है कि वो पहले पत्रकार हैं। पुस्तक में समय के ऐसे ही अनेक प्रश्न हैं। चवालीस साल की यात्रा में बदलते समय के अनुसार प्रश्न हैं। अपने समय का प्रखर दस्तावेज है उनका यह पहला काव्य संग्रह।
कानपुर निवासी अरुण कुमार मिश्र सर्वांग इस किताब के शीर्षक का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कह रहे थे उस शांति की तो अनादिकाल से आज तक सभी को तलाश है। लेखक की पत्नी रेखा के गुरुभाई मिश्र चूंकि ज्योतिष और वास्तुशास्त्री हैं, मानसरोवर की तीन यात्राएं कर चुके हैं तो सनातन धर्म को लेकर उनका वक्तव्य उनके ज्ञान की पुष्टि करने वाला था। उनका कहना था सनातन धर्म जो सदचित्त आनंद, सर्वत्र है वही सनातन है। वेदों मे षड़दर्शन है। सनातन था, है और रहेगा। आधुनिक विज्ञान आज जो सूर्य परिक्रमा की गणना काल बताता है, वह हमारा अध्यात्म पहले ही बता चुका है। यह ढोंग-ढकोसला नहीं है। दुनिया के मतमतांतर सब की व्याख्या वेदों-पुराणों में मिल जाएगी। सनातन धर्म में सूक्ष्म गणना, सोलर सिस्टम का जो पूरा आधार है।सदियों पूर्व उदघाटित सारे सत्य को आज विज्ञान स्वीकार रहा है।
प्रख्यात कवि-आलोचक डॉ आनंद कुमार सिंह ने रमण रावल की यह झिझक भी दूर कर दी कि उन्होंने जो लिखा है वो कविताएं हैं भी या नहीं।डॉ सिंह का कहना था कविताएं सहज हैं, सरल हैं, संवेदना और संभावनाओं से भरी हुई हैं। सौंदर्य कभी कभी ताजमहल की अपेक्षा छप्पर में भी दिखाई देता है। महाकाव्य रचे गए, नामी कवि हुए हैं लेकिन अभिव्यक्ति का दरवाजा हर कंकर के लिए शंकर बनने का निमंत्रण देता है। कवि में प्रतिभा होना चाहिए, लोकशास्त्र का ज्ञान, लेखक हैं तो अक्षर ज्ञान होना चाहिए-यह सब आप में है । कवि में प्रतिभा है, वह यात्रा में है, आंखे खुली है तो दृश्य देख सकेगा। जो कोई नहीं सुनता वह कवि सुनता है।
जिस कार्यक्रम के मंच पर डॉ विकास दवे भी वक्ता हों तो उसे स्वयं ही ऊंचाइया मिल जाती हैं ।साहित्य अकादमी निदेशक डॉ दवे का कहना था रमणजी को परिभाषित करना चुनौती है। क्या क्या नहीं करते हैं। आनंद की प्राप्ति ही रमण रावल है। मेरा यहां आना वैसा ही है जैसे पिता अपनी बेटी की बारात छोड़कर पड़ोसी की बारात में नाचने चले जाए। इस किताब का शीर्षक ही अदभुत है। जब जब शांति की चर्चा होती है भारत विश्वपटल में शीर्ष पर नजर आता है। इस शीर्षक में हास्य है।मुझे तो लगता है भाभीजी ने घर की तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त कर उन्हें कविताएं लिखने के लिए छोड़ दिया होगा। इस शीर्षक का दार्शनिक पक्ष भी है।रमण जी के आत्म कथन में भारत का मन दिखाई देता है। पत्रकार में संवेदना है तो यही संवेदना आप को कवि भी बनाती है। छंद विधा का पालन करते हुए इन दिनों कचरा भी खूब लिखा जा रहा है। जिस साहित्यकार ने खुद की आलोचना करना सीख ली, उसे किसी अन्य की समालोचना की आवश्यकता नहीं है। संचालन कर रहे संस्कृतिकर्मी संजय पटेल का कहना था यह बड़ी बात है कि महानगरीय संस्कृति में काम करते रहने के बावजूद उनका जनपदीय मन ग्रामीण परिवेश में रमता है।
हमेशा की तरह रमण रावल मंच की अपेक्षा दर्शक पंक्ति में बैठे थे। दीप जलाने की रस्म रेखा रावल और किताब के डिजाइनर जीतू दुबे ने सम्पन्न की। मंच पर ख्यात चित्रकार सफदर शामी (मुंबई) भी थे, वो तो कुछ नहीं बोले लेकिन उनके बनाए मुख पृष्ठ को लेकर बाकी सभी वक्ता बोले। काव्य संग्रह के लोकार्पण समारोह के अतिथियों का स्वागत करने के साथ ही श्याम सलोनी और उत्सव शर्मा ने स्मृति चिह्न भेंट किये।





