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उन्होंने दलितों की समस्या को उठाया और उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था सुधारने, अपराध कम करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का श्रेय हासिल किया। उनके शासन में यूपी की जीडीपी करीब 15% से ज्यादा बढ़ी और अपराध दर भी कुछ कम हुई। 2007 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी को स्पष्ट बहुमत मिला, जिससे मायावती यूपी की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। उस दौरान उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस समय राजनीतिक विशेषज्ञ उन्हें बेहद प्रभावी और सक्षम बताने लगे थे।
इन वजहों से शिखर पर थीं मायावती
2007 विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। यूपी की राजनीति में यह पहली बार था, जब एक दलित नेता ने जातीय समीकरणों को जोड़कर, खासकर ‘बहुजन-तथागत (दलित-ब्राह्मण) समीकरण’ के दम पर सत्ता पाई। यही दौर था जब मायावती को यूपी की ‘आयरन लेडी’ कहा जाने लगा। उनकी मजबूती के पीछे कई वजहें रहीं।
– सोशल इंजीनियरिंग- दलितों को ब्राह्मणों, पिछड़ों और मुसलमानों से जोड़ने का प्रयोग।
– करिश्माई नेतृत्व- मायावती को ‘दलितों की बेटी’ के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान।
– केंद्रीय राजनीति में पकड़- 2008–09 तक पीएम पद के संभावित चेहरे के रूप में उनका नाम चर्चाओं में।
– बड़ी वोट बैंक – 2009 लोकसभा चुनाव में बसपा ने 21 सीटें जीतीं और करीब 6% वोट शेयर हासिल किया।
ऐसे शुरू हुआ मायावती का पतन
यूपी में 2007 का विधानसभा चुनाव मायावती के लिए स्वर्णकाल रहा, लेकिन 2012 विधानसभा चुनाव में बसपा 80 सीटों तक सिमट गई। जबकि, समाजवादी पार्टी को बहुमत मिल गया। वहीं 2014 लोकसभा चुनाव तो बसपा के लिए बहुत ही बुरा साबित हुआ, जबकि नरेंद्र मोदी की लहर में बसपा का खाता तक नहीं खुला। फिर आया साल 2017. यूपी में विधानसभा चुनाव हुए और एक बार फिर मोदी लहर में बीजेपी ने कमाल कर दिखाया। वहीं, बसपा को महज 19 सीटों से संतोष करना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने अखिलेश के साथ हाथ मिलाया, लेकिन सपा-बसपा की जोड़ी भी बहुत कमाल नहीं कर पाई और बसपा केवल 10 सीटें जीत पाई।