श्री रामलला प्रतिष्ठा 2026: भारत राष्ट्र का सांस्कृतिक पुनरुद्धार और वैश्विक चेतना का शाश्वत उदय मंगल दिवस

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श्री रामलला प्रतिष्ठा 2026: भारत राष्ट्र का सांस्कृतिक पुनरुद्धार और वैश्विक चेतना का शाश्वत उदय मंगल दिवस

​डॉ तेज प्रकाश व्यास की विशेष रिपोर्ट

​इतिहास के पन्नों में कुछ तिथियाँ ऐसी अंकित हो जाती हैं, जो समय की सीमाओं को लांघकर अमरत्व प्राप्त कर लेती हैं। 22 जनवरी 2026, गुरुवार का दिन भारत के लिए वैसा ही एक स्वर्णिम क्षण है। आज जब हम अयोध्या धाम में प्रभु श्री रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की तीसरी वर्षगाँठ मना रहे हैं, तो यह केवल एक मंदिर के उत्सव तक सीमित नहीं है। यह उत्सव है—भारत के आत्म-सम्मान का, पाँच शताब्दियों के अटूट धैर्य का और सत्य की उस चिरंतन विजय का, जिसे काल का प्रवाह भी धुंधला न कर सका।

​अयोध्या की सरयू लहरों से लेकर हिमालय की चोटियों तक, आज एक ही गुंजायमान स्वर है—’राम’। यह नाम केवल एक आराध्य का नहीं, बल्कि भारतीय जीवन पद्धति के उस अनुशासन का है जिसे ‘मर्यादा’ कहा गया है।

​रामलला: ईश्वरीय मासूमियत और दार्शनिक आधार

​जब हम ‘रामलला’ शब्द का उच्चारण करते हैं, तो मानस पटल पर एक ऐसे शिशु की छवि उभरती है जिसके नेत्रों में ब्रह्मांड की करुणा और मुस्कान में सृष्टि का सृजन छिपा है। हिंदू धर्मदर्शन में भगवान राम को विष्णु का अवतार माना गया है, जो धर्म की रक्षा हेतु धरा पर आए। किंतु ‘रामलला’—अर्थात प्रभु का बाल स्वरूप—भक्तों के लिए वात्सल्य और भक्ति का उच्चतम शिखर है।

​गोस्वामी तुलसीदास से लेकर ऋषि काकभुशुंडि तक, सभी ने राम के इस रूप में उस परब्रह्म को देखा है जो प्रेम के वश में होकर बालक बन गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी, ‘बाल स्वरूप’ पवित्रता और असीम संभावनाओं का प्रतीक है। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक स्रोत कठोरता में नहीं, बल्कि उस कोमल सत्य में है जो सबको साथ लेकर चलता है। रामलला की प्रतिमा में निहित वह मासूमियत ही है जो कठोर से कठोर हृदय को भी भक्ति के रस में डुबो देती है।

​संघर्ष से सिद्धि तक: 500 वर्षों की गाथा:
​राम मंदिर का इतिहास भारत के सामूहिक संघर्ष की गाथा है। 16वीं शताब्दी में विदेशी आक्रांताओं द्वारा श्री राम जन्मभूमि पर हुए आघात ने केवल एक संरचना को नहीं तोड़ा था, बल्कि एक राष्ट्र की पहचान पर प्रहार किया था। किंतु, सनातनी समाज ने हार नहीं मानी। पीढ़ी दर पीढ़ी, युद्धों से लेकर न्यायालय की चौखटों तक, यह संघर्ष निरंतर चलता रहा।
​2019 के ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय और उसके बाद 2024 में हुई प्राण-प्रतिष्ठा ने सिद्ध कर दिया कि सत्य को दबाया जा सकता है, लेकिन पराजित नहीं। राम मंदिर का पुनरुद्धार आधुनिक विश्व के इतिहास में सांस्कृतिक न्याय का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह उन लाखों गुमनाम बलिदानियों को एक श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपनी आँखों में राम मंदिर का सपना संजोए इस धरा से विदा ली।

​22 जनवरी 2026: ज्योतिषीय और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम
​वर्ष 2026 की यह वर्षगाँठ ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार अत्यंत शुभकारी है। पौष शुक्ल द्वादशी, विक्रम संवत 2082 के दिन जब सूर्य उत्तरायण में विद्यमान हैं, तब ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने चरम पर होती है।
​अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 12:29 से 12:30 बजे): यह वह क्षण है जब आकाश मंडल में सभी नकारात्मक प्रभाव शांत हो जाते हैं और सात्विक ऊर्जा का प्रवाह तीव्र होता है। एक वैज्ञानिक और विचारक के रूप में, मेरा मानना है कि ऐसे मुहूर्त केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि खगोलीय संरेखण (Celestial Alignment) का परिणाम हैं जो मानव मस्तिष्क और शरीर की ऊर्जा को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। इस एक मिनट की प्रार्थना का फल अनंत है, क्योंकि यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना को एक सूत्र में पिरोता है।

​आध्यात्मिक एवं ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ का दर्शन:
​रामलला की इस पावन खुशी का असली रहस्य ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ (सबके हित और सबके सुख) के भाव में निहित है। सनातन धर्म कभी भी एकाकी सुख की बात नहीं करता। अयोध्या में रामलला का विराजमान होना यह संदेश देता है कि जब धर्म की सत्ता स्थापित होती है, तो उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है।
​आध्यात्मिक रूप से, ‘राम’ शब्द ‘रमु क्रीड़ायाम्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है—वह तत्व जो कण-कण में रमण करता है। इसलिए, रामलला की प्रतिष्ठा केवल एक मूर्ति की स्थापना नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर सोई हुई दिव्य चेतना का जागरण है। जब हम ‘सर्वजन हिताय’ की बात करते हैं, तो राम का चरित्र हमारे सामने एक ऐसे राजा के रूप में आता है जिन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक ऊंच-नीच को मिटाया और केवट को गले लगाकर प्रेम की पराकाष्ठा सिद्ध की। आज 2026 में, हमें उसी सामाजिक समरसता की आवश्यकता है जहाँ कोई भी पीछे न छूटे।

​वसुधैव कुटुंबकम: वैश्विक परिवार का सूत्रपात:
​आज का भारत विश्व को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है) का संदेश दे रहा है। रामलला का मंदिर केवल भारत का नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व का आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। प्रभु राम के जीवन मूल्य सार्वभौमिक हैं। सत्य, त्याग, करुणा और न्याय—ये ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें भाषा और भूगोल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
​2026 का यह उत्सव विश्व को यह याद दिलाने के लिए है कि मानवता का कल्याण संघर्ष में नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में है। जिस प्रकार अयोध्या में विभिन्न संस्कृतियों और पृष्ठभूमि के लोग एकजुट हो रहे हैं, वह सिद्ध करता है कि प्रभु राम का नाम पूरी दुनिया को एक सूत्र में पिरोने की क्षमता रखता है। यह एक ‘ग्लोबल विलेज’ की परिकल्पना को आध्यात्मिक आधार प्रदान करता है।

​राम-राज्य: एक आधुनिक वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण:
​अक्सर ‘राम-राज्य’ की बात की जाती है। राम-राज्य का अर्थ किसी विशेष धर्म का आधिपत्य नहीं, बल्कि एक ऐसी शासन व्यवस्था है जहाँ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को भी न्याय मिले। ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज्य नहिं काहुहि व्यापा’—अर्थात जहाँ कोई भी शारीरिक, दैवीय या भौतिक कष्ट न हो।
​आज के युग में, राम-राज्य का अर्थ है—सुशासन (Good Governance), सामाजिक समरसता और विज्ञान एवं आध्यात्म का संतुलन। जब हम रामलला की प्रतिष्ठा का उत्सव मनाते हैं, तो हम वास्तव में एक ऐसे समाज का संकल्प लेते हैं जहाँ नैतिकता ही कानून हो और करुणा ही विकास का आधार हो। अयोध्या आज एक ‘स्मार्ट सिटी’ के रूप में उभर रही है, जो आधुनिक तकनीक और प्राचीन परंपरा के सफल मिलन का वैश्विक मॉडल है।

​दीपावली जैसा उल्लास: घर-घर अयोध्या, मन-मन राम:
​इस दिवस को ‘आधुनिक दीपावली’ कहा जाना सर्वथा उचित है। जैसे भगवान राम के वनवास से लौटने पर त्रेतायुग में दीप जलाए गए थे, वैसे ही रामलला के अपने भव्य प्रासाद में विराजने पर आज का भारत आलोकित है।
​इस दिन का उत्सव केवल मंदिर सजाने तक सीमित न रहे। मेरा आह्वान है कि:
​ज्ञान का दीप: हम शिक्षा और अज्ञानता के विरुद्ध संकल्प लें।
​सेवा का संकल्प: ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ के भाव से दरिद्र नारायण की सहायता करें।

​पारिवारिक मूल्यों का पुनरुद्धार:
राम का जीवन हमें एक आदर्श पुत्र, भाई और पति होने की प्रेरणा देता है। आज के विघटित होते परिवारों के लिए राम का चरित्र ही एकमात्र समाधान है।

​वैज्ञानिक चेतना और सनातन का भविष्य:

​एक एंटी-एजिंग वैज्ञानिक के रूप में, मैं जीवन की निरंतरता और पुनरुद्धार की शक्ति में विश्वास करता हूँ। जिस प्रकार कोशिकाएं स्वयं को नवीनीकृत करती हैं, वैसे ही 22 जनवरी को भारत ने अपनी सांस्कृतिक कोशिकाओं का नवीनीकरण किया है। यह ‘सांस्कृतिक एंटी-एजिंग’ का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। पुरानी स्मृतियों के घाव भर चुके हैं और राष्ट्र एक नई, युवा और ऊर्जावान चेतना के साथ खड़ा है।

​वैश्विक पटल पर भारत का बढ़ता कद
​रामलला की प्रतिष्ठा ने वैश्विक स्तर पर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को सुदृढ़ किया है। विश्व के कोने-कोने से लोग आज अयोध्या आ रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि अध्यात्म भारत का वह निर्यात है जिसकी पूरी दुनिया को तलाश है। राम मंदिर केवल हिंदुओं का नहीं, बल्कि उन सभी का है जो शांति, न्याय और सत्य में विश्वास रखते हैं। यह मंदिर आने वाली सदियों तक मानवता को यह संदेश देता रहेगा कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः विजय ‘धर्म’ की ही होती है।

​संदेश:
भविष्य की राह
​22 जनवरी 2026 की यह दोपहर हमें एक नए भारत के निर्माण की शपथ दिलाती है। एक ऐसा भारत जो अपनी जड़ों पर गर्व करता है और जिसकी नज़रें आसमान के तारों पर हैं। रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की यह तीसरी वर्षगाँठ हमारे राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का उत्सव है।
​आइए, हम सब मिलकर इस दिन को केवल कैलेंडर की एक तारीख न रहने दें, बल्कि इसे अपने जीवन के रूपांतरण का आधार बनाएं। जब हमारे कर्मों में मर्यादा होगी, तभी हमारे राष्ट्र में राम-राज्य होगा।

​अंतिम संदेश:
​राम हमारे पूर्वज हैं, हमारी संस्कृति हैं और हमारे अस्तित्व का आधार हैं। अयोध्या का यह वैभव चिरस्थायी रहे और रामलला की कृपा संपूर्ण विश्व पर बनी रहे।
​जय श्री राम! जय हिंद!
​समापन स्वरचित मंत्र (मौलिक रचना)

मर्यादा पुरुषोत्तमो विजयते, सत्यस्य संस्थापनम्,
विश्वं बंधुत्व भावनेन सहसा, रामेण संशोभितम्।
सर्वेषामपि मंगलं भवतु वै, शान्तिः सदा वर्धते,
अयोध्याधिपतिः स रक्षकतु नः, धर्मो हि सर्वोपरिः॥

​(अर्थ: मर्यादा पुरुषोत्तम की जय हो, जिन्होंने सत्य की स्थापना की; भगवान राम के कारण विश्व बंधुत्व की भावना सुशोभित हो। सभी का मंगल हो, शांति निरंतर बढ़ती रहे; अयोध्या के स्वामी हमारी रक्षा करें, क्योंकि धर्म ही सर्वोपरि है।)