विनाश पर विजय का प्रतीक सोमनाथ मंदिर

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विनाश पर विजय का प्रतीक सोमनाथ मंदिर

संजीव शर्मा की खास रिपोर्ट

सनातन संस्कृति का जयघोष करती अरब सागर की लहरें, हवा में ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों के बीच आस्था का सैलाब लेकर आराधना में जुटे हजारों श्रद्धालु, डमरूओं की मधुर ध्वनि के साथ ‘ओम नमः शिवाय’ के जाप से सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर पूरा परिसर, महादेव के स्वर्ण कलश की आभा को सौ गुना बढ़ाती
दिलकश साज सज्जा एवं इन सभी के बीच खड़ा एक ऐसा अनूठा, दिव्य,भव्य और प्रतिष्ठित मंदिर… जो समय की हर चुनौती को गरिमा के साथ पार करता आ रहा है।

हम बात कर रहे हैं देवों के देव महादेव के सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की और यहां आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर न सिर्फ भारतीय सांस्कृतिक विरासत में अहम धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि विनाश और पुनर्निर्माण की, आस्था और संघर्ष की एक जीवंत कहानी है । सोमनाथ मंदिर की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे सीधे पौराणिक काल से जुड़ी हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक चंद्रमा ने खुद इस मंदिर की स्थापना की थी, ताकि शिव की कृपा पाकर श्राप से मुक्ति पा सकें। यह क्षेत्र आस्था के लिहाज से इतना अहम है कि भगवान कृष्ण ने भी यहीं से लीला समाप्त कर स्वर्गारोहण किया था ।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में कहा गया है कि, ‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च, श्री शैले मल्लिकार्जुनम्, उज्जयिन्यां महाकालम् ॐ कारम अमलेश्वरम्।’ अर्थात् जब भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों का वर्णन होता है, तब सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। यह भारत की संस्कृति में सोमनाथ के अग्रिम स्थान तथा उसके अविनाशी, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है।

सोमनाथ मंदिर की अपार संपदा, श्रद्धालुओं की इस मंदिर पर आस्था, अरब सागर के किनारे देश के रक्षा द्वार के रूप में इसकी सशक्त मौजूदगी और सनातन की मजबूत पहचान विदेशी आक्रमणकारियों की आंखों में हमेशा गड़ती रही । वे बार बार हमले कर भारतीय संस्कृति को नेस्तानाबूद करने का दुष्प्रयास करते रहे । सबसे पहले 1026 में आज से एक हजार साल पहले अफगानिस्तान महमूद गजनवी ने लूट-पाट के लिए मंदिर पर बर्बर हमला किया और लाखों करोड़ों का सोना, चांदी, हीरे जवाहरात लूट लिए। यह एक ऐसा वर्ष था जो इतिहास की किताबों में काले अक्षरों से दर्ज है एवं इसी ने मौजूदा स्वाभिमान पर्व की नींव रखी। लेकिन गजनवी का वहशीपन न सोमनाथ मंदिर का कुछ बिगाड़ पाया और न ही भारतीय समाज की आस्था को डिगा पाया। मात्र कुछ दशकों में, गुजरात के राजा भीमदेव सोलंकी ने इसे फिर से वैभवशाली स्वरूप प्रदान कर दिया ।

मंदिर में फिर लूट का सिलसिला चल पड़ा। करीब दर्जन भर से ज्यादा बार मंदिर पर हमले हुए। कभी अलाउद्दीन खिलजी, दिल्ली सल्तनत के प्रतिनिधि जफर खान, गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा, कभी औरंगजेब, तो कभी कोई हमले करते रहे, मंदिर की संपदा लूटते रहे और भारत की सनातन परंपरा को रौंदने का कुत्सित प्रयास करते रहे। लेकिन हर बार स्थानीय राजाओं और आम लोगों ने तन मन धन से मंदिर का पुनर्निर्माण कर यहां की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखा। 815 ईस्वी में प्रतिहार सम्राट नागभट्ट द्वितीय ने, 1026-42 में चालुक्य राजवंश के भीमदेव सोलंकी ने, 1169 में राजा कुमारपाल ने, 1308 में सौराष्ट्र के राजा महिपाल प्रथम तो 1783 में अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर के निर्माण में बढ़ चढ़कर भूमिका निभाई। फिर 1951 में सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से सोमनाथ मंदिर को वर्तमान स्वरूप मिला। खास बात यह है कि मौजूदा स्वरूप के भी अब 75 वर्ष पूरे हो गए हैं।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि उन दिनों लुटेरों की तलवारें जितनी घृणा से चमकतीं, भक्तों की प्रार्थनाएँ और मजबूत हो जातीं। सोमनाथ मंदिर की गौरवशाली विरासत इस बात का प्रतीक है कि सच्ची शक्ति सोने-चांदी में नहीं, बल्कि लोगों की एकता में है। यही कारण है कि जनवरी 2026 में 1000 साल पहले के उस हमले को याद करते हुए ‘ सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया गया। यह एक ऐसा उत्सव है जो हार नहीं, बल्कि पुनरुत्थान की,आत्मसम्मान बनाए रखने और हमलावरों के सामने डटकर खड़े रहने की कहानी सुनाता है।

गुजरात में 8 जनवरी से 11 जनवरी (बाद में बढ़ाकर 15 जनवरी) तक आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान दिनभर मंदिर परिसर हर हर महादेव के जयघोष से गूंजता रहा तो शाम को तीन हजार ड्रोन ने आकाश में शिवलिंग, त्रिशूल, भगवान शिव का तांडव, वीर हमीरजी गोहिल की छवि, अहिल्याबाई होलकर का सम्मान और सरदार पटेल की पुनर्निर्माण पहल जैसी स्वर्णिम विरासत से आसमान को रंग दिया । वहीं, शानदार आतिशबाजी ने समुद्र तट को रंग-बिरंगी रोशनी से भरने के साथ साथ आम लोगों को यह विश्वास दिलाया कि सोमनाथ की आभा को कोई कम नहीं कर सकता । 11 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं ‘शौर्य यात्रा’ का नेतृत्व किया। 108 घोड़ों के साथ निकली यह शोभायात्रा वीर हमीरजी गोहिल और वेगड़ाजी भील जैसे उन अनगिनत वीरों को समर्पित थी, जिन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया था । बाद में, प्रधानमंत्री ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह पर्व विनाश का नहीं, बल्कि हजार वर्षों की उस यात्रा का है जहां सोमनाथ बार-बार उठ खड़ा हुआ। गजनवी चला गया, लेकिन सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ विकास और विरासत का आदर्श उदाहरण है। आज का सोमनाथ सिर्फ मंदिर नहीं, एक संपूर्ण तीर्थक्षेत्र है।

शिखर पर 1,666 स्वर्ण कलशों तथा 14,200 ध्वजाओं के साथ सोमनाथ मंदिर तीन पीढ़ियों की अडिग श्रद्धा, दृढ़ता तथा कलात्मकता के प्रतिबिंब के रूप में खड़ा है। हर वर्ष लाखों लोग इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं। वर्ष 2020 से 2024 तक वार्षिक अनुमानित 97 लाख श्रद्धालु सोमनाथ के दर्शन के लिए आए हैं। पिछले 2 वर्ष में श्रद्धालुओं की संख्या 13.77 लाख दर्ज हुई थी, जिसमें पिछले साल महाशिवरात्रि के दौरान ही 3.56 लाख श्रद्धालु आए थे। इतना ही नहीं, गूगल पर भारतीयों द्वारा सर्वाधिक सर्च किए गए शीर्षस्थ 10 स्थानों में सोमनाथ शामिल है।

सोमनाथ मंदिर की यात्रा हमें सिखाती है कि विनाश कितना भी बड़ा हो, पुनर्निर्माण की शक्ति उससे कहीं अधिक है। यह भारत की आत्मा का दर्पण है – जहाँ विरासत जीवित रहती है और विकास नई ऊंचाइयों को छूता है। अगर आप कभी गुजरात जाएं, तो इस मंदिर के द्वार पर खड़े होकर महसूस कीजिए उस अमर ऊर्जा को क्योंकि सोमनाथ सिर्फ एक जगह नहीं, एक भावना है – स्वाभिमान की, आस्था की।

(लेखक सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान वहां मौजूद थे।)