
रविवारीय गपशप : तत्कालीन परिवहन मंत्री हिम्मत कोठारी से जुड़े कुछ रोचक किस्से
आनंद शर्मा
जीवन में अपने कामकाज के चलते अधिकारियों से तो हमारी मुलाक़ात होती ही रहती है , पर राजनीति के कई दिग्गजों के साथ काम करने पर पता लगता है कि उनकी शख़्सियत भी बड़ी दिलचस्प होती हैं ।
साल 2004 की शुरुआत में मेरी पदस्थापना सीईओ जिला पंचायत रतलाम के पद पर हो गई , बलिहारी थी राजीव दुबे की जो मेरे बैचमेट थे और उमा भारती जी की नई नई बनी सरकार में जीएडी और सीएम ऑफिस में डिप्टी सेक्रेटरी थे । रतलाम में सबसे बड़ा आकर्षण था , जनक जैन का जो मेरे अभिन्न मित्र थे और जिले में अपर कलेक्टर हुआ करते थे ।
एक दिन जेके के दफ्तर में मैं लंच टाइम में यूँ ही बैठा था कि तभी वहाँ श्री हिम्मत कोठरी जी आ गए , जो रतलाम नगर से विधायक थे। वे जेके से नगर निगम की किसी शिकायत के बारे में पूछताछ करने लगे जो उनके द्वारा कलेक्टर को की गई थी । जेके ने मेरी ओर इशारा करके कहा कि ये नए सीईओ आए हैं और कलेक्टर साहब ने इन्हें ही शिकायत जाँच के लिए दी है । मुझे संयोग से शिकायत के विवरण याद थे , और दो दिन पहले ही मैंने रिकॉर्ड तलब किया था । मैंने उनसे कहा कि रिकॉर्ड आ जाने दें , मैं जाँच कर रिपोर्ट दे दूँगा पर जाने क्यों उनको लगा कि मैं टालमटोली कर रहा हूँ , सो वे नाराज हो कहने लगे कि रिकॉर्ड की क्या जरूरत , वो तो मैंने शिकायत के साथ दिया ही है । मैंने उनसे कहा बिना मूल रिकॉर्ड देखे शिकायत में संलग्न रिकार्ड के आधार पर रिपोर्ट देना माकूल न होगा । बात करते करते वे थोड़ा उग्र हुए , तो मैंने कहा आप संतुष्ट न हों तो कलेक्टर से कह किसी और से जाँच करा लें पर मैं तो अपने ढंग से ही काम करूँगा । जेके ने , जो उन्हें पहले से जानते थे , समझाया कि जाँच निष्पक्ष होगी , आप चिंता न करो तब वे ठंडे पड़े और बात आई गई हो गई।
बाद में मैं ग्वालियर में परिवहन विभाग में उपायुक्त प्रशासन होकर चला गया , और उसके कुछ बरस बाद हिम्मत कोठारी जी परिवहन विभाग के मंत्री बन गये । जिस दिन मैं अपने आयुक्त त्रिपाठी जी के साथ उनसे औपचारिक मुलाकात के लिए भोपाल जा रहा था , उसी दिन जेके का मोबाइल पर फोन आया और उसने मेरे मज़े लिए कि देख उस दिन मेरे चेम्बर में जिनसे बहस कर रहा था , वही तेरे मंत्री बन गए हैं , अब अपना बोरिया बिस्तर बाँध ले । मुझे दिल में कुछ धुकधुकी तो थी , पर पहली मुलाक़ात में मुझे लगा नहीं कि उन्हें उस विषय में कुछ याद भी है । जल्द ही प्रशासकीय कार्य से अपने आयुक्त त्रिपाठी जी के साथ अनेक बैठकों में मेरा उनके समक्ष जाना होने लगा । हिम्मत कोठारी जी की प्रमुख सचिव मलय रॉय और आयुक्त परिवहन एनके त्रिपाठी दोनों से ही अच्छी पटती थी , क्योंकि दोनों ही ईमानदार और कुशल अधिकारी थे ।
कोठारी जी परिवहन के साथ गृह और वन विभाग के भी मंत्री थे । ईमानदारी और बेबाकी की उनकी अनूठी छवि के कारण उनका अलग ही रुतबा था । विधान सभा सत्र के दौरान प्रश्नों की ब्रीफिंग के लिए विभाग की ओर से अक्सर आयुक्त श्री एनके त्रिपाठी साहब के साथ मैं जाता था । चूँकि वे और विभागों के भी मंत्री थे , तो सभी विभागों की ब्रीफिंग एक साथ आगे पीछे ही रहा करती थी ।
एक बार ऐसे ही अवसर पर वन विभाग के अफसर ब्रीफिंग के लिए मंत्री जी के चेम्बर में थे , और हम जेके के कमरे में , जो तब उनके ओएसडी हो चुके थे , बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे , तभी त्रिपाठी साहब ने मुझसे कहा “जरा देखो वन विभाग की ब्रीफिंग समाप्त हुई या नहीं “? मैं बाहर निकल कर मंत्री जी के चेम्बर के समक्ष पहुँचा तो वन विभाग के अधिकारी बाहर ही मिल गए , मैंने ये जानने के लिए कि मंत्री जी से पूछ लूँ कि हम आ जाएँ या नहीं , उनके चेम्बर का दरवाजा खोला तो देखा , वे एक नेता नुमा सज्जन को झाड़ पिला रहे थे कि बिना सोचे समझे ग़लत काम लेकर मेरे पास मत आया करो । उनकी डाँट वो सर झुका कर सुन रहा था । मुझे लगा कोई छुटभैया कार्यकर्ता होगा जो इस तरह मंत्री जी की डाँट खा रहा है , तभी उनकी नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने आने का इशारा किया । मैं भाग कर त्रिपाठी साहब के पास गया और हम ब्रीफिंग के लिए मंत्री जी के चेम्बर में पहुँच गए । दूसरे दिन प्रश्न पर चर्चा थी और परंपरा अनुरूप हम विधानसभा की अधिकारी दीर्घा में उपस्थित थे , तभी मेरी नज़र सामने पड़ी और मैंने देखा कल मंत्री जी की डाँट खा रहे सज्जन विधान सभा के अंदर गले में गमछा डाले घूम रहे थे ।





