रैंबो’ यानि मेजर सुधीर कुमार वालिया और मजरूह सुल्तानपुरी को याद करते हैं आज…

32

रैंबो’ यानि मेजर सुधीर कुमार वालिया और मजरूह सुल्तानपुरी को याद करते हैं आज…

कौशल किशोर चतुर्वेदी
9 वर्ष की सैन्य सेवा में 15 मेडल प्राप्त करने की उपलब्धि सेना में भी शायद गिने चुने सैन्य। अफसरों को ही हासिल होती है। और केवल 30 साल की उम्र में राष्ट्र के लिए बलिदान देकर सर्वोच्च सैन्य सम्मान का हकदार बनना भी गिने-चुने सैन्य अफसरों के हिस्से में आता है। हम आज बात कर रहे हैं भारतीय सेना में ‘रैंबो’ नाम से मशहूर मेजर सुधीर कुमार वालिया की। जिन्हें युद्ध के मैदान से दूर असाधारण वीरता या बलिदान के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च शांतिकालीन सम्मान अशोक चक्र से नवाजा गया था। आज मेज़र वालिया को याद करने की वजह बस इतनी सी है कि 24 मई को उनका जन्मदिन है।
मेजर सुधीर कुमार वालिया (जन्म- 24 मई, 1969; मृत्यु- 29 अगस्त, 1999) भारतीय थल सेना के जांबाजों में से एक थे। तत्कालीन सेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जनरल वी. पी. मलिक के ओडीसी रहते विशेष अनुमति प्राप्त करके कारगिल युद्ध के दौरान 29 अगस्त, 1999 को सुधीर कुमार वालिया ने जम्मू-कश्मीर में कुपवाड़ा जिले के हमुडा के जंगलों में हमला कर कुल 20 में से 9 आतंकवादियों को मार गिराने के बाद वीरगति पाई थी। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले मेजर सुधीर कुमार वालिया को मरणोपरांत 2000 में ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया था। उन्होंने दा जाट रेजिमेंट में कमीशन किया था। उन्हें विशेष पाठ्यक्रम के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका भी भेजा गया, जहां वे प्रथम रहे। सन 1994 में उन्हें ‘सेना पदक’ से भी सम्मानित किया गया था।
कारगिल युद्ध के बाद सेना को एक बड़ी जानकारी मिली थी कि कुपवाड़ा के अफरुदा के जंगलों में आतंकवादी किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में हैं। लिहाजा, मेजर सुधीर कुमार वालिया ने आतंकवादियों का सफाया करने के लिए सेना की टुकड़ी का नेतृत्व अपने हाथों में लिया था, लेकिन आतंकवादियों से आमने-सामने हुई लड़ाई के बीच मेजर सुधीर वालिया शहीद हो गए। शहीद होने से पहले उन्होंने 20 में से 9 उग्रवादियों को मार गिराया था। इस बीच में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अपनी टुकड़ी को उग्रवादियों को मार गिराने का आदेश देते रहे। उग्रवादियों को मार गिराने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वे अस्पताल पहुंचने से पहले ही अपना बलिदान दे गए। मरणोपरांत उन्हें उनकी बहादुरी पर ‘अशोक चक्र’ से नवाजा गया। मेजर सुधीर कुमार वालिया को इससे पहले भी दो बार सेना मेडल से नवाजा गया था।
कारगिल के युद्ध में अपना शौर्य दिखा चुके सुधीर कुमार वालिया को साथियों ने उनकी बहादुरी के लिए ‘रैंबो’ नाम दिया था। वह 29 अगस्त, 1999 को कुपवाड़ा के जंगलों में आंतकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए थे। 9 वर्ष की सैन्य सेवा में उन्होंने 15 मेडल प्राप्त किए थे। श्रीलंका में उन्हें शांति दूत के रूप में भी पुकारा जाता था। पेंटागन में 70 देशों के प्रतिनिधि गए थे, उसमें भारत की ओर से उन्होंने टॉप किया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है उन्होंने भारतीय सेना में दो बार लगातार सेना मैडल प्राप्त किया था, जो बहुत कम सैनिकों को मिलता है। ऐसे बहादुर सैन्य अफसरों पर देश का हर नागरिक गर्व करता है। दुनिया से विदा हुए उन्हें अब
26 साल हो चुके हैं। पर जब तक देश रहेगा, तब तक सुधीर कुमार वालिया का नाम हमारे दिलों में जिंदा रहेगा। और हर भारतीय नागरिक का दिल यही कहेगा कि हम सब तुम्हें बहुत प्यार करते हैं ‘रैंबो’ यानि मेजर सुधीर कुमार वालिया…।
आज ही के दिन दुनिया से विदा हुए मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की एक गजल के साथ, हम मेज़र सुधीर कुमार वालिया को याद कर सकते हैं। मजरूह सुल्तानपुरी (जन्म- 1 अक्टूबर, 1919, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 24 मई, 2000, मुम्बई) भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। इनका पूरा नाम ‘असरार उल हसन ख़ान’ था। इनके लिखे हुए कलाम में ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से रूबरू कराने की ज़बरदस्त क्षमता थी। मजरूह की कलम की स्याही नज्मों के रूप में एक ऐसी गाथा के रूप में चारों ओर फैली, जिसने उर्दू शायरी को महज मोहब्बत के सब्जबाग़ों से निकालकर दुनिया के दीगर स्याह सफ़ेद पहलुओं से भी जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने रूमानियत को भी नया रंग और ताजगी प्रदान करने की पूरी कोशिश की, जिसमें वह काफ़ी हद तक सफल भी हुए। मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशक से भी ज़्यादा अपने लंबे सिने कैरियर में क़रीब 300 फ़िल्मों के लिए लगभग 4000 गीतों की रचना की है। उन्हें 20वीं सदी के उर्दु साहित्य जगत के बेहतरीन शायरों में गिना जाता है। मजरूह सुल्तानपुरी के महत्त्वपूर्ण योगदान को देखते हुए वर्ष 1993
में उन्हें फ़िल्म जगत् के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार
‘ से नवाजा गया। इसके अलावा वर्ष 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘दोस्ती’ में अपने रचित गीत ‘चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ के लिए वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के ‘फ़िल्म फ़ेयर’ पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए।
मजरूह सुल्तानपुरी की ‘हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़साने बयां होंगे’, गजल को गायिका लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। इसके संगीतकार मदन मोहन थे। फिल्म बाघी (1953) थी। तो इस गीत के जरिए हम गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और मेजर सुधीर कुमार वालिया को याद करते हैं। गजल के शब्द आज दोनों महान हस्तियों को बयां कर रहे हैं।
हमारे बा’द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे,
बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे।
इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया,
मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे।
न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी,
हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे।
तो 24 मई की तारीख में मेजर सुधीर कुमार वालिया और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी दो बड़ी शख्सियत समाई हैं। और दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के सर्वोच्च हस्ताक्षर हैं। देश को दोनों पर ही गर्व है। ‘रैंबो’ यानि मेजर सुधीर कुमार वालिया और मजरूह सुल्तानपुरी को याद कर हम भी अपने आज को अच्छा बनाते हैं…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।