
रविवारीय गपशप: ऐसे जीता कलेक्टर 11 ने क्रिकेट मैच
आनंद शर्मा
प्रशासन या पुलिस की नौकरी में जिस तरह की परिस्थितियों से दिन भर जूझना पड़ता है , उसके चलते यदि अधिकारी को सुबह या शाम किसी खेल में पसीना बहाने का शौक है तो उसकी सारी जद्दोजहद खेल के मैदान में पसीने के साथ ही खत्म हो जाती है । खेल भावना आदमी को हार से उबरना और जीत को साझा करना भी सिखाती है , शायद इन्हीं कारणों से नौकरी की शुरुआत में ही ट्रेनिंग के लिए नियत अकादमियों में किसी न किसी खेल से अधिकारियों को जोड़ने का काम किया जाता है ।
मध्यप्रदेश में प्रशासन अकादमी में बरसों पहले जब हम भर्ती के साथ ट्रेनिंग के लिए भेजे गए तो खेल का पीरियड अलसुबह मुक़र्रर था और उसमें में किसी न किसी खेल में हिस्सा लेना अनिवार्य था । कुछ साथियों ने जिन्हें मैदानी खेलों में दिलचस्पी न थी , उन्होंने योग में ये सोच अपना नाम लिखा दिया कि इसमें तो सब बैठे बैठे हो जाएगा , पर जब नेती क्रिया की पेचीदगियों से पाला पड़ा तो ऐसे कई साथी योग छोड़ कर बैडमिंटन और टेबल टेनिस में आ गए ।
भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के बाद जब मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में में फेस 3 की ट्रेनिंग में जाना हुआ तो पता चला , वहां भी सुबह 6 बजे उठ कर खेल के मैदान में जाना जरूरी होता था , और जो गैरहाज़िर पाए जाते उन्हें इस लापरवाही के लिए कारण बताओ सूचना पत्र जारी हुआ करते । मुझे इन अनिवार्यताओं से कभी परेशानी इसलिए न हुई क्योंकि स्कूल के जमाने से ही मेरी खेल में दिलचस्पी रही थी ।
मुझे याद है जबलपुर के डिसिल्वा स्कूल में खेल का पीरियड सभी के लिए अनिवार्य था । मैं अपने स्कूल की फ़ुटबाल और हॉकी दोनों टीमों में था और इसके अलावा दौड़ने और लंबी कूद में भी स्कूल का प्रतिनिधित्व किया करता था , इन्ही सब कारणों से अपने स्कूल के गेम्स टीचर श्री गोम्स का हमेशा चहेता रहा करता । पर इस सब के बावजूद स्कूल में क्रिकेट नहीं खिलाया जाता था और तब भी क्रिकेट के प्रति जूनून कुछ अलग ही था । अजीत वाडेकर के हम दीवाने थे , सो दोस्तों के साथ मैंने तय किया कि हम अपने स्तर पर क्रिकेट खेलने की व्यवस्था करेंगे । जैसे तैसे जुगाड़ कर के चंदा किया और क्रिकेट का सामान लिया । टीम तो बन गयी पर कप्तान कौन बने इसका निर्णय करने के लिए ये तय हुआ कि जो सबसे ज्यादा रन बनाएगा वो कप्तान होगा , खेल चालू हुआ और आशा के विपरीत मैंने सबसे ज्याद रन बना लिए , बस फिर क्या था मैं कप्तान घोषित हो गया । मैं गर्व से अपना सीना फुला ही रहा था कि सभी दोस्तों ने मेरे सामने आकर क्रिकेट का किट रख दिया और बोले बस यार कप्तान अब हर शनिवार किट लाने ले जाने कि जबाबदारी तेरी । मुझे समझते देर न लगी कि किस कारण मैं सबसे ज्यादा स्कोर कर पाया था |
क्रिकेट का जुनून बाद में नौकरी में भी बना रहा । इसी सिलसिले में सीहोर का एक दिलचस्प क्रिकेट मैच मुझे आज भी याद है । मैं उन दिनों सीहोर में एसडीएम के पद पर नया नया पदस्थ हुआ था । जैसा कि मेरी हर पदस्थापना में रहता है , पढ़ने लिखने के शौक क़ी वजह से मेरी पत्रकारों से बढ़िया बनती थी । सीहोर क्लब में तब भी यशोवर्धन आजाद साहब के क्रिकेट के किस्से लोग याद किया करते थे जो सीहोर में एसपी हुआ करते थे । किस्सों से प्रेरित हो हमने भी पत्रकारों और अधिकारियों के बीच क्रिकेट मैच का आयोजन करने का सोचा । लोकेश और नरेश मेवाड़ा दोनों भाई क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी भी थे , बसंत दासवानी जैसे युवा भी थे जो खेल प्रेमी भी थे । तय हुआ कि अगला रविवार अधिकारियों और पत्रकारों के बीच क्रिकेट मैच खेल जायेगा ।
रविवार की सुबह कलेक्टर साहब समेत कलेक्टर इलेवन के अधिकारी सीहोर क्लब ग्राउंड पर पहुच गए । मैंने देखा पत्रकारों की टीम में ढेर सारे युवा थे , लेकिन कुछ प्रोफेशनल खिलाडी भी इनमें शामिल थे । मैंने कहा कि भाई ये क्या बात हुई , क्या मैच जीतने के लिहाज से टीम बनाई है ? इसमें जब तक सीनियर पत्रकार शामिल नहीं होंगे तब तक काहे की पत्रकार इलेवन ? सो कुछ जद्दो जहद के बाद रघुवर गोहिया , पुरुषोत्तम कुइया और रामनारायण ताम्रकार जैसे सीनियर पत्रकार भी टीम में शामिल किये गए । खेल शुरू हुआ और पत्रकारों ने अच्छे खासे रन बना लिए , अब बारी अधिकारियों की थी । हम लोगों की बेटिंग चालू हुई , थोड़ी देर बाद पत्रकार इलेवन की ओर से ताम्रकर जी को जो तब दैनिक भास्कर के सिटी चीफ थे , बॉलिंग करने का शौक हुआ और वे बॉल डालने के लिए तैयार हो गए । तब तक किसी को नहीं मालूम था कि वे क्रिकेट के बारे में केवल टीवी में मैच देखने तक कि वाक़फ़ियत रखते थे इसलिए जब उनकी बॉलिंग का दौर प्रारम्भ हुआ , पहली दो तीन बॉल तो फेकने के साथ ही नो बॉल करार दे दीं गयीं , क्योंकि वो अम्पायर को ये बिना बताये डाली गयीं थी कि वे ओवर दी विकेट या अंडर दी विकेट किस तरह बॉल डालेंगे ।
बहरहाल इस कन्फ्यूजन को दूर करने के बाद जो बॉल उन्होंने डालनी चालू कीं उनमे से एक भी विकेट के पहले यानि बल्लेबाज़ के आगे नहीं गिरी , कुछ तो विकेट कीपर के पीछे और कुछ मैदान में बैट्समैन से मीटरों दूर गिरीं । आखिरकार दस-बारह प्रयासों के बाद उन्हें रिटायर हर्ट ठहरा के पत्रकार इलेवन के कप्तान ने वापस बुलाया , पर तब तक मैच जीतने लायक स्कोर कलेक्टर इलेवन का हो चुका था । सो इस तरह ये कलेक्टर इलेवन ने ये मैच जीत लिया ।





