रविवारीय गपशप: बोर्ड परीक्षा में फर्स्ट डिवीजन आने पर ऐसे किया सेलिब्रेट 

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रविवारीय गपशप: बोर्ड परीक्षा में फर्स्ट डिवीजन आने पर ऐसे किया सेलिब्रेट 

आनंद शर्मा

परीक्षाओं का माह आ गया है और दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षायें आरंभ हो चुकी हैं । ये माना कि किसी भी विद्यार्थी के जीवन में इन दोनों परीक्षाएँ का एक अलग ही महत्व होता है , पर ये भी जीवन का एक पड़ाव ही है , सफ़र तो अभी बहुत आगे तक है । बचपन में मेरी हैंड राइटिंग बहुत बुरी थी , इसका कारण यह था कि मुझसे बड़ी तीन बहनें थीं और तीनों का मैं लाड़ला था , तो जो भी होमवर्क मिलता उसे मैं अपनी बहनों से करा लेता , नतीजा ये हुआ कि मेरी हैंड राइटिंग बिगड़ गई । मेरे अक्षर बड़े टेढ़े मेढ़े बना करते थे । मेरी सबसे बड़ी बहन की शादी के लिए मेरे बहनोई साहब उन्हें देखने आए और मैंने अनुभव किया कि उनकी हस्तलिपि बड़ी बढ़िया थी । मैंने उनसे पूछा कि मैं अपनी हैंड राइटिंग सुधारने के लिए क्या कर सकता हूँ , तो उन्होंने कहा अख़बार में जो ख़बरें छपती हैं , उनके हर्फ़ों पर तुम पेंसिल घुमा कर लिखने का अभ्यास किया करो । ये सीख बड़ी चमत्कारी सिद्ध हुई और साल भर में ही मेरी हस्तलिपि में इतना सुधार आ गया कि पाँचवीं कक्षा में मैं अपनी क्लास में सबसे अव्वल नंबरों से पास हुआ । रिजल्ट मिला तो मंडला के जगन्नाथ वरिष्ठ मूल विद्यालय से अपनी मार्कशीट लिए मैं पोस्टऑफिस दौड़ते हुए पहुँचा, जहाँ हम रहा करते थे । सबको मार्कशीट दिखाने के उत्साह में मैं घर के दरवाज़े पर ही उलझ कर गिर पड़ा , कपड़े तो धूल धूसरित हुए ही , मार्कशीट भी फट गई । अव्वल आने की ख़ुशी , डर में बदल गई कि अब बाबूजी को क्या कहेंगे ? बाबूजी तब मंडला के पोस्ट मास्टर हुआ करते थे और हमारे सरकारी मकान के पिछले हिस्से में सीपीडब्ल्यूडी के एक सब इंजीनियर साहब रहा करते थे । मैं डरते डरते उनके पास गया और अपनी परेशानी कही । उन्होंने गोंद से उसे वापस चिपकाया और बोले जाओ अब पिताजी को दिखा दो और घबराओ नहीं फटी हुई मार्कशीट में भी तुम्हारे अंक अव्वल ही रहेंगे ।

उस जमाने में मध्यप्रदेश में बोर्ड परीक्षा ग्यारहवीं कक्षा में हुआ करती थी । मैं जबलपुर में डिसिल्वा स्कूल में पढ़ा करता था , जिसके विद्यार्थियों का सेंटर मॉडल हाई स्कूल हुआ करता था , जो मेरे लिए तो बड़ा मुफीद था , क्योंकि पीएनटी कॉलोनी से यह इतना नजदीक था कि अपने घर से मैं पैदल ही परीक्षा देने चला जाता था । हमारी कक्षा के शिक्षक चतुर्वेदी जी ने प्रिपरेशन लीव के पहले हम सभी को जो समझाईश दी वो मैंने गाँठ बाँध ली । उन्होंने समझाया था कि परीक्षा के एक दिन पहले पढ़ना बंद कर देना , रात को आराम से सोना और सुबह उठ कर इत्मीनान से परीक्षा देने जाना । प्रश्न का उत्तर उतना ही लिखना , जितना आता हो , क्योंकि जाँचने वाला तुमसे ज़्यादा जानता है बल्कि उत्तर जितना संक्षिप्त कर सको करना , परीक्षक इससे प्रभावित होगा । ये सारी सीख मेरे स्वभाव को बहुत भायीं और सभी पर्चे बढ़िया गये । परीक्षा समाप्त होने के बाद हम सब जबलपुर से सिहोरा रोड रहने के लिये आ गए । उन दिनों परीक्षा के परिणाम अखबारों में छपा करते थे । अखबारों के दो तीन पन्ने परिणामों से भरे प्रकाशित हुआ करते थे । मेरे वही वाले बड़े बहनोई साहब टेलीफोन विभाग में ऑपरेटर थे , और अखबार वालों से उनकी जानपहचान ऐसी थी कि छपने वाले इन परिणामों के बारे में एक दिन पहले ही पता लग जाता था । जिस दिन परिणाम निकलना था उसके एक दिन पहले रात को पड़ोस की आयल मिल से चौकीदार आया कि जबलपुर से आपके लिए फ़ोन है । मैं इस अपेक्षित काल के लिए तैयार ही बैठा था , सो दौड़ कर गया , दूसरी ओर से जीजाजी की आवाज आई , “पास हो गए हो पर थर्ड डिवीजन आया है “। मुझे थोड़ी निराशा हुई , उम्मीद ज़्यादा थी , पर क्या कर सकते थे ? घर आकर सबको परिणाम बताया , तो सबने समझाया मन छोटा मत करो , पास तो हो गए , बोर्ड परीक्षाएँ बड़ी कठिन हुआ करती हैं । दूसरे दिन सुबह परिणाम निकलना था , मैं सुबह सुबह उठा और सायकल लेकर स्टेशन चल दिया , सबसे पहले अखबार वहीं आता था । रेलवे बुक स्टॉल से अखबार ख़रीदा और परिणाम तलाशा तो थर्ड डिवीजन वाले कालम में रोल नम्बर ही नहीं था । अब तो दिल डूबने लगा , मैंने हिम्मत बांधी और ऊपर से देखना शुरू किया तो पाया कि मेरा रोल नंबर तो फर्स्ट डिवीजन वाले कालम में था , यानी मैं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण था । मुझे सूझ न पड़ी कि अकेला मैं इस ख़ुशी को कैसे सेलिब्रेट करूँ । मैंने सायकल उठाई और स्टेशन के बाहर गुप्ता हलवाई की दुकान के सामने लगा दी , फिर इत्मीनान से होटल में बैठ कर गुलाब जामुन बुलवाया , मज़े से उसका भोग लगाया , इसके बाद घर आया , और सबको बताया कि मैं तो फर्स्ट डिवीजन पास हुआ हूँ

*बोर्ड परीक्षा में फर्स्ट डिवीजन आने पर ऐसे सेलिब्रेट किया!*