रविवारीय गपशप : ऐसे रद्द हुई अपर कलेक्टर की विभागीय जांच

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रविवारीय गपशप : ऐसे रद्द हुई अपर कलेक्टर की विभागीय जांच

आनंद शर्मा

नौकरी में जैसे जैसे आप ऊँचे पद पर पहुँचते जाते हो वैसे वैसे ही दण्ड देने की शक्ति में इजाफ़ा होता जाता है , पर ये अधिकार इस दायित्व के साथ मिलता है कि किसी बेगुनाह को अनावश्यक सज़ा न मिले । बात उन दिनों की है जब मैं उज्जैन में संभाग आयुक्त हुआ करता था । कुदरत के क़हर का कोरोना काल तब प्रारम्भ ही हुआ था और सरकारी दफ्तर औपचारिक तौर पर ही खुल रहे थे । ऑफिस में स्टाफ रोस्टर से आया करता था , यानी एक दिन छोड़ कर एक , पर कमिश्नर होने के नाते संभाग के सभी जिलों से समन्वय और प्रदेश शासन को रिपोर्ट देने के लिए मुझे तो दिन भर ऑफिस बैठना ही होता था । ऐसे ही एक दिन मुझे डाक में सामान्य प्रशासन विभाग का एक पत्र मिला जिसमें कहा गया था कि फ़लाँ संयुक्त कलेक्टर की विभागीय जाँच का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया है और उसके जाँच के लिए आरोप पत्र और आधार पत्र तैयार कर भेजे जाएँ । मैंने उस पत्र को स्थापना शाखा के लिए मार्क कर दिया । अगले सप्ताह कलेक्टर से आरोप पत्र प्राप्त करने की नोटशीट के साथ अनुमोदन के लिए जब नस्ती प्रस्तुत हुई तो उसमें उज्जैन के पूर्व कलेक्टर का हस्ताक्षर युक्त प्रस्ताव भी लगा था , जिसे मेरे पूर्व अधिकारी ने सामान्य प्रशासन विभाग को अग्रेषित किया हुआ था । चूँकि मामला एक राज्य प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी का था तो मैंने फ़ाइल अध्ययन के लिए रख ली । अध्ययन करने पर मुझे लगा कि ये मामला तो कुछ अजीब ही है , नस्ती में यह लिखा था कि ये अधिकारी पटवारी की विभागीय जाँच की फ़ाइल अपने साथ ले गए हैं इसलिए इनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जावे । इस बात के अगले ही दिन कटनी जिले के कलेक्टर श्री शशिभूषण सिंह का मेरे पास फोन आया । कटनी चूँकि मेरा गृह जिला था और शशि नौकरी में पहले भी दो बार मेरे साथ कम कर चुके थे , सो उन्होंने उसी अतिरिक्त स्नेह और अधिकार के साथ मुझसे कहा कि सर मेरे जिला पंचायत के सीईओ के विरुद्ध कोई जाँच प्रस्तावित की गई है जबकि वो बेक़सूर है , कृपया उसकी मदद करें । मैंने नाम पूछा तो यह वही अधिकारी था , जिसके आरोपपत्र और आधारपत्र सामान्य प्रशासन विभाग माँग रहा था । मैंने शशि से कहा कि भाई बिना किसी ठोस वजह से सामान्य प्रशासन के मंजूर प्रकरण में मैं क्या कर पाऊँगा पर आप इस अधिकारी को मेरे समक्ष उसके अभ्यावेदन सहित भेज दो । अगले सप्ताह सोमवार को जब मैं दफ्तर पहुँचा तो सीईओ जिला पंचायत कटनी मेरे समक्ष उपस्थित हुए । उन्होंने पूरी कहानी सुनाई कि उज्जैन जिले की जिस तहसील में वे एसडीएम थे वहाँ दो पटवारियों को अनुशासन हीनता के आरोप में उन्होंने निलंबित किया था , उनमें से एक पटवारी का ट्रांसफर जिले से जारी होने वाली पटवारियों की तबादला सूची में उस तहसील से किसी दूसरी तहसील में कर दिया गया था । जब निलंबित पटवारी का ट्रांसफर हो गया तो अखबारों में खबर निकली , कलेक्टर साहब नाराज हुए और उन्होंने ओआईसी भू अभिलेख को बुला कर डाँट लगाई तथा लापरवाही का कारण पूछा तो ओआईसी ने घबरा कर जिम्मेदारी एसडीएम पर लाद दी कि एसडीएम ने बताया ही नहीं था कि वह पटवारी निलंबित था इसलिए ट्रांसफर हो गया । फ़ाइल इस बात की चल पड़ी कि एसडीएम से स्पष्टीकरण लिया जाय । एसडीएम ने लिखा कि निलंबन आदेश की प्रति कलेक्टर को भेजी गई थी पर इसी बीच एसडीएम जो कि संयुक्त कलेक्टर थे , अपर कलेक्टर के पद पर पदोन्नत होकर कटनी पदस्थ हो गए और उन्होंने नए चार्ज में जॉइन कर लिया । अनुविभाग के नए अधिकारी ने लिख दिया कि दफ्तर में निलम्बन की फ़ाइल ही नहीं है और बाबूजी कह रहे हैं कि फ़ाइल तो एसडीएम साहब अपने साथ ले गए । सो अब इन पर विभागीय जाँच संस्थित करने की फ़ाइल चल पड़ी नतीजतन वे आरोपी बने मेरे सामने खड़े थे । मैंने पूरा प्रकरण देखा तो मुझे सीईओ ज़िला पंचायत की बात में दम लगा , आख़िर भला कोई निलंबन की फ़ाइल अपने साथ क्यों ले जाएगा ? यह भी समझ आया कि निचले स्तर पर कर्मचारियों ने बदमाशी कर इन्हें फँसाया है और ओआईसी भू अभिलेख ने अपनी जान बचाने इनके कंधों पर अपना बोझ डाल दिया है ।

मैंने सीईओ जिला पंचायत से उसका अभ्यावेदन लिया और कलेक्टर उज्जैन को भेजा कि वे तय करें कि क्या वाकई ये सबूत हैं कि विभागीय जांच की फ़ाइल एसडीएम ले गए ? क्या लिपिक के पास कोई पावती या दस्तावेज हैं जिसमें फ़ाइल ले जाने का जिक्र हो ? भू अभिलेख की नस्तियों को भी देखें कि क्या प्रस्तावित ट्रांसफर के पूर्व कर्मचारियों के सारे डिटेल्स जांचे गए थे ? इसके बाद अभ्यावेदन पर अपनी टीप देते हुए प्रस्ताव भेजें । एक सप्ताह में ही कहानी साफ़ होगयी , और अभ्यावेदन पर कलेक्टर का अभिमत मेरे पास आ गया । लेकिन असली परीक्षा अभी बाक़ी थी , और वो थी सामान्य प्रशासन के प्रस्ताव की । मैंने प्रमुख सचिव से बात की तो पहले तो वो झुँझलाईं , लेकिन जब मैंने उनसे अनुरोध किया कि वस्तुस्थिति नहीं देखी गई तो अन्याय हो जाएगा क्योंकि विभागीय जाँच में सिद्धांत ही ये है कि वो दीर्घ शास्ति के लिए की जाती है वरना लघुशास्ति के लिए तो केवल शो काज़ नोटिस ही पर्याप्त है तो उन्होंने कहा आप प्रस्ताव भेजो परीक्षण करा लेते हैं । ये सब होने के बाद सीईओ जिला पंचायत मेरे समक्ष हाथ जोड़ कर बोले मेरे लिए क्या आदेश है ? मैंने कहा कुछ नहीं , बस भविष्य में कभी ऐसा ही कोई निर्दोष तुम्हें मिले तो उसकी ऐसी ही मदद कर देना । शासन ने परीक्षण में पाया गया कि अधिकारी का दोष नहीं था और उनकी विभागीय जाँच रद्द कर दी गई । आज वो सीईओ जिला पंचायत , आईएएस अधिकारी बन चुके हैं ।