रविवारीय गपशप : जब परिवार पहुंचा तब मिली दाल-चावल-सब्जी-रोटी 

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रविवारीय गपशप : जब परिवार पहुंचा तब मिली दाल-चावल-सब्जी-रोटी 

आनंद शर्मा

पुरानी कहावत है कि आदमी के दिल में उतरने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है । कुछ लोग यह भी कहते हैं कि दिमाग़ी तंदुरुस्ती का राज भी सुस्वादु भोजन ही है । कोई भी बड़ा आयोजन हो जो सबसे जरूरी चीज़ होती है वो है खाना , शादियों से लौट कर आए मेहमानों से अक्सर पूछा जाता है , खाना कैसा था ? मुझे याद है चुनाव आयोग की बैठकों में जब भी कभी ऑब्जर्वर की हैसियत से दिल्ली जाना होता था , तो मैं कोशिश करता था कि विज्ञान भवन में आयोजित इस बैठक के पश्चात समूह भोज में शामिल न होऊँ , क्योंकि भोजन में कोई स्वाद न होता और भीड़ ऐसी होती कि इत्मीनान से भोजन करने का मौक़ा ही ना रहता । ट्रेनिंग में पहुँचे साथियों में से मैं अपने जैसा विचार रखने वाले मित्र छाँट लेता और हम सब मिल कर पंडारा रोड पर स्थित बेहतरीन रेस्टोरेंट्स में भोजन के लिए निकल जाते ।

भोजन के मामले में हम जैसे साधारण मानव ही जीभ के ग़ुलाम नहीं हैं , बल्कि बड़े बड़े महामानव भी इसके मोहपाश में गिरफ़्तार रहे हैं । कहते हैं आदि शंकराचार्य जब बनारस आये तो कुछ ही दिन में उत्तर भारतीय खाना खा कर इतने परेशान हो गए कि एक दिन सुबह गंगा स्नान के बाद काशी विश्वनाथ के दर्शन कर वे मंदिर के बाहर ही अनमने से बैठ कर सोचने लग गए कि अब तो बनारस छोड़ वापस चला जाये । तभी किसी ने उनके सामने खाने की ढँकी हुई पत्तल रख दी । उन्होंने आवरण हटाया तो देखा डोसा , इडली , बड़ा , उत्तपम , उपमा और न जाने क्या क्या दक्षिण भारतीय व्यंजन रखा हुआ है । एक क्षण तो वे खाद्य पदार्थ को निहारते ही रह गए और फिर तन्द्रा टूटी तो सामने देखा एक श्वेत धवल लाल किनारी वाली साड़ी में एक महिला वापस लौट कर चली जा रही है । देखते ही देखते वो सामने से विलीन हो गयी । शंकर ने इस प्रसाद को भरपेट खाया और उसके बाद ही उन्होंने अन्नपूर्ण श्त्रोत की रचना की ।

दक्षिण भारतीय भोजन यद्यपि मुझे भी पसंद है , और जब भी सरकारी काम से सुप्रीम कोर्ट जाना होता , लंच टाइम में मैं आंध्रा हाउस जाकर उनकी थाली खाना पसंद करता , पर कभी कभी खाना और रोज खाने में अन्तर है । भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति के बाद हमारी इंडक्शन ट्रेनिंग मैसूर में हुई । इस ट्रेनिंग में कुल मिला कर 54 अफसर थे , जिनमे से लगभग आधे उत्तर भारत से थे । ट्रेनिंग के पहले ही दिन नाश्ते में इडली बड़ा था , दोपहर-भोज में मसाला डोसा था और रात को खाने में फिर डोसा आ गया । मैनेजर से पूछा कि दिन में भी डोसा और रात में भी डोसा , एक जैसा ही खाना कैसे खायें ? केटरर ने मासूमियत से जबाब दिया सर दिन में तो मसाला डोसा था , ये रात वाला तो रवा डोसा है । मज़बूर होकर किसी तरह हम रोज़ रोज़ डोसा , इडली , बड़ा , उत्तपम , उपमा आदि खाने लगे । हर सप्ताह छुट्टियों में सब इकट्ठा होकर उत्तर भारतीय भोजन की तलाश में निकल जाते और किसी तरह क्षुधा तृप्त करते ।

ट्रेनिंग के आख़िरी सप्ताह में हमें इस बात की छूट मिली कि हम अपने परिवार को भी बुला सकते हैं । लगभग सभी साथियों ने इस अवसर का फ़ायदा उठाया और जब सुदूर घर से हमारी धर्मपत्नियाँ पधार गईं तो दूसरे दिन हम सब उन्हें लेकर सुबह सुबह मेस में पहुँचे और रसोइयों को बुला कर उनसे निवेदन किया कि आज का भोजन आप इन अन्नपूर्णिमाओं के निर्देशन में ही बनाना । वे मान गए और बड़े दिनों बाद ट्रेनिंग अकादमी की मेस में हम सबने सब्जी-रोटी और दाल चावल खाया ।