
मतदाता सूची से नाम हटने का दर्द: 4 महीने से मां को सहारा देकर SDM दफ्तर के चक्कर काट रहा इंदौर का नागरिक
वरिष्ठ पत्रकार के के झा की विशेष रिपोर्ट
इंदौर: लोकतंत्र में वोट का अधिकार सबसे बुनियादी हक माना जाता है, लेकिन इंदौर के एक नागरिक के लिए यही अधिकार पिछले चार महीनों से प्रशासनिक उपेक्षा और अफसरशाही की भूलभुलैया में फंसा हुआ है।
निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—SIR) अभियान के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद वह हर सप्ताह अनुविभागीय अधिकारी (SDM) कार्यालय के चक्कर लगाने को मजबूर है—वह भी अपनी बुज़ुर्ग और दृष्टिहीन मां को साथ लेकर।
प्रभावित नागरिक का कहना है कि उसने आधार कार्ड, राशन कार्ड समेत सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर और कई बार जमा किए, लेकिन आज तक उसका नाम मतदाता सूची में पुनः दर्ज नहीं किया गया। बार-बार दफ्तरों के चक्कर, कामकाज से छुट्टी, आर्थिक नुकसान और शारीरिक थकान अब उसके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।
इस पूरे मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह अपनी मां को सरकारी दफ्तरों में सहारा देते हुए प्रशासन के प्रति पीड़ा और नाराज़गी व्यक्त करता नजर आता है। यह दृश्य न सिर्फ एक व्यक्ति की व्यथा है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है जो नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने में असफल दिखाई दे रही है।
यह मामला मध्य प्रदेश में नवंबर–दिसंबर 2025 के दौरान चले राज्यव्यापी एसआईआर अभियान से जुड़ा है। निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए गए इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची से मृतकों, स्थानांतरित नागरिकों और दोहरे पंजीकरण को हटाना था। घर-घर जाकर सत्यापन के बाद दिसंबर 2025 के अंत में जारी प्रारूप मतदाता सूची में राज्यभर से 42.74 लाख से अधिक नाम हटाए गए।
इंदौर जिला इस आंकड़े में सबसे आगे रहा, जहां करीब 4.4 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए—जो जिले की कुल मतदाता संख्या का लगभग 15 प्रतिशत है। निर्वाचन विभाग के अनुसार इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से अन्यत्र निवास करने वाले और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत लोग शामिल हैं।
निर्वाचन आयोग ने इसे वर्ष 2003 के बाद का सबसे बड़ा मतदाता सत्यापन अभियान बताया है। प्रारूप सूची जारी होने के बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समय-सीमा 22 जनवरी 2026 तक तय की गई थी, जबकि अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन फरवरी 2026 में प्रस्तावित है।
हालांकि, इस प्रक्रिया ने खासकर शहरी इलाकों में गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्षी दल कांग्रेस ने मतदाता सूची संशोधन में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में उठाया है। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने भी इस तरह के व्यापक पुनरीक्षण की आवश्यकता पर सवाल उठाते हुए आगाह किया है कि इससे योग्य मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने का खतरा बढ़ सकता है।
चुनाव अधिकारियों का कहना है कि नाम हटने की स्थिति में मतदाता फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के माध्यम से आवेदन कर सकते थे, लेकिन दावे-आपत्तियों की समय-सीमा समाप्त होने के बाद ऐसे मामलों में केवल अपीलीय या उच्च प्रशासनिक हस्तक्षेप ही विकल्प बचता है।
इंदौर का यह मामला केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यापक संकट का प्रतीक बन गया है, जहां व्यवस्था की खामियां लोकतंत्र के सबसे मूल अधिकार—मतदान—पर सवाल खड़े कर रही हैं।





