
ध्यान की अपने आप में बहुत कठिन डगर है-वही जीवन का मूल सार है!
मनुष्य के जीवन का हर दिन नई-नई चुनौतियों, समस्याओं, और भाग-दौड़ से भरा रहता है, मन हर पल इन सब से गुजरता है और इन्ही में कभी उलझता तो कभी सुलझता है।इंसान शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दुनिया भर के प्रयास करता है; कभी जिम जाकर व्यायाम तो कभी योग और तो और भोजन भी संतुलित कर लेता है।
लेकिन कभी मन बीमार हो तो हम क्या करते हैं? अधिक से अधिक किसी मनोरोग विशेषज्ञ से सलाह लेंकर दवाई ले लेते हैं।ख़ुद के स्तर पर कभी ख़ुद से सवाल नहीं करते हैं, की मैं और क्या कर सकता हूँ, या मन के भीतर जा कर नहीं देखतें की ऐसा क्यों हो रहा हैं?कभी हम कुछ पल मौन रहकर आँखे बंद करके सोचें तो शायद जवाब भी मिले। पर ठहरना कौन चाहता है, हर किसी को जल्दी है ना जाने किस दौड़ का हिस्सा है।यह ठहराव ही दरअसल ज़िन्दगी की नई ऊर्जा है, संजीवनी है।
ठहराव में ध्यान-ध्यान का मौन मन के भीतर के कुहासे को भेदता हुआ एक नया अनुभव देता है जो जीवन को अपने आप बदल कर उजालों से भर देता है। ध्यान में आँखे बंद करके मौन होकर बैठना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है।
हम जो कुछ भी खुली आँखो से देखते हैं वो हमारे सामने भौतिक सुख संसार है, लेकिन जब हम बंद आँखो से मन के भीतर की यात्रा करते हैं, और उसमें जो कुछ महसूस होता, दिखाई देता, वही ध्यान हैं।
ध्यान का हर एक इंसान का अपना अलग-अलग अनुभव होता है, लेकिन मंज़िल सबकी एक ही है— शून्यता का भाव, समता का बोध।

ईश्वर किसी मंदिर, मज़्जित, शिवालय, या किसी गिरिजाघर में नहीं है, वो तो बस अपने ही अंदर भीतर है। आप जितनी सहजता से, निर्मलता से, मन के भीतर से पुकारोगे वो उतनी ही जल्दी से आपके सामने होंगे।
ध्यान की अपने आप में बहुत कठिन डगर है-
ध्यान की यह अंतर्यात्रा किसी राजपथ की तरह नहीं है, बल्कि मन के भीतर के भावों के बीच की छोटी से छोटी पगडण्डी से होकर गुज़रती है।और उसमें हम बहुत विचलित, हताश, परेशान होते हैं।
जब हम ध्यान में बैठतें हैं तो मन के अंदर लाखों-करोड़ों विचार और उनका शोरगुल सुनाई देता है, लगेगा जैसे चारों ओर करोड़ो मक्खियाँ भिनभिना रहीं हों। पर हम उनकीं उपेक्षा नहीं कर सकते हैं, क्योंकि ये विचार कभी किसी ना किसी समय पर हमारा वर्तमान रहें है । उन पलों को हमनें जिया है, जो हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा थे, वो अनुभूति चाहे सुखद हो या पीड़ादायक रही हो।
हमारे मन को उन्हीं के बीच से गुजरकर जाना होगा, जैसे जब हम कुंभ के मेले में गंगा स्नान करने जाते हैं, कैसे करोड़ो लोगों की भीड़ में से बचते हुए और अपनी जगह बनातें हुए गंगा के तट पर पहुँचते हैं। हम जब गंगा में डुबकी लगाते हैं उस समय हमें जो आनंद की अनुभूति होती है, लगता है जैसे हमनें हमारे सारे पापों को धो डाला है और जीते जी हमें मोक्ष मिल गया। हमारें भीतर एक संतुष्टि का भाव उत्पन्न हो जाता है।
ध्यान की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है, जब हम मन भीतर के उन विचारों से पार जाकर, राग और द्वेष से मुक्त होकर ध्यान के सागर में डुबकी लगाते हैं, तब समता का भाव, शून्यता का भाव, संतुष्टि का भाव आता है। और फिर उस भाव से जो आनंद की अनुभूति होती है, वही परम आनंद है, वही जीवन का मूल सार है, वही सत्य है।
नीलम सिंह सूर्यवंशी





