
‘विकसित भारत का संकल्प और युवा’:कितने ही टूलकिट बन जायें, भारतीय जेन जी टूल बनने से इंकार कर देती है !
सन 1966 में ‘नई उमर की नई फसल’ नाम से एक फिल्म आई थी। युवाओं के फ्रस्ट्रेशन पर थी। क्या थी वह हताशा।उसे नीरज के लिखे एक गीत में वहां यों बताया गया था:
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़ कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
ग़ुबार सड़क से ज्यादा मन में था। उसका निराकरण तो छोड़िये, उसके विरेचन के लिए सेफ्टी वॉल्व भी नहीं मिलता था। नैराश्य का वह युग अब संकल्प के युग में बदल गया है। कभी आप ध्यान से देखें तो वह नैराश्य का युग भारत के de-historicisation का युग भी था। भारत की जातीय स्मृति को खुरच खुरच कर मिटा देने का। भारत एक organized forgetting की ग़िरफ्त में था। एक ऐसा कुहासा गढ़ने का युग जिसमें आप बस दिशाहारा होकर भटको। उस देश के युवा विस्मृति में भटक रहे थे जिस देश में स्मृति ग्रंथों की एक सुदीर्घ परंपरा थी। गीता में सही कहा गया संमोहात् स्मृति विभ्रम:।
विकास के लिए जितनी स्मृति की आवश्यकता होती है, उतनी ही संकल्प की भी। प्रधानमंत्री जी कल सोमनाथ में थे वह स्मृति थी। आज यंग लीडर्स को वह संकल्प दिला रहे हैं।

आज का यह विषय अपनी बात उसी संकल्प से शुरू करता है।संकल्प जो मात्र विलपॉवर नहीं है, संकल्प जो सिर्फ डिटर्मिनेशन नहीं है बल्कि वह है जिसे अस्तित्ववादी दार्शनिक ज्याँ पॉल सार्त्र ऑथेंटिक च्वाइस का नाम देते हैं जो एक सचेत प्रतिबद्धता है कर्म के जरिए अर्थ स्चने की। अपने मन, विचार और ऊर्जा को उस प्रयोजन- सिद्धि के लिए संकेंद्रित और एकाग्र करने की। हर पूजा के लिए हमारे यहां संकल्प लेने का जो विधान है, उसमें दो चीजे हैं निष्ठा और पवित्रता। विकसित भारत का लक्ष्य अपने आप में पवित्र है और वह देश के युवाओं से अपने प्रति निष्ठा मांगता है, वे युवा जो सिर्फ एक डेमोग्राफिक रिज़र्व या रिसोर्स नहीं हैं बल्कि जो भारत के ट्रांसफार्मेशन के एक्टिव एजेंट हैं।
यह पूछा जा सकता है कि युवा ही क्यों? निश्चित रूप से भारत एक कलेक्टिव सेल्फ- रियलाइजेशन से ही विकसित होगा। वह एक ऐसा मंदिर है जिसमें हर नागरिक को अपनी प्रतिभा और परिश्रम की ईंट लगानी है। जब तक हमारी एक भी साँस बाकी है,हम ‘बिकमिंग’ ही हैं, हम फिनिश्ड प्रोडक्ट नहीं हैं, हम पूरे खरच और खलास नहीं हो गये हैं, इसलिए उम्र के किसी भी दौर और किसी भी अवस्था का व्यक्ति राष्ट्र निर्माण के इस यज्ञ में समिधा अर्पित कर सकता है ।पर हाँ आज साइंटिस्ट्स बताते हैं कि युवाओं को कुछ न्यूरोलॉजिकल एडवांटेज हैं जो उनकी रचनात्मकता को, उनकी टेक्नोलॉजिकल फ्लुएन्सी को, उनके नवाचार को, उनकी सिस्टम्स थिंकिंग को मदद करते हैं।

और एक युवा भारत से यह अपेक्षा नहीं बनेगी तो किससे बनेगी ? भारत की मीडियन एज अभी 28 वर्ष है, चीन की मीडियन एन 40 वर्ष है, अमेरिका की 38 वर्ष, जापान की 48 वर्ष, रूस की 40, जर्मनी की 47, फ्रांस की 43. यूरोपीय यूनियन की 43. विश्व के 60 देशों की मीडियन एज 40 वर्ष से ज्यादा है। और मैं कह सकता है कि भारत इस युवापन का, कि जिसमें इसकी 65% जनसंख्या 35 वर्ष से कम उम्र की है, सकारात्मक प्रयोग कर दिखा पाया है जबकि बांग्लादेश जिसकी मीडियन 26 वर्ष की है और नेपाल जिसकी 25 वर्ष है, वे इस युवा शक्ति को सँभाल नहीं पाए हैं। जो चीज डेमोग्राफिक डिविडेंड हो सकती थी, वह डेमोग्राफिक बर्डन में बदल गई है। बेरोजगारी, मोहभंग और सामाजिक अशान्ति के रूप में।
कुछ लोग श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के उदाहरणों को जेन-जी के उदाहरण के रूप में प्रचारित करने में व्यस्त हैं। इस कार्य में कुछ उनकी महत्त्वाकाँक्षाएँ भी न्यस्त हैं।
पर कितने ही टूलकिट बन जायें, भारतीय जेन जी टूल बनने से इंकार कर देती है।
इसलिए कि और देशों की तरह यहाँ भी यह पहली पीढ़ी है जिसने इंटरनेट के बिना दुनिया को जाना ही नहीं है। किन्तु इसके लिए इंटरनेट का अर्थ सिर्फ नेटवर्किंग नहीं है, वह सत्यापन भी है। अब पारंपरिक एजेंडाबाज एक प्रवाद फैलाते हैं और दूसरे पल ग्रोक फैक्ट चेक कर देता है।
यह हुआ है कि इस पीढ़ी को उस ऑनलाइन दुनिया में नेविगेट करने के लिए बड़ों का सहारा ही नहीं मिला। यह दुनिया उसने खुद चलकर घूमी।
उससे उसमें एक स्वायत्त दृष्टिकोण का भी विकास हुआ क्योंकि इंटरनेट का अर्थ अंतर्नेत्र का खत्म होना नहीं है। पर इंटरनेट इस पीढ़ी के लिए साधन नहीं है, संस्कृति है।यह पीढ़ी हमेशा ऑनलाइन है। यह अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि यदि कनेक्ट न रह कर भी यदि सोचा उसी के बारे में जा रहा हो तो मानसिक रूप से ऑनलाइन से ग्रस्तता है ही।
इसलिए जो अठारह से पच्चीस की उम्र के लोग हैं, उनके ट्रिगर्स की समझ तो रखें।
इसलिए दुनिया के दूसरे देशों की उथल पुथल को भी इस पीढ़ी से नहीं जोड़िये। वह साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए गढ़ा गया एक जुमला है। इजिप्ट में जो हुआ, न्यूयार्क टाइम्स की एक जाँच ने सिद्ध किया कि उसके प्रमुख नेताओं को विश्व की एक महाशक्ति की एजेंसी के द्वारा प्रशिक्षित किया गया था। तहरीर चौक पर जो आंदोलन हुए, उसके लिए न्यूयॉर्क और जोर्डन में उस एजेंसी के द्वारा कार्यशालाओं का आयोजन किया गया था। विकिलीक्स के द्वारा पकड़े गये लीक्स यह भी बताते हैं कि अरब सरकारों द्वारा संदेह प्रकट करने पर उन्हें यह बताया गया कि यह सिर्फ जनतंत्र के सुधार के लिए किया जाने वाला प्रयास है और कुछ नहीं।
ट्यूनीशिया की तत्कथित जैस्मिन क्रांति पर उस महाशक्ति ने दो सौ मिलियन डॉलर “आर्थिक और शासन सुधार” के लिए खर्च किए। यूक्रेन की ऑरेंज क्रांति भी इसी महाशक्ति के समर्थन से हुई, सामने युवा रखे गये। आज यूक्रेन की हालत देख लीजिये। उसके पहले युवा संगठन ऑट्पोर को सामने रखकर सर्बिया में शासन परिवर्तन कराया गया। यह विश्वविद्यालयीन छात्रों का संगठन था। वे युवा बुलडोज़र लेकर संसद पर चढ़ गये। USAID और NED ने इस संगठन को तीन मिलियन डॉलर की सहायता दी थी।
जेन-जी मुखौटा है, पीछे बहुत वीभत्स चेहरा है उस महाशक्ति का। वो गीत याद आता है न- क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिन की फ़ितरत छुपी रहे/ नक़ली चेहरा सामने आए असली सूरत छुपी रहे।
भारत का युवा असली नकली का फर्क क्या जान नहीं रहा है? वह विकसित भारत के लिए संकल्पित है तो वह टेक्नालाजी को ऐसे उपयोग में ला रहा है जैसे यदि मैं एंडी क्लार्क के शब्दों का उपयोग करूँ वह उनका extended mind हो।
यह वह पीढ़ी है जो UPI, आधार, COWIN के साथ साथ बड़ी हुई है।
यह वह पीढ़ी है जो टेक्नॉलाजी को लक्ज़री की तरह नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर की तरह देखती है।
यह वह पीढ़ी है जो डिजिटल इंडिया की उपभोक्ता भर नहीं है, वह उसकी सह-शिल्पी है। स्मार्टफोन, इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल टूल्स भारतीय युवा ऐसे प्रयोग कर रहे हैं जिसे मैं संज्ञानात्मक प्रोस्थेटिक्स से कम नहीं मान सकता। मानो बिना विकलांग हुए उनके नये पंख उग आये हों।
इन युवाओं ने भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी स्टार्टअप ईकोसिस्टम बना दिया है। भारत के इन युवा उद्यमियों ने 330 बिलियन डॉलर की वेल्यू से ज्यादा की यूनिकॉर्न कंपनियां खड़ी कर ली हैं। ये कंपनिया इंडिया ई कॉमर्स से लेकर शिक्षा तक फैली हुई हैं। इनके पीछे वेंचर वेंचर कैपिटल की उपलब्धता एक कारण है, सरकार के स्टार्ट अप जैसे कदम दूसरा। पर असल बात यह है कि हमारा युवा जोखिम लेने को तत्पर है। इन कंपनियों के कंपनियों में 70% संस्थापक युवा हैं। ग्लोबल प्लेटफ़ॉर्म्स पर भारतीय कंटेंट का विस्कोट सा हो गया है। चाहे वह यूट्यूब हों या इंस्टाग्राम। इसने प्रसिद्धि का, यश का जनतांत्रिकीकरण कर दिया है। साधारण पृष्ठभूमि से आये युवा जिस तरह से विश्व भर के लाखों यूजर्स को आकर्षित कर रहे हैं, वह देखने की चीज है।
आज फिनटेक एडॉप्शन रेट में देश प्रथम है, यह E&Y रिपोर्ट बताती है। मोबाइल डाटा कंजम्पशन पर यूज़र में भारत प्रथम है, यह एरिक्सन रिपोर्ट बताती है। आज रेमिटेंस रिसीप्ट्स में देश प्रथम है, यह वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट बताती है। दुनिया भर में सबसे अधिक STEM ग्रेजुएट भारत के हैं। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के सभी देशों के कुल STEM ग्रेजुएट्स की संख्या मिला भी दें तो भी भारत के STEM ग्रेजुएट्स उससे ज्यादा हैं। कभी आप अंतरराष्ट्रीय मैथ या फिजिक्स ओलंपियाड के परिणाम देखिए, उसके टाप 5 में हमेशा भारतीय मिलते हैं। Higher Education पा रहे भारत के नवयुवकों की संख्या सबसे बड़ी है। दुनिया की सबसे बड़ी रियल टाइम पेमेंट सिस्टम हमारी है। IT सर्विस एक्सपोर्टस में हम तीसरे हैं साइंटिफिक पब्लिकेशन में दुनिया में दूसरे।
यह युवा जानता है इसे कैसा देश बनाना है। इसकी बुद्धिमत्ता और दायित्व बोध को underestimate न करें। अभी मैं 2024 की प्यू रिसर्च सेंटर स्टडी पढ़ रहा था जिसमें 71% भारतीय मिलेनियल्स और जेन जी उत्तरदाताओं ने ज्यादा बड़े वेतन की तुलना में ‘समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालने’ को वरीयता दी। और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया ने अभी 2025 की एक स्टडी में बताया कि 30 वर्ष के 60%. इंटरनेट यूजर्स ने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का उपयोग सिविक एंगेजमेंट के लिए किया।
इन युवकों को बहकाया नहीं जा सकता।2047 तक विकसित भारत की प्रगति यात्रा को ये GDP से नहीं नापेंगे हालांकि आर्थिक समृद्धि की लक्ष्मी की अवमानना करने का इनका कोई इरादा नहीं, पर human Well-being, environmental sustainability, social equity, सांस्कृतिक उन्मेष और जनतांत्रिक ऊर्जा के हिसाब से ही भारत के विकसित होने को नापेंगे।
आज का युवा उस संकल्प के उत्साह से भरपूर है- कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयं मे सव्य आहित:। आज उसे आत्मविश्वास है- अहमिन्द्रो न पराजिग्ये।[ facebook se]





