इंदौर पुलिस की ‘स्टॉक गवाह’ प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 176 FIR में दो गवाहों पर कड़ी फटकार, अगली सुनवाई 10 मार्च को

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इंदौर पुलिस की ‘स्टॉक गवाह’ प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 176 FIR में दो गवाहों पर कड़ी फटकार, अगली सुनवाई 10 मार्च को

पुलिस जांच प्रक्रिया की गहन समीक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सकता है यह मामला

वरिष्ठ पत्रकार के. के. झा की विशेष रिपोर्ट

इंदौर। इंदौर पुलिस की कार्यप्रणाली उस समय राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई, जब चंदन नगर थाने में दर्ज 176 FIR में से 165 मामलों में केवल दो व्यक्तियों को ही गवाह बनाए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आया।

शीर्ष अदालत ने इस तथाकथित ‘स्टॉक गवाह’ प्रथा को न केवल गंभीर अनियमितता माना, बल्कि इसे विधि के शासन के लिए घातक करार दिया।

यह मामला 24 वर्षीय लॉ इंटर्न असद अली वारसी की याचिका के बाद उजागर हुआ, जिन्होंने अपनी कथित गलत गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान सामने आया कि अक्टूबर 2023 से 2024 के बीच दर्ज बड़ी संख्या में मामलों में पुलिस ने बार-बार सलमान कुरेशी और आमिर रंगरेज को ही गवाह बनाया, जिससे जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए चंदन नगर थाने के तत्कालीन थानेदार इंद्रमणि पटेल को “दुष्ट अधिकारी” बताया। अदालत ने उन्हें तत्काल जांच कार्यों से हटाकर पुलिस लाइन्स भेजने के आदेश दिए और यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस पूरे प्रकरण में किसी स्तर पर हस्तक्षेप हुआ तो उसकी जिम्मेदारी इंदौर पुलिस आयुक्त की होगी।

इंदौर पुलिस का पक्ष

मामले के तूल पकड़ने के बाद इंदौर पुलिस आयुक्त ने शहर के सभी थानों के लिए एक सर्कुलर जारी कर यह निर्देश दिए कि जांच के दौरान केवल “स्वतंत्र, सम्मानित और निष्पक्ष गवाहों” को ही शामिल किया जाए। हालांकि, इस विशेष मामले पर पुलिस की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की गई है।

सरकार ने दिए संकेत

मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वह ‘स्टॉक गवाह’ जैसी प्रथाओं पर पूर्ण रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करेगी, ताकि भविष्य में ऐसी अनियमितताओं की पुनरावृत्ति न हो।

फिलहाल यह मामला विचाराधीन है और इसकी अगली सुनवाई 10 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है, जिसमें सरकार द्वारा सुझाए जाने वाले सुधारात्मक उपायों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न केवल इंदौर, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी पुलिस जांच प्रक्रिया की गहन समीक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

(फोटो AI निर्मित)