
“तब तो मैं आपसे ज्यादा धार्मिक हूँ…”
कौशल किशोर चतुर्वेदी
इस समय इजराइल पूरी दुनिया का ध्यान केंद्रित कर रहा है। मध्य पूर्व में जो भीषण संघर्ष और युद्ध की स्थिति बनी है, उसका केंद्र भी इजराइल ही है। इजराइल की चर्चा हम खास तौर से इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि यह यहूदियों का देश है। थोड़ा सा इजराइल पर गौर करें तो इसराइल विश्व राजनीति और इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इतिहास और प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार यहूदियों का मूल निवास रहे इस क्षेत्र का नाम ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी धर्मों में प्रमुखता से लिया जाता है। यहूदी, मध्य पूर्व और यूरोप के कई क्षेत्रों में फैल गए थे। उन्नीसवीं सदी के अन्त में तथा फिर बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोप में यहूदियों के ऊपर किए गए अत्याचार के कारण यूरोपीय (तथा अन्य) यहूदी अपने क्षेत्रों से भाग कर यरूशलम और इसके आसपास के क्षेत्रों में आने लगे। सन् 1948 में आधुनिक इसराइल राष्ट्र की स्थापना हुई। और आज हम एक ऐसे यहूदी वैज्ञानिक की बात कर रहे हैं जिसका पूरी दुनिया को और विज्ञान को महत्वपूर्ण योगदान है। और वह हैं अल्बर्ट आइंसटाइन। अलबर्ट आइंस्टाइन (जन्म: 14 मार्च, 1879; मृत्यु: 18 अप्रैल, 1955) एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और सैद्धांतिक भौतिकविद् थे। वे सापेक्षता के सिद्धांत और द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण E = mc2 के लिए जाने जाते हैं। उन्हें सैद्धांतिक भौतिकी, ख़ासकर प्रकाश-विद्युत ऊत्सर्जन की खोज के लिए 1921 में ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला था।
अलबर्ट आइंस्टाइन का जन्म जर्मनी में वुटेमबर्ग के एक यहूदी परिवार में हुआ। उनके पिता ‘हर्मन आइंस्टाइन’ एक इंजीनियर और सेल्समैन थे। उनकी माँ का नाम पौलीन आइंस्टाइन थी। हालांकि आइंस्टाइन को शुरू-शुरू में बोलने में कठिनाई होती थी, लेकिन वे पढाई में अव्वल थे। उनकी मातृभाषा जर्मन थी और बाद में उन्होंने इटालियन और अंग्रेज़ी सीखी। उनका परिवार यहूदी धार्मिक परम्पराओं को नहीं मानता और आइनस्टाइन कैथोलिक विद्यालय में पड़ने गये। अपनी माँ के कहने पर उन्होंने सारंगी बजाना सीखा। उन्हें ये पसन्द नहीं था और बाद में इसे छोड़ भी दिया, लेकिन बाद में उन्हें मोजार्ट के सारंगी संगीत में बहुत आनन्द आता था।
1893 में अलबर्ट आइंस्टाइन एक कैथोलिक प्राथमिक स्कूल में पढ़े। हालांकि आइंस्टीन ने कठिनाई से बोलना सीखा वे प्राथमिक स्कूल में एक अव्वल छात्र थे। आइंस्टीन ने मज़े के लिए मॉडल और यांत्रिक उपकरणों का निर्माण किया और गणित में प्रतिभा दिखना भी शुरू किया। 1889 मैक्स तल्मूड ने दस वर्षीय आइंस्टीन को विज्ञान के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों से वाकिफ़ कराया। तल्मूड एक ग़रीब यहूदी मेडिकल छात्र था। यहूदी समुदाय ने तल्मूड को छह साल के लिए प्रत्येक गुरुवार को आइंस्टाइन के साथ भोजन करने की व्यवस्था की। इस समय के दौरान तल्मूड ने पूरे दिल से कई धर्मनिरपेक्ष शैक्षिक हितों के माध्यम से आइंस्टाइन को निर्देशित करता।
आइंस्टाइन ने सापेक्षता के विशेष और सामान्य सिद्धांत सहित कई योगदान दिए। उनके अन्य योगदानों में- सापेक्ष ब्रह्मांड, केशिकीय गति, क्रांतिक उपच्छाया, सांख्यिक मैकेनिक्स की समस्याऍ, अणुओं का ब्राउनियन गति, अणुओं की उत्परिवर्त्तन संभाव्यता, एक अणु वाले गैस का क्वांटम सिद्धांत, कम विकिरण घनत्व वाले प्रकाश के ऊष्मीय गुण, विकिरण के सिद्धांत, एकीक्रीत क्षेत्र सिद्धांत और भौतिकी का ज्यामितीकरण शामिल है। आइंसटाइन ने पचास से अधिक शोध-पत्र और विज्ञान से अलग किताबें लिखीं। 1999 में टाइम पत्रिका ने शताब्दी-पुरुष घोषित किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार वे सार्वकालिक महानतम वैज्ञानिक माने गए। आइंसटाइन शब्द बुद्धिमान का पर्याय माना जाता है।
अलबर्ट आइंस्टाइन केवल विज्ञान ही नहीं, साहित्य, कला, संगीत और अध्यात्म के भी मर्मज्ञ थे। यही कारण है कि 14 जुलाई 1930 को अपनी जर्मन यात्रा के दौरान विश्वकवि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर उनसे मिलने जब उनके निवास पर पहुँचे तो वह एक ऐतिहासिक क्षण हो गया। विज्ञान और कविता के इन दो शिखरों के बीच उस दिन “सत्य की प्रकृति” को लेकर एक अनूठा संवाद हुआ था। आइंसटाइन के एक सवाल के जवाब में जब रबीन्द्रनाथ टैगोर ने बताया कि “सत्य के साक्षात्कार में ब्रह्माण्ड पुरुष के मन और व्यक्ति स्तर पर एक अलौकिक संघर्ष होता है। पुर्नमिलान की एक सनातन प्रक्रिया विज्ञान और दर्शन और हमारे नीति शास्त्रों में निरंतर चलती रहती है। किसी भी मामले में यदि कोई ऐसा सत्य है जो मानवीयता से संबंधित नहीं है तो उसका हमारे लिए कोई अस्तित्व ही नहीं है।” तब अलबर्ट आइंस्टाइन ने कहा था कि “तब तो मैं आपसे ज्यादा धार्मिक हूँ …।” इस पर रबीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि “मेरा धर्म उस ब्रह्माण्ड पुरुष (ईश्वर) की चेतना के साथ मेरे अपने होने की निरंतर मिलन प्रक्रिया में है। मेरे हिबर्ट-व्याख्यान का भी यही विषय था जिसे मैंने ‘धार्मिक मनुष्य’ कहा था।’
युद्ध से जूझ रही इस दुनिया में अल्बर्ट आइंस्टाइन को पढ़ना और ज्यादा
प्रासंगिक हो गया है। इसका मतलब यही है कि हम दुनिया में मानवीय रूप में कितना सकारात्मक योगदान कर सकते हैं। पर शायद आज पूरी दुनिया नकारात्मकता के जंजाल में फँसी हुई है। बेहतर होगा कि हम इससे बाहर आकर एक सौंदर्य, प्रेम, भाईचारे और विश्व बंधुत्व वाली सुंदरतम दुनिया को साकार करें…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





