
Unique Initiative: मृत्यु भोज के बजाय गरीब बेटी के हाथ पीले, रूढ़ियों पर करारा प्रहार
छतरपुर: छतरपुर जिले के नौगांव से एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने समाज की रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती दे दी। नगर के प्रतिष्ठित सर्राफा व्यवसायी स्वर्गीय गोपाल कठेल के निधन के बाद परिवार ने परंपरागत मृत्यु भोज का आयोजन करने से साफ इनकार कर दिया। परिवार ने तय किया कि दिखावे पर खर्च होने वाली राशि से किसी जरूरतमंद की जिंदगी संवारी जाएगी—और उन्होंने ऐसा कर दिखाया।
करीब 13 दिन पहले झांसी में हृदय गति रुकने से गोपाल कठेल का निधन हो गया था। घर में शोक का माहौल था। तीन बहनों और मात्र 6 वर्षीय पुत्र कान्हा ने अपने पिता को खो दिया। शुक्रवार को तेरहवीं के अवसर पर जहां आमतौर पर भव्य भोज होता है, वहीं इस घर के आंगन में शहनाई गूंजी।
परिवार ने 21 वर्षीय अनाथ लक्ष्मी अनुरागी का विवाह अपने खर्च पर कराया। मासूम कान्हा ने बहन का ‘भाई’ बनकर कन्यादान की रस्म निभाई। वहीं मृतक की बहन और समाजसेविका तृप्ति कठेल ने बेटी को लाड़ली की तरह करीब 40 प्रकार की गृहस्थी सामग्री भेंट की और 20 हजार रुपए की एफडी भी कराई। शादी के मंडप में एक ओर पिता की तस्वीर सजी थी और दूसरी ओर अग्नि के फेरे लेती लक्ष्मी—यह दृश्य देख मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।
सामाजिक संदेश बना चर्चा का विषय..
कठेल परिवार की इस पहल की पूरे जिले में चर्चा है। दुल्हन की मौसी सोमवती अनुरागी ने बताया कि 22 तारीख को विवाह था और तृप्ति कठेल ने तेरहवीं के बजाय बेटी के हाथ पीले कर मानवता की मिसाल पेश की।
तृप्ति कठेल ने अपील की कि मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाओं पर खर्च करने के बजाय गरीब और असहायों की मदद की जाए। उनका कहना है कि इससे न केवल मृत आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि मिलेगी, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव भी आएगा।
यह पहल दिखाती है कि परंपराओं को बदलने का साहस ही समाज को आगे बढ़ाता है—और नौगांव ने एक नई दिशा पकड़ ली है।





