
वेनेज़ुएला के बहाने अमेरिका ने असली झटका चीन को दिया है
डॉ. सुशीम पगारे की विशेष रिपोर्ट
अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकलस मादुरो को राजधानी के उनके आधिकारिक निवास ला केसोना से आधीरात के बाद अपनी सैनिक शक्ति के दम पर जबरदस्ती उठा कर वेनेजुएला की संप्रभुता को चकनाचूर तो किया ही है पर असल में जोरदार झटका चीन को दिया है।
वेनेज़ुएला वह लैटिन अमेरिकी राष्ट्र है जो लम्बे समय से अमेरिका की नहीं सुन रहा था और पिछले लगभग 10-12 वर्षों में चीन की गोद मे जा बैठा था।चीन के वेनेज़ुएला में गत लगभग 25 सालों में गहरे आर्थिक हित विकसित हो गए थे और यह सब अमेरिका के ‘मुनरो डॉक्ट्रिन’ के लिए चुनोती बन गया था। जेम्स मुनरो अमेरिका के पांचवे राष्ट्रपति थे जिन्होंने अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए एक सिद्धांत बनाया था जिसमें किसी भी विदेशी शक्ति को उनके देश के हितों के विपरीत कार्य करने से रोकना मुख्य ध्येय था।कुछ समय बाद यह सिद्धांत उनके नाम से मुनरो डॉक्ट्रिन कहा जाने लगा और अमेरिकी विदेश नीति का आधार बन गया।मुनरो डॉक्ट्रिन के तहत ही अमेरिका अपने हितों के लिए दुनिया भर में हस्तक्षेप करता रहता है।
वेनेज़ुएला को ले कर अमेरिका को यह कतई बरदाश्त नहीं हो रहा था की चीन उसके इतने निकट आ कर किसी देश में बैठ जाए और उसे चुनोती दे।अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को खुले आम उठा कर ले जाने का जो कार्य किया है उसने अनेक उन देशों को सोचने पर मज़बूर कर दिया है जो अमेरिका की नहीं सुन रहे।एक तीर से अमेरिका ने वैसे तो कई निशाने साधे हैं पर उसने असली झटका चीन को ही दिया है।
चीन ने वेनेज़ुएला में सन 2000 के आसपास उस समय निवेश करना शुरू किया था जब वहां सत्ता सैन्य-समाजवादी लीडर ह्यूगो चावेज के हाथ में आई।मादुरो,चावेज के ही चेले हैं और 2013 में उनकी मृत्यु के बाद से सत्ता उनके हाथ में थी। उनकी नीतियों से वेनेज़ुएला खोखला हो चला है।पिछले कुछ वर्षों में देश से 80 लाख लोग पलायन कर गए थे।तेल के चक्कर में गत 25 बरसों में चीन ने लगभग 6000 करोड़ डॉलर का वेनेज़ुएला में भारी भरकम निवेश कर दिया था।अब उसकी इतनी विशाल राशि अमेरिकी मिलेट्री हस्तक्षेप से हाल फिलहाल तो शून्य हो गई है।वेनेज़ुएला में विश्व का सबसे बड़ा तेल भण्डार है जिसका उत्पादन चीनी कम्पनियों के अधीन हो चला था।चीन की कम्पनियों के अधीन ही वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर और संचार के साधन भी हैं।ट्रम्प ने खुलेआम कहा है कि वेनेजुएला को अब हम चलाएंगे।ऐसे में चीन का निवेश भी अमेरिका के अधीन हो गया है।
चीन की पूरे मामले में प्रतिक्रिया भी ऐसी नही है कि जिससे लगे कि वह अमेरिका के खिलाफ कोई आक्रामक कार्यवाही करेगा।वैसे भी दुनिया में कई विश्लेषक अब खुल कर कहने लगे हैं कि चीन केवल पश्चिमी मीडिया को अरबों डॉलर दे कर अपने सुपर पावर होने का सिर्फ ढिंढोरा पीटता है।वास्तव में अमेरिका जैसा दुस्साहस उसमें है नहीं। अमेरिका ने चीन के एक और खास दोस्त ईरान के परमाणु ठिकानों पर जब पिछले साल बम बरसाए तब भी चीन कुछ नहीं कर पाया था।अतः वह सिर्फ दिखावटी सुपर पावर है।न कि अमेरिका जैसा वास्तविक।अतः वेनेज़ुएला में अमेरिका ने जो कुछ भी किया है उसने चीन के हितों को वस्तुतः बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है।
(लेखक इतिहास के प्रोफेसर हो कर सम -सामयिक मामलों के जानकार हैं)





