
वन्दिता श्रीवास्तव की कविता
Valentine’s Day: एक कहानी रोज की

तुमने
दिया था
जो फूल
पहली
मुलाकात
मे
संजो के
रखी है
उसकी
सुवास
सुहाग पिटारी
मे
धरे हैं
पराग कण
सिंधौरे
मे
भरती
हूं

जब सिन्दूर
से
मांग
आ ही
जाते हो
तुम
श्रृंगार कक्ष
मे
झरे सिन्दूर को
सहेजने के
लिये
प्रभु
जीवन
ऐसे ही
बीते।
वन्दिता श्रीवास्तव





