
जब कानून, राजनीति और व्यक्तित्व एक मंच पर आ जाएं
New Delhi: कानून की पढ़ाई, राजनीति का रास्ता और अदालत की जटिल दुनिया। इन तीनों के रिश्ते को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। क्यों बड़ी संख्या में नेता लॉ की पढ़ाई करते हैं, लेकिन वकालत को पेशे के रूप में नहीं अपनाते। इसी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौजूदगी ने एक बार फिर इस प्रश्न को केंद्र में ला दिया। वरिष्ठ लेखिका सुजाता मिश्रा ने इसी संदर्भ में कानून, राजनीति और व्यक्तित्व के अंतर्संबंधों को बहुत सहज और निजी अनुभवों के साथ रखा है।
▪️सुजाता मिश्रा▪️
अक्सर लोग पूछते हैं कि ज्यादातर नेता लॉ की पढ़ाई क्यों करते हैं…आज सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने ऐसे तमाम लोगों की जिज्ञासाओं का जवाब दे दिया है…वकालत पढ़ने वाले सभी लोग पेशेवर वकील नहीं बनते…न न्यायाधीश बनते …न कॉरपोरेट में जाते.. और न ही शिक्षण में….क्योंकि विशेषकर न्यायिक सेवा में जाने का अर्थ है आजीवन अध्ययनशील रहना…अपडेटेड रहना….इसीलिए एक बड़ा वर्ग राजनीति और व्यापार में जाता है जहां उन्हें कभी न कभी कोर्ट –कचहरी का सामना करना पड़ता है तब उनकी यह डिग्री काम आ सकती है…..बल्कि शायद पहले ऐसा भी नियम था कि वकील को हथकड़ी नहीं लग सकती थी, यानि यदि उसे गिरफ्तार भी किया जाए तो बिना हथकड़ी लगाए…अब पता नहीं यह नियम है या नहीं…वैसे वकील और पुलिस वालों से दोस्ती तो अच्छी है किंतु रिश्तेदारियां बाबा रे बाबा🙏😎😎🙏…. कुछ लोग तो वकालत पढ़ते ही इसलिए है कि रिश्तेदारों को तंग करना है 😁😁😁 बहरहाल ममता बनर्जी की राजनीति मुझे नहीं पसंद किंतु उनका यह अंदाज अच्छा लगा….आज यह सुप्रीम कोर्ट में भी ऐतिहासिक पल था जब कोई मुख्यमंत्री स्वयं अपनी टीम के साथ बतौर वकील अपना केस लड़ने उपस्थित हुई हो…अटल जी के समय से लेकर आज तक ममता जी के तेवर कम नहीं हुए…उन दिनों ये मुझे बहुत पसन्द थी….अब वो बात नहीं रही….
▪️और अंत में••••
सुजाता मिश्रा का यह लेख किसी राजनीतिक समर्थन या विरोध से ज्यादा, व्यवस्था की समझ रखने वाले व्यक्ति की दृष्टि को सामने रखता है। ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट में स्वयं वकील के रूप में खड़ा होना भले ही राजनीतिक रूप से विवादित व्यक्तित्व से जुड़ा हो, लेकिन संस्थागत रूप से यह एक असामान्य और उल्लेखनीय घटना है। यह लेख याद दिलाता है कि कानून की पढ़ाई सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि सत्ता, संघर्ष और आत्मविश्वास की भाषा भी सिखाती है। पसंद-नापसंद से परे, जब कोई निर्वाचित मुख्यमंत्री अदालत में अपने तर्क स्वयं रखे, तो वह पल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज होता है।





