Wednesday, July 24, 2019
भँवर में डगमगाती CBI

भँवर में डगमगाती CBI

पिछले कुछ दिनों से जिस तरीक़े से CBI हेडक्वार्टर में घमासान मचा हुआ है उससे न केवल सरकार मे बल्कि पूरे देश में चिंता व्याप्त हो गई है ।भारत सरकार ने समय रहते कोई कारगर क़दम नहीं उठाये थे इसलिए उसकी इस मामले में किरकिरी होना अवश्यंभावी था। CBI के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच जिस तरीक़े से खुला युद्ध छिड़ा हुआ है उससे लगता है कि सरकार के सख़्त नियंत्रण वाला चेहरा अब ढीला होता जा रहा है । CBI के बारे में विगत दो तीन दिनों में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है लेकिन फिर भी मैं यहाँ पर कुछ तथ्य रखना चाहूंगा।

CBI न तो संवैधानिक संस्था है और नहीं वैधानिक संस्था है। CBI की पूर्ववर्ती संस्था का 1941 में लाहौर में स्पेशल पुलिस स्टेब्लिशमेंट के रूप में गठन हुआ था।इसके गठन  करने का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध  में युद्ध की सप्लाई में हुए भारी भ्रष्टाचार की जाँच करना था ।1946 में यह संस्था दिल्ली आ गई और इसका नाम डेलही स्पेशल पुलिस स्टेब्लिशमेंट कर दिया गया ।इसका क्षेत्राधिकार बढ़ाकर केंद्र सरकार के सभी विभाग इसके अधीन कर दिए गए । CBI अपने वर्तमान रूप में 1963 में आयी जब गृह मंत्रालय के एक रिजोल्यूशन के द्वारा इसे नया रूप दिया गया परन्तु इसकी  क़ानूनी शक्तियां पूर्ववर्ती संस्था के समान ही रही । कोई आश्चर्य नहीं है कि 2013 में गौहाटी उच्च न्यायालय ने CBI को एक असंवैधानिक एवं ग़ैर क़ानूनी संस्था घोषित कर दिया।  उसके इस आदेश पर फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट का स्टे चल रहा है ।

CBI की स्थापना से ही सत्तारूढ़ दल द्वारा इसका खुला दुरुपयोग किया जाता रहा है। इंदिरा गाँधी के समय में यद्यपि विपक्ष बहुत कमज़ोर और विभाजित था फिर भी उन्होंने इसका दुरुपयोग उनके विरुद्ध करने मैं हिचक नहीं दिखाई।मुलायम सिंह और मायावती के विरुद्ध चल रहे अनुपातहीन संपत्ति के मुक़दमे तो हास्यास्पद स्थिति में आ गये थे जब बार बार राजनीतिक दांवपेंच के अनुसार CBI द्वारा कोर्ट में विरोधाभासी कार्रवाई की जाती रही । 2013 में भी जैसे ही DMK पार्टी द्वारा UPA सरकार से समर्थन वापस ले लिया गया तो तत्काल CBI ने करुणानिधि और उनके परिवार के लोगों के ऊपर छापे डाले थे। मोदी सरकार आने के बाद भी यह क्रम जारी रहा और CBI के साथ साथ ED  का प्रयोग विपक्षी नेताओं के विरुद्ध किया गया है। वास्तविकता यह है कि सभी राजनीतिक दलों में यह पूर्ण सहमति है कि जो भी दल सत्ता में आए वो CBI का दुरुपयोग करें। 

वर्तमान संकट का प्रारंभ लगभग एक साल पूर्व हुआ जब  CVC की बैठक में CBI डायरेक्टर आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना की एडिशनल डायरेक्टर से स्पेशल डायरेक्टर के पद पर पदोन्नति का विरोध किया था। CVC ने डायरेक्टर की बात नहीं मानी और यह पदोन्नति कर दी गई।  राकेश  अस्थाना गुजरात कैडर के अधिकारी हैं और उन्हें प्रधानमंत्री  का पूरा आशीर्वाद प्राप्त था। उन्होंने अनेक प्रशासकीय कार्यों में डायरेक्टर के निर्णयों में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया। हद तो तब हो गई जब 24 अगस्त उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी के समक्ष डायरेक्टर आलोक वर्मा की शिकायत की और आरोप लगाया कि वर्मा ने मोइन क़ुरैशी प्रकरण के एक गवाह सतीश साना से दो करोड़ रुपये प्राप्त किये  है ।कैबिनेट सेक्रेटरी ने यह शिकायत जाँच के लिये CVC को भेज दी। इस शिकायत के कुछ ही दिनों बाद CBI ने सतीश साना को मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया जहाँ उसने पलटते हुए यह बयान दिया कि उसने राकेश अस्थाना को तीन करोड़ रुपये की रिश्वत दी है। बिना समय गंवाए डायरेक्टर आलोक वर्मा ने 15 अक्टूबर को  इसमें F IR करा दी तथा अस्थाना के एक विश्वस्त DSP को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया। अस्थाना  को स्वयं अपने गिरफ़्तार होने की आशंका हो गई और उन्होंने  हाई कोर्ट से एक सप्ताह के लिए अपनी गिरफ़्तारी रुकवा ली । इन घटनाओं से हुई जगहँसाई को देखते हुए सरकार ने तत्काल कार्रवाई  करते हुए दोनों अधिकारियों को देर रात ज़बरन छुट्टी पर भेज दिया ।शासन को यह निर्णय लेने में CVC द्वारा 23 अक्टूबर को रात साढ़े

0 comments      

Add Comment


एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्य एवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।

मो. नंबर - 9425112266